बी के झा
NSK

नई दिल्ली/फतेहपुर सीकरी/आगरा, 6 दिसंबर
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव शुक्रवार को फतेहपुर सीकरी स्थित विश्वप्रसिद्ध हजरत शेख सलीम चिश्ती की दरगाह पहुंचे। उनके साथ राज्यसभा सांसद जया बच्चन और कन्नौज की सांसद डिंपल यादव भी मौजूद रहीं।अखिलेश ने पारंपरिक तरीके से चादर चढ़ाई, मन्नत का धागा बांधा, और प्रदेश की शांति, तरक्की तथा राजनीतिक सफलता की दुआ मांगी।दरगाह परिसर में सुबह से ही बड़ा जमावड़ा देखा गया। SP कार्यकर्ताओं ने नारे लगाए और “2027 में समाजवाद की वापसी” की उम्मीद जताई। सुरक्षा व्यवस्था भी चाक-चौबंद रही।
2012 की स्मृति—फिर वही दरगाह, फिर वही मन्नतसूत्रों के अनुसार, अखिलेश यादव इससे पहले 2012 विधानसभा चुनाव से पूर्व भी चिश्ती की दरगाह पर पहुंचे थे और वहीं मन्नत का धागा बांधा था। संयोग से उसी वर्ष समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था।इसलिए राजनीतिक गलियारों में इस यात्रा की सियासी प्रतीकात्मकता पर गहरी चर्चा है।अखिलेश का संदेश—
“एसआईआर में जुटें, 2027 को लक्ष्य बनाएं”दरगाह से बाहर निकलते समय अखिलेश ने पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और कहा—संगठन में नई ऊर्जा डालिए, SIR (Special Intensive Reach) कार्यक्रम में पूरी ताकत से जुट जाइए। 2027 की तैयारी अभी से शुरू होनी चाहिए।उनके इस वक्तव्य ने स्पष्ट संकेत दे दिया कि सपा अब चुनाव-पूर्व धार्मिक और सामाजिक संपर्क को भी रणनीति का हिस्सा बना रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय—“अखिलेश का यह कदम सांकेतिक राजनीति का पुराना लेकिन असरदार फार्मूला”राजनीतिक विश्लेषक डॉ. क़ासिमी का कहना है—“
चिश्ती की दरगाह पर आना उत्तर भारत के नेताओं के लिए ‘लोकप्रिय आस्था-डिप्लोमेसी’ का एक स्थापित प्रतीक है। अखिलेश इसे दोबारा दोहरा रहे हैं, जिससे एक संदेश जाता है कि वे ‘भाग्य और संघर्ष’ दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं।”राजनीतिक विशेषज्ञ प्रो. अरुण त्रिपाठी का विश्लेषण—
“यह यात्रा मुस्लिम वोटरों को संबोधित संदेश तो है ही, साथ ही यह जया बच्चन व डिंपल यादव की मौजूदगी के कारण ‘परिवार की एकजुटता’ दिखाने का भी तरीका है। सपा 2027 के लिए भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव की राजनीति भी साध रही है।”बीजेपी की प्रतिक्रिया—“यह वोट बैंक साधने की कोशिश, धार्मिक पर्यटन नहीं”बीजेपी प्रवक्ता ने इस यात्रा को राजनीतिक बताया। उनका कहना है—अखिलेश यादव को चुनाव नजदीक दिखते ही दरगाह याद आती है। 2012 में भी ऐसा ही हुआ था। यह आस्था नहीं, वोट बैंक की राजनीति है।”
बीजेपी का यह भी आरोप है कि सपा केवल मुस्लिम appeasement की राजनीति कर रही है, उसका विकास से कोई लेना-देना नहीं।हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया—“चुनावी पिक्चर का पहला सीन”कुछ हिंदू संगठनों ने भी इस यात्रा को चुनावी चाल बताया।विश्व हिंदू महासंघ के एक पदाधिकारी ने कहा—जैसे-जैसे चुनाव पास आता है, कुछ नेता दरगाह की ओर दौड़ते नज़र आते हैं। बाकी 4 साल आस्था दिखाई नहीं देती।
हालाँकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि धर्मस्थलों पर जाने में कोई गलत बात नहीं, लेकिन राजनीतिक उद्देश्य छिपाया नहीं जाना चाहिए।हिंदू धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया—“धर्मस्थलों का उपयोग राजनीतिक संदेशों के लिए न हो”अवध पीठ के एक प्रमुख संत ने अपने बयान में कहा—सभी धर्मस्थल आस्था के लिए बने हैं, चुनावी रणनीति के लिए नहीं। यदि कोई नेता दरगाह या मंदिर जाता है तो उसे अपने भीतर की शांति और जनसेवा का संकल्प लेकर ही जाना चाहिए। इसे राजनीतिक तमाशा न बनाया जाए।
”उन्होंने यह भी कहा कि भारत की संस्कृति सभी धर्मों के सम्मान की है, लेकिन नेताओं को अपनी यात्राओं को ‘लाभ-हानि का सौदा’ नहीं बनाना चाहिए।सियासी संकेत—2027 की ओर बढ़ते कदम?अखिलेश यादव की यह यात्रा कई मायनों में अहम मानी जा रही है:
2012 की विजय की यादें ताज़ा करना
मुस्लिम एवं पिछड़े वर्गों में भावनात्मक outreach
परिवार की सक्रियता दिखाना
कार्यकर्ताओं को energize करना
2027 के चुनाव की औपचारिक शुरुआत राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह यात्रा SP की सॉफ्ट-सेंटिमेंट रणनीति का हिस्सा है, जिससे पार्टी आगामी चुनावों से पहले धार्मिक-सांस्कृतिक मौके और जन-भावनाओं का लाभ लेने की कोशिश कर रही है।
निष्कर्ष:
दरगाह से उठी दुआ—और चुनावी मौसम की दस्तकअखिलेश यादव की चादरपोशी ने राजनीतिक वातावरण में हलचल बढ़ा दी है।आस्था और राजनीति के मिले-जुले इस कदम को कहीं लोग सम्मान की परंपरा बता रहे हैं,तो कहीं इसे 2027 चुनाव की धमक माना जा रहा है।एक बात तय है—
फतेहपुर सीकरी की इस यात्रा ने सियासी हवा में नया रंग भर दिया है।
