कर्नाटक में सत्ता का संग्राम तेज: दिल्ली में शिवकुमार का डेरा, सिद्धारमैया ने नहीं छोड़ी गद्दी — ‘ढाई-ढाई साल फॉर्मूला’ फिर चर्चा में

बी के झा

NSK

बेंगलुरु/ नई दिल्ली, 21 नवंबर

कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर तूफ़ानी मोड़ पर पहुँच गई है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के कार्यकाल के ढाई साल पूरे होने के बाद, सत्ता परिवर्तन को लेकर कांग्रेस के भीतर उथल-पुथल तेज हो गई है। जिस ‘2.5-2.5 साल रोटेशन फॉर्मूला’ का जिक्र 2023 के विधानसभा चुनावों के बाद बार-बार होता रहा है, अब वही फॉर्मूला कर्नाटक में एक बड़े राजनीतिक टकराव का केंद्र बन चुका है।दिल्ली में शिवकुमार का शक्ति-प्रदर्शन उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार अपने समर्थक मंत्रियों और विधायकों के साथ नई दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। पार्टी आलाकमान पर दबाव बढ़ाने की रणनीति साफ दिखाई दे रही है।

गुरुवार को मंत्री एन. चेलुवरयस्वामी, विधायक इक़बाल हुसैन, एच.सी. बालकृष्ण और एस.आर. श्रीनिवास दिल्ली पहुंचे। सूत्रों के मुताबिक, शुक्रवार तक 12 और विधायक शिवकुमार गुट में शामिल होकर दिल्ली कूच कर सकते हैं।शिवकुमार समर्थकों का दावा है कि 2023 की जीत के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने खुलकर यह आश्वासन दिया था कि ढाई साल सिद्धारमैया और ढाई साल शिवकुमार मुख्यमंत्री रहेंगे। लेकिन समय सीमा पूरी होने के बाद भी सत्ता हस्तांतरण के संकेत नहीं मिलने से असंतोष बढ़ता जा रहा है।

सिद्धारमैया का इशारा साफ: “मैं ही पेश करूंगा अगला बजट”चामराज नगर की एक सभा में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने अंदाज़ में स्पष्ट कर दिया कि उनकी कुर्सी फिलहाल हिलने वाली नहीं है।अपनी स्थायी पकड़ और प्रशासनिक अनुभव का जिक्र करते हुए

उन्होंने कहा—जब मैं पहली बार वित्त मंत्री बना था, तब कहा गया था कि यह सौ भेड़ें भी नहीं गिन सकता। लेकिन मैंने चुनौती को स्वीकार किया और 16 बजट पेश किए। अगला—17वां बजट भी मैं ही पेश करूंगा।”उनका यह बयान किसी राजनीतिक संदेश से कम नहीं था—कि मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का उनका इरादा मज़बूत है और ‘रोटेशन फॉर्मूला’ पर चर्चा के लिए उन्होंने कोई दरवाज़ा खुला नहीं छोड़ा।

शिवकुमार की चुप्पी—रणनीति या मजबूरी?दिल्ली रवाना होने वाले विधायकों पर पूछे गए सवालों पर शिवकुमार ने सहजता से कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है और फिलहाल उनकी तबीयत भी ठीक नहीं है।लेकिन सिद्धारमैया के ‘मैं मुख्यमंत्री ही रहूंगा’ वाले बयान पर उन्होंने नरमी दिखाते हुए कहा—

यह अच्छी बात है। पार्टी ने उन्हें जिम्मेदारी दी है और हम सब मिलकर काम कर रहे हैं।”राजनीति के जानकार मानते हैं कि यह बयान एक कूटनीतिक कदम है—ना पूरी सहमति, ना पूरी नाराज़गी।शिवकुमार के भाई ने बढ़ाई हलचल पूर्व सांसद और शिवकुमार के भाई डी.के. सुरेश ने कहा कि सिद्धारमैया अपने वादों से पीछे नहीं हटते।लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या सिद्धारमैया शिवकुमार से किया वादा निभाएंगे, तो उन्होंने साफ कहा—उन्हें कोई जानकारी नहीं है।

उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ दिया कि—अब फैसला पार्टी नेतृत्व, AICC अध्यक्ष और राहुल गांधी के हाथ में है।”कांग्रेस नेतृत्व के सामने कठिन चुनौतीकर्नाटक कांग्रेस फिलहाल जिस स्थिति में है, उसे संभालना आलाकमान के लिए आसान नहीं है।

दोनोें नेताओं—सिद्धारमैया और शिवकुमार—का जनाधार मजबूत है, और दोनों एक-दूसरे की बराबरी का राजनीतिक कद रखते हैं।ऐसे में गलत फैसला कर्नाटक सरकार को अस्थिर कर सकता है, जबकि सही फैसला कांग्रेस की दक्षिण भारत में पकड़ को मजबूत बना सकता है।आगे क्या?दिल्ली में शिवकुमार की हलचल और कर्नाटक में सिद्धारमैया का प्रभाव—

दोनों मिलकर संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में कर्नाटक की राजनीति में और नाटक देखने को मिलेगा।पार्टी के भीतर असंतोष, सत्ता-संतुलन और नेतृत्व के निर्णय… सब मिलकर यह तय करेंगे कि कर्नाटक की गद्दी पर कौन बैठा रहेगा और भविष्य में कांग्रेस की दिशा क्या होगी।

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