काला मास्क, काला लिबास और नई राजनीति की तलाश: बिहार चुनाव में फिर मैदान में पुष्पम प्रिया चौधरी

बी के झा

NSK

दरभंगा / पटना / नई दिल्ली, 19 अक्टूबर

बिहार की राजनीति में एक बार फिर से चर्चा का केंद्र बनी हैं काले कपड़े और मास्क में नजर आने वाली पुष्पम प्रिया चौधरी। अपनी अनोखी शैली और आधुनिक सोच के लिए जानी जाने वाली पुष्पम ने एक बार फिर बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में ताल ठोकी है। वह अपने राजनीतिक दल “द प्लूरल्स पार्टी” से दरभंगा से चुनाव लड़ रही हैं — वही सीट जहाँ से उन्होंने 2020 में भी चुनावी शुरुआत की थी।🔹 ब्रिटेन से लौटकर बिहार के दिल तक

ब्रिटेन से पढ़ाई करके लौटीं पुष्पम ने यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से मास्टर्स की डिग्री हासिल की है। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे बिहार सरकार के पर्यटन और स्वास्थ्य विभागों में सलाहकार के रूप में काम कर चुकी हैं। लेकिन उनकी नजर शुरू से ही बिहार की राजनीति पर थी —

उस राजनीति पर जो जाति, धर्म और परिवारवाद की जकड़ में फंसी है।

पुष्पम कहती हैं,बिहार को अब जातीय गणित नहीं, विकास की राजनीति चाहिए।

‘प्लूरल्स’ का मतलब ही है — सब लोग, सबके लिए, एक बिहार।”

परिवार में राजनीति, पर अंदाज़ अलग

पुष्पम का परिवार भी राजनीति से अछूता नहीं रहा है। उनके दादा प्रोफेसर उमाकांत चौधरी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी और समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उनके चाचा विनय कुमार चौधरी जेडीयू के विधायक हैं। लेकिन पुष्पम ने अपने परिवार से अलग रास्ता चुना — वह किसी पुराने राजनीतिक दल की छत्रछाया में नहीं, बल्कि अपनी नई विचारधारा की पार्टी के साथ आईं।

काले कपड़े और मास्क:

एक राजनीतिक प्रतीक

पुष्पम की पहचान उनके काले कपड़े और मास्क से भी है। वह कहती हैं —नेता सफेद क्यों पहनते हैं, मुझे नहीं पता। मैं काला इसलिए पहनती हूं क्योंकि यह सच्चाई और ईमानदारी का रंग है।उन्होंने वादा किया है कि वे मास्क तभी हटाएंगी जब अपनी सीट से चुनाव जीतेंगी। यह प्रतीकात्मक अंदाज़ उन्हें बाकी नेताओं से अलग करता है —

एक तरफ सफेद कुर्तों वाले नेता हैं, और दूसरी तरफ एक काले लिबास में आधुनिक, आत्मविश्वासी महिला जो बदलाव का दावा करती है।

पिछली बार भी मारी थी एंट्री, पर असर सीमित रहा2020 के विधानसभा चुनाव में ‘द प्लूरल्स पार्टी’ ने 148 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन नतीजे उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे। पुष्पम ने तब अखबारों के पहले पन्ने पर अपने मुख्यमंत्री पद की घोषणा की थी, जिसने पूरे बिहार में सनसनी मचा दी थी। हालांकि वह न तो खुद जीत सकीं, न पार्टी को कोई खास जनाधार मिल सका।

फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी — इस बार उनकी पार्टी “सिटी” चुनाव चिह्न के साथ 243 सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है, जिनमें आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।

बिहार की राजनीति में ‘प्लूरल्स’ की संभावनाएं

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पुष्पम भले ही अभी वोट बैंक की राजनीति में बड़ा असर न डाल पाई हों, लेकिन उनका आगमन युवा, पढ़े-लिखे और शहरी मतदाताओं के बीच नई उम्मीद जगाता है। वे एक वैकल्पिक राजनीति की बात करती हैं — ऐसी राजनीति जिसमें न जाति हो, न धर्म, सिर्फ विकास और पारदर्शिता हो।

दरभंगा के स्थानीय मतदाता रमेश झा कहते हैं,प्रिया जी ईमानदार छवि की हैं, बोलती सच्चाई हैं। लेकिन ज़मीन पर अभी कुछ बड़ा दिखा नहीं है। देखते हैं, इस बार जनता उन्हें कितना मौका देती है।

बिहार की परंपरागत राजनीति को चुनौती

पुष्पम का राजनीतिक अभियान पूरी तरह आधुनिक है — सोशल मीडिया पर उनकी मजबूत उपस्थिति है, युवाओं को आकर्षित करने वाले संदेश हैं, और चुनाव प्रचार में पेशेवर टीमों का सहारा लिया जा रहा है।वह कहती हैं —बिहार को अब बूढ़े नारे नहीं, नई सोच चाहिए। हम नेताओं की जगह लीडर्स तैयार कर रहे हैं।

क्या इस बार इतिहास बदलेगा?

2025 के चुनाव में बिहार की राजनीति दो ध्रुवों — एनडीए और महागठबंधन — के बीच फंसी दिखती है। लेकिन तीसरे मोर्चे के तौर पर प्लूरल्स पार्टी अपने लिए जगह बनाने की कोशिश में है। सवाल यह है कि क्या पुष्पम इस बार दरभंगा की जनता को काले मास्क के पीछे छिपा चेहरा दिखा पाएंगी, या फिर यह चुनाव भी उनकी राजनीतिक यात्रा का एक और प्रयोग बनकर रह जाएगा।

निष्कर्ष:

बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में पुष्पम प्रिया चौधरी एक अलग पहचान रखती हैं — युवा, पढ़ी-लिखी, आत्मविश्वासी और बिना जातीय झंडे के राजनीति करने वाली नेता। उनकी चुनौती सिर्फ चुनाव जीतना नहीं है, बल्कि यह साबित करना भी है कि ईमानदारी और शिक्षा भी राजनीति में सफलता दिला सकती है।

अब देखना होगा कि क्या 2025 में बिहार की जनता उन्हें केवल “काला मास्क पहनने वाली उम्मीदवार” के रूप में याद रखेगी या “नई राजनीति का प्रतीक” मानकर मौका देगी।

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