क्या घुसपैठियों के लिए रेड कार्पेट बिछाएं? रोहिंग्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, CJI ने केंद्र और याचिकाकर्ता दोनों से किए कठोर सवाल

बी के झा

नई दिल्ली, 2 दिसंबर

रोहिंग्या समुदाय से जुड़े एक संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर तीखी और सशक्त बहस देखने को मिली। मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच ने केंद्र सरकार और याचिकाकर्ता—दोनों को कठोर सवालों के कटघरे में खड़ा करते हुए साफ कर दिया कि बिना कानूनी स्थिति स्पष्ट किए किसी विदेशी नागरिक को ‘अधिकार’ देने की चर्चा ही निरर्थक है।“अगर कोई अवैध रूप से घुस आए, तो क्या उसके स्वागत में रेड कार्पेट बिछा दें?”

CJI सुनवाई की शुरुआत में ही

CJI सूर्यकांत ने केंद्र सरकार से सीधे सवाल दागा:“भारत सरकार का वह कौन-सा आदेश है, जो रोहिंग्याओं को ‘शरणार्थी’ घोषित करता है? यदि कोई व्यक्ति अवैध रूप से घुसपैठ करता है तो क्या हमें उसके अधिकार सुनिश्चित करने की बाध्यता है?”उन्होंने और भी कठोर टिप्पणी करते हुए कहा:“उत्तर भारत की संवेदनशील सीमाओं में सुरंग खोदकर, बाड़ काटकर घुसे किसी भी व्यक्ति का क्या हम रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत करें?”बेंच के इन सवालों ने अदालत में उपस्थित सभी पक्षों को असहज कर दिया।“पहले घुसपैठ, फिर अधिकारों की मांग—कानून को कितनी दूर तक खींचना चाहिए?”

याचिकाकर्ता की ओर से यह कहे जाने पर कि वे रोहिंग्याओं के लिए विशेष दर्जा नहीं मांग रही हैं, CJI ने और सख्त लहजे में कहा:“पहले अवैध रूप से घुसो, फिर कहो कि मुझे खाना, घर, स्कूल, सब दो—क्या इसे ही न्याय का आदर्श मान लिया जाए?”उन्होंने यह भी जोड़ा कि देश में पहले से करोड़ों भारतीय गरीबी से जूझ रहे हैं, और संसाधनों पर उनका भी पहला अधिकार है।हांलांकि बेंच ने यह भी सुनिश्चित किया कि—अवैध घुसपैठिया होने का अर्थ यह नहीं कि उन्हें थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया जाए। कानून के दायरे में रखा जाना ही हमारा कर्तव्य है।”

याचिकाकर्ता का पक्ष: “हम सिर्फ कानूनी प्रक्रिया के पालन की मांग कर रहे हैं”याचिका में दावा था कि मई में दिल्ली पुलिस ने कुछ रोहिंग्या व्यक्तियों को हिरासत में लिया था, जिनका अब तक कोई पता नहीं है।वकील का तर्क था:“हम न शरणार्थी दर्जा मांग रहे हैं, न उन्हें वापस बुलाने की याचना है। सिर्फ इतना चाहते हैं कि निर्वासन हो, तो कानून के अनुसार हो।”उन्होंने 2020 के सलीमुल्लाह मामले का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है—निर्वासन प्रक्रिया सिर्फ विधिक प्रावधानों के अनुरूप ही हो सकती है।

“देश धर्मशाला नहीं है” — सुप्रीम कोर्ट की पूर्व टिप्पणियों की यादमामले की पृष्ठभूमि में, अदालत की कुछ पुरानी टिप्पणियां भी गूँज उठीं—जैसे कि “भारत दुनिया की धर्मशाला नहीं बन सकता”, जहां हर कोई शरण लेने आ जाए।और हाल ही में यह भी कहा गया कि “रोहिंग्याओं को समुद्र में फेंकने की कहानी एक सुलेख कथा जैसी लगती है।”ये टिप्पणियां स्पष्ट करती हैं कि शीर्ष अदालत इस विषय को न तो भावनात्मक चश्मे से देखती है, न राजनीतिक; बल्कि शुद्धत: कानूनी स्थिति और राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से।

सरकार की आपत्ति: “PIL की लोकस स्टैंडी ही संदिग्ध है”केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने PIL की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा:“याचिका किसी प्रभावित व्यक्ति ने दायर नहीं की। यह महज सार्वजनिक हित का आवरण ओढ़े मुद्दा है।”जवाब में याचिकाकर्ता की वकील ने कहा कि PIL में ‘लोकस’ का प्रश्न उठाना ही गलत है।बेंच ने इस पर कहा कि यह मुद्दा कई लम्बित मामलों से जुड़ा है और इन्हें एक साथ समेकित रूप से सुना जाना बेहतर होगा।

जटिल और संवेदनशील मुद्दे पर अब होगी व्यापक सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि रोहिंग्या जैसे मुद्दे केवल मानवीय नहीं, बल्कि कानूनी, प्रशासनिक, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से जुड़े हैं।इसलिए बिना कानूनी दर्जा स्पष्ट किए किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाज़ी होगी।

निष्कर्ष

सुनवाई का पूरा स्वरूप इस बात का संकेत है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मसले को देश की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय दायित्वों और मानवाधिकार—तीनों के मध्य संतुलन बनाकर देखना चाहता है।सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अब भी यही है—**क्या भारत बिना कानूनी दर्जे वाले विदेशी नागरिकों को ‘घुसपैठिया’ माने या ‘शरणार्थी’?और इस स्थिति के आधार पर उनके अधिकार—सीमित, विस्तृत या नगण्य—कब और कैसे निर्धारित हों?

आने वाली सुनवाई में इन प्रश्नों के उत्तर देश की आप्रवासन नीति को नई दिशा दे सकते हैं।

NSK

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *