बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 3 दिसंबर
अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश की राजनीति जिस दिशा में बढ़ रही है, उसने पूरे दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को हिला दिया है। BNP की रफ्तार थमती दिख रही है, और कभी प्रतिबंधित रही जमात-ए-इस्लामी अभूतपूर्व तरीके से उभर रही है।अमेरिकन थिंक-टैंक IRI के सर्वे के मुताबिक, BNP को 33% और जमात को 29% वोट मिलने की संभावना दिखाई गई—
यानी मुकाबला बहुत करीबी है।बांग्लादेश के 2026 फरवरी चुनावों में अगर जमात सत्ता में आती है, तो यह न केवल ढाका की राजनीति का नक्शा बदलेगा, बल्कि भारत की सुरक्षा, कूटनीति और पूर्वी सीमा की स्थिरता पर भी गहरा असर पड़ेगा।जमात का उभार: ढाका यूनिवर्सिटी से शुरुआत, पूरे देश तक प्रभावशेख हसीना के बाहर होने के बाद पहली बार जमात के छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिबिर ने ढाका यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन जीत ली—
जो वहां का सबसे बड़ा सूचक है कि जमीन पर हवा किस दिशा में बह रही है।राजशाही, चटगांव और जाहानगीर नगर यूनिवर्सिटी में भी शिबिर का दबदबा दिखा। BNP की गिरती विश्वसनीयता और आंतरिक अराजकता ने जमात को क्लीन स्लेट पर खुद को नए विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने का मौका दिया।भारत क्यों चिंतित?
जमात की जीत का संभावित प्रभाव जमात-ए-इस्लामी हमेशा से—प्रो-पाकिस्तान झुकाव1971 युद्ध अपराधों में शामिल नेताओं का इतिहास 2001–2006 में BNP-जमात सरकार के दौरान भारत-विरोधी आतंकी गतिविधियों को शह—इन कारणों से भारत के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जाती रही है।
2004 में पकड़े गए 10 ट्रक हथियार, ULFA-जैसे संगठनों को खुलेआम संरक्षण, और ISI की गहरी पैठ…
ये सब भारत की सुरक्षा एजेंसियों की यादों में आज भी ताज़ा है।आज बांग्लादेश में वही राजनीतिक धारा फिर उभर रही है, यह भारत के लिए चेतावनी है।BNP क्यों पिछड़ रही है, जमात क्यों आगे बढ़ रही है?
1. जनता का BNP से मोहभंग वसूली, जमीन कब्जे और स्थानीय गुंडागर्दी से BNपी समर्थकों की छवि बिगड़ी।
लोगों की शिकायत है—“हसीना को हटाया, पर अब BNP भी वैसी ही लगने लगी है।
”2. जमात की ‘रक्षक’ छविकई जगहों पर जमात ने हिंदू परिवारों तक की मदद की, जहाँ पुलिस या प्रशासन नदारद थे।इससे अल्पसंख्यकों के कुछ वर्ग भी चुपचाप उनके प्रति सहानुभूति दिखा रहे हैं।
3. आवामी लीग के प्रतिबंध का लाभ हिंदू वोटों का बड़ा हिस्सा आवामी लीग के पास था। अब उनके पास विकल्प हैं—या तो वोट न दें, या जमात को “कम बुराई” मानकर समर्थन दें।
मौलाना मदनी और सपा सांसद मोहबिला नदमी के ‘जिहाद’ बयान ने भारत में बढ़ाया तनाव
जहाँ बांग्लादेश में इस्लामिक राजनीति उभर रही है, वहीँ भारत में भी हालिया बयानों ने चिंता और राजनीतिक विरोध को हवा दी।मौलाना महमूद मदनी का विवादित बयान मदनी ने एक सभा में “देश में धार्मिक जुल्म के खिलाफ जिहाद” जैसे शब्दों का प्रयोग किया।उनके आलोचकों का कहना है कि यह बयान देश के माहौल को भड़काने वाला है।
सपा सांसद मोहबिला नदमी का संसद में बयान
संसद में उन्होंने खड़े होकर“हम जिहाद जारी रखेंगे, चाहे किसी को अच्छा लगे या बुरा”जैसा टिप्पणी की, जिसने संसद से लेकर सोशल मीडिया तक जबरदस्त राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों, शिक्षाविदों और वरिष्ठ पत्रकारों की प्रतिक्रियाएँ1.
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अवधेश मिश्र“बांग्लादेश में जमात का उभार और भारत में धार्मिक कट्टरता वाली बयानबाजी—दोनों समानांतर खतरे हैं।
जमात की जीत भारत के पूर्वोत्तर में उग्रवाद को पुनर्जीवित कर सकती है।मदनी–नदमी जैसे बयान उस नैरेटिव को अंदर से मजबूत करते हैं।
”2. शिक्षाविद डॉ. समीरा घोष“अल्पसंख्यक अधिकारों की आड़ में ‘जिहाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल सामाजिक तनाव को गहरा करता है।इन बयानों का लाभ भारत में कट्टरपंथी संगठन उठाते हैं, और बांग्लादेश की सियासत में जमात जैसी पार्टियाँ इन्हें अपने नैरेटिव के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं।
3. वरिष्ठ पत्रकार आलोक शर्मा“बांग्लादेश की राजनीति भारत की घरेलू राजनीति को भी प्रभावित करती है।जमात के उभरने और भारत में कट्टर इस्लामी बयानबाजी का समय एक जैसा होना संयोग नहीं है।भारत को अब ‘हसीना वाली सरल विदेश नीति’ पर निर्भर रहने की भूल नहीं करनी चाहिए।
”4. सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ आर.एस. नागर“2001–2006 में जमात–BNP के समय भारत की सीमाएँ सबसे असुरक्षित थीं।अगर जमात फिर सत्ता में आती है, और भारत में राजनीतिक बयानबाजी से अंदरूनी तनाव बढ़ता है,तो यह दो मोर्चों पर सुरक्षा चुनौती बन सकता है।
”भारत के लिए संभावित रणनीति यदि बांग्लादेश में जमात जीतती है—
सीमा सुरक्षा को 2000 के दशक जैसी प्राथमिकता देनी होगी पूर्वोत्तर में उग्रवाद पर अतिरिक्त निगरानी बंगाली हिंदू आबादी के पलायन पर तैयारियाँ कूटनीतिक रूप से नई ढाका सरकार से शुरुआती सख्त क्लियर लाइन्स भारत को “हसीना युग” वाली सहजता अब भूलनी पड़ेगी।
निष्कर्ष:
दक्षिण एशिया के लिए निर्णायक समय BNP और जमात के बीच मात्र 4% का अंतर है।
वोटिंग के कुछ महीनों में हवा किसी भी दिशा में मुड़ सकती है।लेकिन संकेत साफ़ हैं—
बांग्लादेश की राजनीति धर्म आधारित ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है भारत में भी विवादित बयान माहौल को संवेदनशील बना रहे हैंआने वाले दो साल दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक परीक्षा साबित हो सकते हैं
भारत को पूरी तैयारी और नई रणनीतिक दृष्टि के साथ इस नए दौर में प्रवेश करना होगा।
