क्या भारत के सैन्य ठिकानों से हमला कर सकता है अमेरिका? जानिए क्या कहता है LEMOA समझौता

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 6 मार्च

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और हाल ही में ईरानी युद्धपोत IRIS Dena के डूबने की घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिदृश्य में एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ है—क्या अमेरिका भारत के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल किसी हमले के लिए कर सकता है?

सोशल मीडिया और कुछ रणनीतिक हलकों में यह दावा किया जा रहा था कि भारत और अमेरिका के बीच हुए Logistics Exchange Memorandum of Agreement (LEMOA) के तहत अमेरिकी सेना भारतीय बेस का उपयोग कर सकती है।हालांकि भारत सरकार और रक्षा विशेषज्ञों ने इन दावों को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा है कि यह समझौता सिर्फ लॉजिस्टिक सहयोग तक सीमित है, न कि सैन्य कार्रवाई के लिए।

क्या है LEMOA समझौता

भारत और अमेरिका के बीच Logistics Exchange Memorandum of Agreement (LEMOA) पर 29 अगस्त 2016 को हस्ताक्षर किए गए थे। यह समझौता अमेरिकी राजधानी Washington, D.C. में संपन्न हुआ था।इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच लॉजिस्टिक सपोर्ट, सप्लाई और सेवाओं के आदान-प्रदान के नियम तय करना है।दरअसल, यह अमेरिकी लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट (LSA) का भारतीय संस्करण है, जैसा अमेरिका कई अन्य देशों के साथ कर चुका है।

समझौते में क्या-क्या शामिल है

इस समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का सीमित उपयोग कर सकते हैं, लेकिन केवल लॉजिस्टिक उद्देश्यों के लिए। इसमें शामिल हैं—नौसैनिक जहाजों का बंदरगाहों पर ठहरना (Port Calls)संयुक्त सैन्य अभ्यास सैन्य प्रशिक्षण मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR)इसके अलावा हर मामले में पूर्व अनुमति अनिवार्य होती है। यानी किसी भी सैन्य गतिविधि के लिए संबंधित सरकार की मंजूरी जरूरी होती है।

लॉजिस्टिक सहयोग का मतलब क्या

इस समझौते के अंतर्गत निम्न सुविधाएं दी जा सकती हैं—ईंधन और रिफ्यूलिंग भोजन और पानीश्रसैन्य उपकरणों की मरम्मत और रखरखाव चिकित्सा सहायता परिवहन और संचार सेवाएं गोदाम और स्टोरेज सुविधा स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सेवाएं इन सेवाओं के बदले या तो नकद भुगतान किया जाता है या फिर बराबर मूल्य की सेवाएं प्रदान की जाती हैं।

क्या इससे सैन्य बेस बन सकते हैं?

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस समझौते में किसी भी विदेशी सेना को भारत में स्थायी सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति नहीं है।इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह केवल लॉजिस्टिक सहयोग का समझौता है और किसी भी देश को संयुक्त सैन्य अभियान के लिए बाध्य नहीं करता।

पोत डूबने की घटना क्यों अहम

हाल ही में ईरानी युद्धपोत IRIS Dena के डूबने की घटना ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है।यह पोत भारत में आयोजित बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास Exercise Milan में भाग लेने के लिए भारत आया था और 18 से 25 फरवरी तक यहां मौजूद रहा।इस अभ्यास में दुनिया के कई देशों की नौसेनाओं के 80 से अधिक युद्धपोत शामिल हुए थे। इसकी नौसैनिक परेड की समीक्षा भारत की राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने की थी।

रणनीतिक रूप से संवेदनशील इलाका

घटना जिस समुद्री क्षेत्र में हुई, वह हिंद महासागर का रणनीतिक इलाका माना जाता है।विशेष रूप से Indian Ocean में श्रीलंका के दक्षिण का समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।यदि इस क्षेत्र में किसी प्रकार का सैन्य संघर्ष होता है तो वैश्विक शिपिंग और ऊर्जा सप्लाई प्रभावित हो सकती है।

सरकार की स्पष्ट नीति

भारत सरकार ने साफ किया है कि देश की नीति किसी भी विदेशी शक्ति को हमले के लिए भारतीय सैन्य अड्डों का उपयोग करने की अनुमति नहीं देती। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर कायम है और किसी भी सैन्य कार्रवाई में सीधे शामिल होने से पहले अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।

रक्षा विशेषज्ञों की राय

रक्षा विश्लेषक कैप्टन डीके शर्मा का कहना है कि“ईरानी पोत भारत के निमंत्रण पर नौसैनिक अभ्यास में जरूर आया था, लेकिन घटना के समय वह भारतीय जल सीमा से बाहर था। इसलिए इस घटना की जिम्मेदारी भारत पर नहीं डाली जा सकती।”उनके अनुसार LEMOA को लेकर फैलाई जा रही कई धारणाएं वास्तविकता से अलग हैं।

कूटनीतिक विशेषज्ञों का दृष्टिकोण

विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग पिछले दशक में काफी मजबूत हुआ है, लेकिन भारत ने हमेशा स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखी है।उनके अनुसार भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी रखते हुए भी किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बना है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार से पारदर्शिता की मांग की है। कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार को संसद में यह स्पष्ट करना चाहिए कि भारत की रक्षा संधियों और समझौतों की सीमा क्या है और किन परिस्थितियों में विदेशी सेनाओं को भारतीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

रणनीतिक संतुलन की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को एक साथ कई रणनीतिक समीकरणों को संतुलित करना पड़ता है—अमेरिका के साथ रक्षा सहयोगपश्चिम एशिया के देशों के साथ ऊर्जा संबंधहिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षाऐसे में LEMOA जैसे समझौते भारत को लॉजिस्टिक सहयोग का ढांचा तो देते हैं, लेकिन सैन्य निर्णय पूरी तरह भारतीय संप्रभुता के अधीन रहते हैं।

निष्कर्ष

वर्तमान भू-राजनीतिक तनाव के बीच यह स्पष्ट है कि भारत की विदेश और रक्षा नीति का मूल सिद्धांत रणनीतिक स्वायत्तता और संतुलन है। LEMOA जैसे समझौते सहयोग को बढ़ाते जरूर हैं, लेकिन वे किसी भी देश को भारत की भूमि या सैन्य अड्डों का इस्तेमाल युद्ध के लिए करने की खुली छूट नहीं देते।यही कारण है कि भारत वैश्विक शक्ति समीकरणों के बीच सहयोग और स्वतंत्रता दोनों को साथ लेकर चलने की नीति पर आगे बढ़ रहा है।

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