गीता पाठ कार्यक्रम में ममता की गैर मौजूदगी पर सियासी भूचाल ‘भाजपा का कार्यक्रम था, मैं कैसे जाती’ — मुख्यमंत्री का बयान बना विवाद

बी के झा

कोलकाता/ नई दिल्ली, 8 दिसंबर

कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में हुए विशाल भगवद्गीता पाठ कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अनुपस्थिति ने बंगाल की राजनीति में नया तूफ़ान खड़ा कर दिया है।राज्यपाल, शीर्ष संत-संस्थाएँ और लाखों भक्तों की मौजूदगी वाले इस कार्यक्रम में ममता बनर्जी को निमंत्रण तो मिला, लेकिन वह नहीं पहुँचीं।इसके बाद उन्होंने कहा—यह भाजपा का कार्यक्रम था, मैं कैसे जाती? अगर कार्यक्रम निष्पक्ष होता, तो मैं अवश्य जाती।”लेकिन उनके इस बयान ने बंगाल की राजनीति का तापमान अचानक कई डिग्री बढ़ा दिया है।

ममता बनर्जी का बयान — भाजपा पर सीधा निशाना उत्तर बंगाल दौरे से पहले एयरपोर्ट पर ममता ने कहा—मैं सब धर्मों का सम्मान करती हूँ। लेकिन मैं ऐसे कार्यक्रम में क्यों जाऊँ जहाँ भाजपा सीधे तौर पर जुड़ी हो?जो लोग नेताजी सुभाष चंद्र बोस और गांधी के आदर्शों से नफरत करते हैं, उनके साथ मैं कैसे मंच साझा कर सकती हूँ?”

उन्होंने आरोप लगाया कि—जो बंगाल का अपमान करते हैं, जो बांग्ला संस्कृति के खिलाफ हैं, उनके कार्यक्रम में जाना मेरे सिद्धांतों के खिलाफ है।”

बीजेपी का पलटवार — ‘ममता की आस्था संदिग्ध, हिंदू विरोधी चेहरा उजागर’विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी और बंगाल बीजेपी नेताओं ने ममता को घेरते हुए कहा—एक सच्चा हिंदू गीता पाठ के निमंत्रण को ठुकरा ही नहीं सकता।ममता बनर्जी ने अपनी प्राथमिकता साफ कर दी — वोट बैंक पहले, संस्कृति बाद में।”बीजेपी ने इसे राजनीतिक नहीं बल्कि “आस्था का अपमान” बताया।शुभेंदु अधिकारी का बयान—हमने तो कई ईद-मिलाद, मुहर्रम और चर्च कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री को देखा है।फिर गीता पाठ से क्यों दूरी? यह हिंदू विरोधी मानसिकता नहीं तो क्या है?बीजेपी आईटी सेल ने इसे “ममता की दोहरी राजनीति” बताते हुए सोशल मीडिया पर जोरदार अभियान शुरू कर दिया।

हिंदू संगठनों का आक्रोश — ‘यह सिर्फ कार्यक्रम नहीं, सनातन संस्कृति का सम्मान था’विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, और कई संत संगठनों ने सामूहिक रूप से प्रतिक्रिया दी—मुख्यमंत्री का यह निर्णय करोड़ों सनातन भक्तों की भावनाओं की अनदेखी है।यह आयोजन राजनीतिक नहीं, आध्यात्मिक था।”एक प्रसिद्ध बंगाल के संत ने कहा—जहाँ गीता हो, वहाँ राजनीति नहीं होती।अगर कोई गीता के मंच से दूर रहता है, तो वह अपनी आध्यात्मिक चेतना खो चुका है।”

धर्मगुरुओं का मत — “गीता का संदेश सबके लिए, किसी दल की संपत्ति नहीं”कुछ प्रमुख धर्मगुरुओं ने अधिक संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा—गीता किसी राजनीतिक पार्टी की बपौती नहीं।लेकिन मुख्यमंत्री जैसे पद पर आसीन व्यक्ति का इस पवित्र कार्यक्रम से दूर रहना दुर्भाग्यपूर्ण है।”एक प्रसिद्ध आचार्य ने कहा—गीता पाठ का आयोजन जनता, धर्म और संस्कृति का था।इसे भाजपा कार्यक्रम बताकर न जाना असहज निर्णय है।

राजनीतिक विश्लेषक — ‘ममता ने चुनावी रणनीति के तहत दूरी बनाई है’विश्लेषकों का मानना है कि—

बंगाल का हिंदू वोट बेस बंगाल राजनीति में निर्णायक बन रहा हैगीता पाठ में लाखों लोगों की भीड़ ने यह संकेत दिया कि आने वाले चुनावों में हिंदू पहचान एक बड़ा मुद्दा बनने वाली है।

ममता तृणमूल को मुस्लिम वोट base खोने से बचाना चाहती हैंइसलिए उन्होंने गीता पाठ को “भाजपा से जुड़ा कार्यक्रम” कहकर दूरी बनाई।

लेकिन यह रणनीति उल्टी भी पड़ सकती हैक्योंकि भाजपा इसे “हिंदू विरोधी रवैया” बताकर पूरी तरह भुनाने की कोशिश में है।

विवादित बयान — ममता खुद अपने बयान में फंसती दिखीं?राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, ममता का यह कहना—यह भाजपा का कार्यक्रम था, इसलिए नहीं गई”उनके विरोधियों को बड़ा हथियार दे देता है।क्योंकि—

गीता न तो भाजपा की है

न किसी पार्टी की

बल्कि संपूर्ण भारत की सांस्कृतिक आत्मा हैविश्लेषक इसे Mamata vs Hindu Sentiments जैसा नया राजनीतिक समीकरण मान रहे हैं।

निष्कर्ष — ‘

गीता पाठ’ बना नया राजनीतिक युद्धक्षेत्र कोलकाता में हुआ गीता पाठ सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा।यह अब—हिंदू पहचान चुनावी रणनीति बंगाल की सांस्कृतिक राजनीति भाजपा–तृणमूल टकराव का केंद्र बिंदु बन चुका है।ममता की अनुपस्थिति नेबंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय खोल दिया है—जहाँ गीता अब सिर्फ आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि चुनावी विमर्श का भी हिस्सा बन चुकी है।

NSK

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