बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 19 दिसंबर
पड़ोसी देश बांग्लादेश में विद्रोही नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद भड़की हिंसा केवल आंतरिक अस्थिरता की कहानी नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की सुरक्षा, भारत की क्षेत्रीय अखंडता और कट्टरपंथी विचारधाराओं के उभार से जुड़ा एक गंभीर संकेत भी है। ढाका से चटगांव तक फैले विरोध प्रदर्शनों, शेख मुजीबुर्रहमान के ऐतिहासिक आवास पर तोड़फोड़ और भारतीय उच्चायोग पर पत्थरबाजी ने साफ कर दिया है कि मामला अब केवल बांग्लादेश की राजनीति तक सीमित नहीं रहा।कौन था उस्मान हादी और क्या था उसका एजेंडा 34 वर्षीय उस्मान हादी, शेख हसीना विरोधी आंदोलन का प्रमुख चेहरा और ‘इंकलाब मंच’ का प्रवक्ता, खुद को बांग्लादेशी राष्ट्रवाद का रक्षक बताता था। लेकिन उसके राष्ट्रवाद की बुनियाद भारत विरोध और विस्तारवादी सोच पर टिकी थी। हादी खुले तौर पर भारत को दुश्मन राष्ट्र की तरह चित्रित करता था और ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ के सपने को वैचारिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता था।उसने हाल ही में एक ऐसा नक्शा साझा किया था, जिसने नई दिल्ली से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक चिंता बढ़ा दी—
एक नक्शा, जिसमें भारत के कई राज्यों को कथित “विस्तारित बांग्लादेश” का हिस्सा दिखाया गया था।ग्रेटर बांग्लादेश प्लान: एक भड़काऊ अवधारणा‘ग्रेटर बांग्लादेश’ कोई नई अवधारणा नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इसे जिस तरह पुनर्जीवित किया गया, उसने इसे खतरनाक बना दिया। यह विचार एक ऐसे बांग्लादेश की कल्पना करता है, जिसमें भारत और म्यांमार के बड़े हिस्से शामिल हों। अगस्त 2025 में ढाका विश्वविद्यालय की एक प्रदर्शनी में जब इस तरह का मानचित्र सार्वजनिक हुआ, तब अंतरराष्ट्रीय हलकों में भी हलचल मच गई।इस नक्शे में भारत के पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, ओडिशा, असम, त्रिपुरा और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के साथ-साथ म्यांमार का अराकान क्षेत्र शामिल दिखाया गया।
यह अवधारणा ऐतिहासिक बंगाल सल्तनत (1352–1538) के संदर्भों का सहारा लेकर आधुनिक सीमाओं को चुनौती देने का प्रयास करती है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
: विचारधारा से अस्थिरता तक राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, हादी की सोच राष्ट्रवाद, इस्लामवाद और भारत विरोध की खतरनाक तिकड़ी का उदाहरण है। एक वरिष्ठ विश्लेषक का कहना है, “जब आंतरिक असंतोष को बाहरी दुश्मन गढ़कर दिशा दी जाती है, तो वह विचारधारा हिंसा में बदल जाती है।” उनका मानना है कि शेख हसीना के पतन के बाद सत्ता-शून्य और अस्थिर माहौल में ऐसी कट्टर सोच को जमीन मिली।
हिन्दू संगठनों की चेतावनी
हिन्दू संगठनों ने इस घटनाक्रम को बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से जोड़कर देखा है। उनका कहना है कि भारत विरोधी और विस्तारवादी नारों की आड़ में बांग्लादेशी हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है। संगठनों ने भारत सरकार से कड़े कूटनीतिक और सुरक्षा कदम उठाने की मांग की है।
रक्षा विशेषज्ञों का आकलन
भारतीय रक्षा विशेषज्ञ इसे केवल “नक्शों की राजनीति” नहीं मानते। उनके अनुसार, इस तरह की अवधारणाएं भविष्य में घुसपैठ, कट्टरपंथी नेटवर्क और सीमापार अस्थिरता को बढ़ावा दे सकती हैं। विशेषज्ञों ने चीन और पाकिस्तान की संभावित भूमिका की ओर भी इशारा किया है—खासतौर पर तब, जब चीन तीस्ता नदी परियोजना के लिए लगभग एक अरब डॉलर का प्रस्ताव दे रहा है और चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश त्रिपक्षीय संपर्क बढ़ता दिख रहा है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
भारत के राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए एकजुट रुख अपनाने की बात कही है। सत्तापक्ष इसे भारत की संप्रभुता पर सीधी चुनौती मान रहा है, जबकि विपक्ष का कहना है कि पड़ोसी देशों में हो रहे वैचारिक बदलावों को नजरअंदाज करना भविष्य में भारी पड़ सकता है।
विदेश मंत्रालय का सख्त संदेश
भारतीय विदेश मंत्रालय पहले ही इन घटनाक्रमों पर चिंता जता चुका है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद में स्पष्ट किया था कि सरकार बांग्लादेश में उभर रही इन गतिविधियों पर “करीबी नजर” रखे हुए है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय है। कूटनीतिक हलकों में इसे संकेत माना जा रहा है कि भारत किसी भी विस्तारवादी या भारत विरोधी एजेंडे को बर्दाश्त नहीं करेगा।
निष्कर्ष
उस्मान हादी की मौत के बाद भड़की हिंसा ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि विचारधाराएं जब इतिहास, धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर भड़काई जाती हैं, तो वे पूरे क्षेत्र की शांति के लिए खतरा बन जाती हैं।
‘ग्रेटर बांग्लादेश’ का सपना भले ही हकीकत से दूर हो, लेकिन उसकी सोच दक्षिण एशिया के लिए एक चेतावनी है। भारत के लिए यह केवल पड़ोसी देश की आंतरिक राजनीति नहीं, बल्कि सीमाओं, सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है—
जिसका जवाब केवल सतर्कता, कूटनीति और राष्ट्रीय एकजुटता से ही दिया जा सकता है।
