बी के झा
NSK

नई दिल्ली, ,12 नवंबर
मानवता ने आखिरी बार 50 वर्ष पहले चंद्रमा की सतह को छुआ था। तब से लेकर अब तक किसी ने दोबारा चंद्रमा पर कदम नहीं रखा। मगर अब चीन उस ऐतिहासिक सफर को फिर से लिखने की तैयारी में है। बीजिंग की महत्वाकांक्षा है कि 2030 तक चीनी अंतरिक्ष यात्री (Taikonauts) चंद्रमा की सतह पर उतरें — और यह योजना अब पूरी तरह “ट्रैक पर” बताई जा रही है।अक्टूबर 2025 में चीन के मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रवक्ता ने घोषणा की कि “हम अपने तय लक्ष्यों पर मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं।
”परिणामस्वरूप, अमेरिका में चिंता की लहर दौड़ गई है। नासा का डर साफ है —
अगर चीन पहले चंद्रमा पर उतर गया, तो अंतरिक्ष नेतृत्व में अमेरिका की ऐतिहासिक बढ़त को गहरी चुनौती मिल सकती है।
नए युग की अंतरिक्ष दौड़ — चीन बनाम अमेरिका 21वीं सदी की नई स्पेस रेस अब खुलकर सामने आ रही है।जहां नासा Artemis III मिशन के तहत 2027 में मानवों को फिर से चंद्रमा पर भेजने की तैयारी कर रहा है, वहीं चीन की योजना इससे महज़ दो-तीन साल पीछे नहीं है।आर्टेमिस-III मिशन, 1972 के अपोलो-17 के बाद पहली बार अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजेगा। लेकिन परियोजना में देरी से चीन और अमेरिका का टकराव अब लगभग आमने-सामने है।अगर चीन अपनी योजना पर कायम रहता है और पहले लैंड करता है — तो यह इतिहास में पहली बार होगा जब अमेरिका के अलावा कोई देश मानव को चंद्रमा पर उतारेगा।
बीजिंग की तैयारियों की झलक —
दो दशक की वैज्ञानिक यात्रा
चीन की अंतरिक्ष यात्रा 2003 में शुरू हुई, जब यांग लीवेई ने शेंझोउ-5 मिशन के तहत अंतरिक्ष में प्रवेश किया।उसके बाद से चीन नेदो सदस्यीय दल भेजा,फिर तीन सदस्यीय मिशन किया,और पहला चीनी स्पेसवॉक कर दिखाया।इसके बाद चीन ने अपना ‘तियानगोंग’ अंतरिक्ष स्टेशन बनाया — जो अब पृथ्वी की निचली कक्षा में उसकी स्थायी प्रयोगशाला है।2030 में जब अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) सेवानिवृत्त होगा, तो चीन पृथ्वी कक्षा में एकमात्र सक्रिय स्थायी स्टेशन वाला देश बन जाएगा।
शेंझोउ-21 मिशन: लगातार बढ़ती अंतरिक्ष उपस्थिति31 अक्टूबर को चीन ने शेंझोउ-21 मिशन लॉन्च किया।
तीन अंतरिक्ष यात्रियों को तियानगोंग कक्षीय स्टेशन भेजा गया, जिन्होंने अप्रैल से कार्यरत दल से कमान संभाली।यह नियमित अदला-बदली अब चीन के लिए सामान्य बन चुकी है — और यही भविष्य के चंद्र अभियानों की अभ्यासशाला भी है।हालांकि, हालिया मिशन के दौरान अंतरिक्ष कचरे से टकराव की घटना ने यह भी याद दिला दिया कि अंतरिक्ष आज भी एक खतरनाक, अस्थिर और शत्रुतापूर्ण क्षेत्र है।🔭 तकनीकी शक्ति का प्रदर्शन — ‘लॉन्ग मार्च’ से ‘मेंगझोउ’ तक1970 के दशक से लेकर अब तक चीन ने अपने लॉन्ग मार्च रॉकेट परिवार के 20 से अधिक संस्करण विकसित किए हैं — जिनमें से 16 वर्तमान में सक्रिय हैं।इनकी सफलता दर 97% है, जो SpaceX Falcon 9 की 99.46% दर से बस थोड़ा कम है।अगस्त 2025 में चीन ने अपने नवीनतम लॉन्ग मार्च-10 रॉकेट का सफल ग्राउंड टेस्ट किया — यही रॉकेट 2030 में मेंगझोउ क्रू कैप्सूल को चंद्रमा की कक्षा तक पहुंचाएगा।यह शेंझोउ यान की जगह लेगा और चीन के पहले मानवयुक्त चंद्र अभियान का आधार बनेगा।
अंतरिक्ष राजनीति का नया समीकरण
चीन के इस मिशन का वैज्ञानिक पहलू जितना गौरवशाली है, उतना ही इसका भूराजनीतिक पहलू भी गहरा है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीन सफल होता है, तो यह अंतरिक्ष क्षेत्र में अमेरिका के एकाधिकार का अंत होगा।अमेरिका दशकों तक चंद्रमा पर “मानव उपस्थिति” का प्रतीक रहा, पर अब एशिया से उठती नई ताकत उसके वर्चस्व को सीधी चुनौती दे रही है।नासा के एक वरिष्ठ अधिकारी के शब्दों में —अगर चीन पहले पहुंच गया, तो यह सिर्फ वैज्ञानिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक हार होगी।”
निष्कर्ष
नया युग, नई दौड़, नया नेतृत्व चीन का यह चंद्र मिशन केवल अंतरिक्ष यात्रा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व का प्रतीक बन चुका है।2030 का दशक तय करेगा कि आने वाले सदी में “अंतरिक्ष की राजधानी” कौन बनेगा —वॉशिंगटन या बीजिंग?
