बी के झा
नई दिल्ली, 23 जनवरी
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते परिदृश्य में एक साधारण फोन कॉल भी कई गहरे संकेत दे जाता है। ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किया गया हालिया फोन कॉल भी कुछ ऐसा ही है। यह बातचीत ऐसे समय हुई है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और ब्राजील—दोनों पर 50 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाकर वैश्विक व्यापार व्यवस्था में हलचल पैदा कर दी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कॉल केवल औपचारिक कूटनीति नहीं, बल्कि अमेरिका-केंद्रित वैश्विक व्यवस्था के विकल्प तलाशने की एक गंभीर पहल है।
ट्रंप बनाम ब्रिक्स:
टैरिफ नहीं, रणनीतिक चेतावनी
ट्रंप प्रशासन का यह कदम महज़ व्यापारिक संरक्षणवाद नहीं माना जा रहा।
रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञों के अनुसार, यह ब्रिक्स देशों को यह स्पष्ट संदेश है कि यदि वे डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देंगे तो आर्थिक दबाव झेलना पड़ेगा।ब्राजील और भारत—दोनों उभरती अर्थव्यवस्थाएँ हैं, दोनों ही ग्लोबल साउथ की आवाज़ माने जाते हैं और दोनों ही ब्रिक्स के सक्रिय स्तंभ हैं। ऐसे में लूला का मोदी को फोन करना रणनीतिक एकजुटता का संकेत माना जा रहा है।
भारत सरकार का दृष्टिकोण: अवसर में बदलता संकट
सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत इस घटनाक्रम को केवल चुनौती नहीं बल्कि एक अवसर के रूप में देख रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि—भारत अब बहुपक्षीय व्यापार ढांचे को मजबूत करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ सकता है AI, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, सेमीकंडक्टर और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में ब्रिक्स सहयोग को नया आयाम मिल सकता है
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ‘ग्लोबल साउथ’ के साझा हितों पर दिया गया जोर इसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
लूला की भारत यात्रा: प्रतीकात्मक नहीं, निर्णायक
19–21 फरवरी की प्रस्तावित भारत यात्रा को कूटनीतिक हलकों में बेहद अहम माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह यात्रा—ब्रिक्स के भीतर भारत-ब्राजील धुरी को मजबूत करेगी ट्रंप के टैरिफ के खिलाफ संयुक्त आर्थिक-राजनीतिक प्रतिक्रिया की जमीन तैयार कर सकती है
AI इम्पैक्ट समिट के जरिए तकनीकी नेतृत्व में ग्लोबल साउथ की भूमिका को रेखांकित करेगी विपक्ष
की प्रतिक्रिया: समर्थन के साथ सवाल
भारतीय विपक्ष ने इस घटनाक्रम का स्वागत तो किया है, लेकिन कुछ सवाल भी उठाए हैं। कांग्रेस और वामपंथी दलों का कहना है कि—सरकार को अमेरिका के साथ टकराव और संतुलन—दोनों को स्पष्ट करना चाहिए टैरिफ का असर भारतीय MSME और कृषि निर्यात पर न पड़े, इसके लिए ठोस योजना सामने आनी चाहिए हालांकि अधिकांश विपक्षी नेताओं ने यह भी स्वीकार किया कि ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ में भारत की बढ़ती भूमिका एक सकारात्मक संकेत है।
भारतीय उद्योग जगत: सतर्क आशावादभारतीय उद्योगपतियों और निर्यातकों की प्रतिक्रिया मिश्रित रही है। CII और FICCI से जुड़े उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि—अमेरिका का टैरिफ अल्पकालिक झटका है लेकिन ब्राजील, अफ्रीका और एशिया के नए बाजारों में रणनीतिक विस्तार का अवसर भी है
कुछ बड़े उद्योग समूहों ने भारत-ब्राजील मुक्त व्यापार और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की संभावनाओं को भविष्य की दिशा बताया है।
निष्कर्ष:
क्या बन रहा है नया वैश्विक संतुलन?
लूला-मोदी संवाद केवल द्विपक्षीय मित्रता नहीं, बल्कि एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ता कदम प्रतीत होता है। ट्रंप की आक्रामक नीतियाँ जहां दबाव बना रही हैं, वहीं भारत जैसे देश इसे नेतृत्व के अवसर में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।अब सवाल यह नहीं कि अमेरिका क्या चाहता है,
बल्कि यह है कि ग्लोबल साउथ कितनी संगठित आवाज़ बन पाता है—
और उस आवाज़ का केंद्र क्या भारत बन सकेगा?आने वाले महीने इस प्रश्न का उत्तर देंगे।
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