बी के झा
पटना , तारापुर/ न ई दिल्ली, 1 नवंबर
बिहार विधानसभा चुनाव के बीच तारापुर सीट इस बार पूरे राज्य ही नहीं, बल्कि देश की निगाहों का केंद्र बन गई है। यहां से मैदान में हैं भाजपा के दिग्गज नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जिनके सामने आरजेडी के अरुण कुमार और जन सुराज पार्टी के डॉ. संतोष कुमार सिंह एक सशक्त चुनौती पेश कर रही हैं।
यह मुकाबला सिर्फ एक विधानसभा सीट का नहीं, बल्कि एक परिवार की राजनीतिक विरासत और बिहार के बदलते जातीय समीकरणों की परीक्षा बन गया है।क्यों खास है तारापुर सीटतारापुर विधानसभा सीट मुंगेर जिले में आती है और जमुई लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। यह इलाका अपनी जातीय और राजनीतिक बनावट के लिए हमेशा सुर्खियों में रहा है।
यहां कुशवाहा समुदाय की निर्णायक पकड़ है — जो ओबीसी वर्ग का दूसरा सबसे बड़ा समूह माना जाता है। इसके साथ यादव, मुस्लिम, दलित और अति पिछड़े वर्ग के मतदाता भी चुनाव का पासा पलट सकते हैं।
सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी इस सीट से छह बार विधायक रह चुके हैं और कभी आरजेडी, कभी कांग्रेस, तो कभी समता पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज करते रहे। लेकिन 2010 के बाद से उनका गढ़ कमजोर होता चला गया और यह सीट जेडीयू के कब्जे में चली गई।
सम्राट चौधरी की चुनौती — विरासत बचाने की जद्दोजहदसम्राट चौधरी पहली बार अपने पिता की पारंपरिक सीट से भाजपा के टिकट पर उतर रहे हैं। एक ओर उन्हें उपमुख्यमंत्री और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में सत्ता का चेहरा माना जा रहा है, तो दूसरी ओर स्थानीय नाराजगी और जातीय असंतुलन उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषक प्रो. संजय तिवारी का कहना है —सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे ‘दिल्ली की सत्ता’ के नहीं, ‘तारापुर की ज़मीन’ के नेता साबित हों। लोगों की नाराजगी यह है कि इलाके में अब तक विकास के नाम पर बहुत कम हुआ है।
जन सुराज के डॉ. संतोष कुमार सिंह — बन सकते हैं किंगमेकरइस सीट पर इस बार तीसरा कोण जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार डॉ. संतोष कुमार सिंह लेकर आए हैं। यह वही जन सुराज है, जिसके संस्थापक प्रशांत किशोर ने बिहार की सियासत में वैकल्पिक राजनीति की लहर शुरू की थी।
डॉ. संतोष कुमार सिंह स्थानीय स्तर पर काफी लोकप्रिय हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य व युवाओं के मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहे हैं।स्थानीय मतदाताओं का कहना है किइस बार मुकाबला सम्राट और अरुण कुमार के बीच नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच है।”कई गांवों में जन सुराज के प्रति युवाओं का झुकाव देखा जा रहा है, जो भाजपा और आरजेडी दोनों के लिए सिरदर्द बन चुका है।
आरजेडी के अरुण कुमार — पिछली हार का बदलाआरजेडी उम्मीदवार अरुण कुमार पिछली बार महज 3,800 वोटों से हार गए थे। वे इस बार बदले की भावना के साथ चुनाव मैदान में हैं। आरजेडी ने अपने परंपरागत यादव-मुस्लिम समीकरण को फिर से सक्रिय कर दिया है।उनका दावा है कि इस बार जनता “स्थानीय बनाम बाहरी” मुद्दे पर वोट करेगी।पिछले चुनावों का गणित 2021
उपचुनाव:
जेडीयू के राजीव कुमार सिंह ने 79,090 वोट (46.6%) से जीत हासिल की, जबकि आरजेडी के अरुण कुमार को 75,238 वोट (44.3%) मिले।2020 चुनाव: जेडीयू के मेवालाल चौधरी ने आरजेडी की दिव्या प्रकाश को 7,225 वोटों से हराया।2015 चुनाव: मेवालाल ने हम (सेक्युलर) के शकुनी चौधरी को 11,947 वोटों से मात दी।इन आंकड़ों से साफ है कि यह सीट हर बार करीबी मुकाबले में जाती है, और इस बार त्रिकोणीय नहीं बल्कि चतुष्कोणीय टक्कर तय मानी जा रही है।
स्थानीय लोगों की राय — “सम्राट मुश्किल में हैं”
एक स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा —सम्राट चौधरी अपने ही गृह क्षेत्र में संघर्ष करते दिख रहे हैं। उनके पिता शकुनी चौधरी भी इसी सीट से पराजित हो चुके हैं। जनता में यह भावना है कि दिल्ली की राजनीति करने वाले नेता अब स्थानीय दर्द से दूर हो गए हैं।
उन्होंने आगे कहा —अगर चुनाव आयोग निष्पक्षता से मतदान कराता है, तो इस बार नतीजा चौंकाने वाला हो सकता है। लेकिन मोकामा की घटना ने भरोसा डगमगा दिया है। सरकारी मशीनरी पूरी तरह सत्ता पक्ष के पक्ष में काम कर रही है, ऐसे में निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद करना भोलेपन जैसा है।
”तारापुर की हवा बताएगी बिहार का मूड
6 नवंबर को जब तारापुर में मतदान होगा, तो यह सिर्फ एक सीट का नहीं बल्कि पूरे बिहार के सियासी मिज़ाज का बैरोमीटर साबित होगा।यहां से जो संदेश निकलेगा, वही राज्य की अगली राजनीति की दिशा तय करेगा।अगर सम्राट चौधरी जीतते हैं, तो यह भाजपा के लिए “सत्ता की पुष्टि” होगी; लेकिन अगर हारते हैं, तो यह संकेत होगा कि बिहार की जनता अब सियासी वंशवाद और सत्ता की हनक से आगे बढ़कर स्थानीय नेतृत्व और जन-संवेदना की राजनीति को महत्व दे रही है।
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