बी के झा
NSK


नई दिल्ली/ पटना, 17 नवंबर
बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की बंपर जीत और महागठबंधन की करारी हार के बाद जहाँ विपक्षी दल अभी भी सदमे में है, वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद उदित राज के ताज़ा बयान ने राजनीति में नई आग लगा दी है।
उदित राज ने दावा किया है कि “तेजस्वी यादव असल में जीते नहीं, उन्हें बीजेपी और चुनाव आयोग ने जिताया ताकि चुनाव की निष्पक्षता पर होने वाले शोर-शराबे को शांत किया जा सके।”उन्होंने आरोप लगाया कि “शाम तक तेजस्वी पीछे चल रहे थे, लेकिन रात होते-होते परिणाम पलट गए। यह जीत नहीं, जितवाया जाना है।”‘
SIR और EVM मॉडल से 2029 में BJP 400 पार करेगी’एएनआई से बातचीत में उदित राज ने कहा कि बिहार चुनाव किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि “पहले से तय स्क्रिप्ट” था।
उनके शब्द थे—“जिस तरह SIR और EVM के सहारे NDA ने बिहार में जीत हासिल की है, ठीक उसी फार्मूले से 2029 में भाजपा 400 से अधिक सीटें ला लेगी। इसके बाद संविधान बदलने का रास्ता साफ कर दिया जाएगा।
”उन्होंने यह भी कहा कि देश चीन–रूस मॉडल की ओर बढ़ रहा है, जहाँ चुनाव नतीजे पहले से तैयार होते हैं।राजनीतिक विश्लेषकों के तंज—‘
अगर छिपाने के लिए जीत दिलानी ही थी तो तेज प्रताप को क्यों नहीं?’उदित राज के विस्फोटक आरोपों पर कई राजनीतिक विश्लेषकों ने चुटकी लेते हुए कहा—“
अगर BJP और चुनाव आयोग को अपनी चोरी छिपानी ही थी तो तेजस्वी नहीं, तेज प्रताप को जिता देते।”उनका कहना है कि उदित राज की यह दलील राजनीतिक हताशा का परिणाम अधिक लगती है, न कि किसी ठोस तथ्य पर आधारित विश्लेषण का।
महागठबंधन में भी विरोधाभास—उधर राशिद अल्वी नीतीश को मना रहेएक तरफ उदित राज लगातार NDA नेतृत्व पर निशाना साध रहे हैं, उधर उनके ही सहयोगी कांग्रेस नेता राशिद अल्वी, नीतीश कुमार को मनाने में लगे हैं कि वे महागठबंधन में लौट आएँ और “पूरा पाँच साल मुख्यमंत्री बनकर स्थिर सरकार चलाएँ।
”विश्लेषकों का कहना है कि यदि 1–2 विधायक कम भी हों, तो ओवैसी के पाँच विधायक भी समर्थन देने को तैयार बताए जा रहे हैं।‘नीतीश को न बनाते तो सरकार बन ही नहीं पाती’—वरिष्ठ पत्रकारों का दावा
एक वरिष्ठ पत्रकार ने तर्क दिया कि बीजेपी नेतृत्व यह जानता था कि—
JDU केवल 4 सीट कम थी,नीतीश को कुशवाहा और मांझी का खुला समर्थन था,और महागठबंधन के कुछ विधायक भी साथ आ सकते थे।ऐसी स्थिति में यदि बीजेपी नीतीश को मुख्यमंत्री नहीं बनाती तो सत्ता से दूर होना तय था। इसलिए, “मन मारकर अमित शाह को नीतीश कुमार के नाम पर मुहर लगानी पड़ी।”
लेकिन बड़ा सवाल—क्या नीतीश पूरे 5 साल निकाल पाएँगे?राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि जेडीयू के अंदर ही असंतोष की सेंध मौजूद है।
जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के पुराने बयान को याद किया जा रहा है, जिसमें उन्होंने कहा था—
“BJP बिना JDU के भी सरकार बना सकती है।”विशेषज्ञों का कहना है कि यह बयान किसी “भीतरी विभीषण” की ओर इशारा करता है, जो मौके आने पर महाराष्ट्र की शिवसेना जैसी ‘बंबाडर’ स्थिति भी पैदा कर सकता है।
निष्कर्ष
उदित राज के आरोपों ने पहले से धधक रही बिहार की राजनीतिक जमीन पर और घी डाल दिया है।क्या तेजस्वी वाकई “जिताए गए”?
क्या BJP व EC के खिलाफ यह गंभीर आरोप तथ्य-आधारित हैं या सिर्फ चुनावी निराशा की प्रतिध्वनि?और सबसे बड़ा सवाल—
क्या नीतीश कुमार स्थिरता से पाँच साल सरकार चला सकेंगे, या आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में कोई नया ‘खेला’ होगा?समय ही जवाब देगा, लेकिन फिलहाल बिहार की सियासत नए विवादों के घेरे में है।
