तेजस्वी यादव की गिरती साख के चार जिम्मेदार किरदार, — राजनीति के परदे के पीछे की पूरी कहानी

बी.के. झा

NSK

पटना/ न ई दिल्ली, 14 नवंबर

बिहार की राजनीति में इस बार जो हुआ, वह सिर्फ एक चुनावी हार नहीं है—यह तेजस्वी यादव के नेतृत्व, महागठबंधन की एकजुटता और संगठनात्मक क्षमताओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है। महागठबंधन की हार तो एक बड़ा झटका थी ही, लेकिन राघोपुर जैसे लालू परिवार के अभेद्य किले में जिस तरह तेजस्वी यादव को कड़ा संघर्ष करना पड़ा, वह न सिर्फ राजनीतिक पराजय है, बल्कि प्रतिष्ठा का भी बड़ा नुकसान है।हालांकि इस हालत के लिए तेजस्वी यादव अकेले जिम्मेदार नहीं हैं।

राजनीतिक गलियारे खुलकर बता रहे हैं कि इस विनाशकारी स्थिति के लिए चार प्रमुख किरदार बराबर के दोषी हैं—और इनमें राहुल गांधी से लेकर उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव तक शामिल हैं।

1. राहुल गांधी — सहयोगी कम, बोझ ज्यादा साबित हुए महागठबंधन में कांग्रेस सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी थी, लेकिन इस चुनाव में राहुल गांधी का रवैया और रणनीति, दोनों ही तेजस्वी यादव के खिलाफ चली गईं।क्यों बने राहुल गांधी नुकसान का कारण?कास्ट सेंसस को ही फर्जी करार देना:जिस जातीय सर्वे का श्रेय तेजस्वी पूरे राज्य में गर्व से लेते रहे, राहुल गांधी ने उसी को फर्जी कहकर तेजस्वी के ही एजेंडे को कमजोर कर दिया।

कैंपेन में देर से आना, और आते ही मुद्दा भटकाना:जब वे बिहार पहुंचे तो केंद्र के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निजी हमलों की झड़ी लगा दी—जो बिहार के संदर्भ में कभी फायदेमंद साबित नहीं हुए।

तेजस्वी की छवि धुंधली करना:‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान राहुल गांधी का आगे बढ़कर नेतृत्व करना और तेजस्वी का सिर्फ “बड़े भैया” की भूमिका में दिखना, लालू यादव को भी खटक रहा था, लेकिन वह मजबूरन चुप रहे।सीएम चेहरे की घोषणा भी कांग्रेस के मुंह से:लालू यादव को यह तक करना पड़ा कि तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा कांग्रेस नेताओं से कहलवाना पड़े—

क्योंकि राहुल सीधे यह समर्थन देने से बचते रहे।राहुल गांधी को बिहार में खोने के लिए कुछ नहीं था—लेकिन इन सबका नुकसान तेजस्वी यादव को उठाना पड़ा।

2. मुकेश सहनी — ‘फ्रेंडली फाइट’ में महागठबंधन को ही डुबो दिया महागठबंधन में मुकेश सहनी वो नेता थे जो सत्ता की कुर्सी को छूने की सबसे ज्यादा जल्दी में थे।

तेजस्वी मुख्यमंत्री बनें या न बनें—वे खुद को डिप्टी सीएम के रूप में देख ही रहे थे।15 सीटें लेकर चले आए, लेकिन ओवर कॉन्फिडेंस इतना कि परिणामों में खाता भी नहीं खुला।कई सीटों पर फ्रेंडली फाइट कर महागठबंधन के वोटों को बाँट कर नुकसान किया।

2020 में कांग्रेस का हाल खराब हुआ था, इस बार सहनी की पार्टी जीरो बैलेंस पर पहुंच गई। पर नुकसान? पूरा महागठबंधन उठा गया।

3. प्रशांत किशोर — तीन साल की मुहिम, जिसका लक्ष्य था तेजस्वी यादव को कमजोर करना प्रशांत किशोर कभी जेडीयू के रणनीतिकार रहे, कभी कांग्रेस के साथ, और फिर खुद की ‘जन सुराज’ मुहिम में लगे। लेकिन इस पूरी मुहिम में जिनके खिलाफ उन्होंने सबसे ज्यादा हमले किए—वे तेजस्वी यादव थे।

पूरे बिहार में ‘नौवीं फेल’ वाला कैंपेन तेजस्वी की छवि पर गहरा वार था।पीके ने दावा किया कि जेडीयू 25 सीटों में सिमट जाएगी—पर वास्तविकता ने उनके विश्लेषण को कटघरे में खड़ा कर दिया।खुद कुछ हासिल न कर सके, लेकिन तेजस्वी की साख, गंभीरता और विश्वसनीयता पर बड़ा डैमेज जरूर कर गए।

यह ऐसा कैंपेन था, जो चुनाव भले न जीता, पर दूसरों को जिताने और हराने में जरूर असर दिखा गया।

4. तेज प्रताप यादव — घर का झगड़ा जिसने तेजस्वी को अंदर तक चोट पहुंचाई

राजनीति में बाहरी विरोधियों से ज्यादा खतरनाक होता है—घर का कलह।

तेजप्रताप यादव ने तेजस्वी को अर्जुन माना, खुद को कृष्ण—लेकिन जब राजनीति की बारी आई, तो यह भाईचारा सिर्फ बयानबाजी में ही रह गया।लालू यादव की विरासत तेजस्वी को सौंपे जाने के बाद तेज प्रताप खुद को हाशिए पर महसूस करने लगे।परिवार और पार्टी से दूर जाने के बाद भी उन्होंने तेजस्वी के लिए चुनावी मुश्किलें बढ़ाईं।जिस राघोपुर में तेजस्वी को जीत मिलना तय माना जाता था, वहाँ का संघर्ष तेजप्रताप के बगावती असर के बिना नहीं हो सकता था।तेज प्रताप अपनी सीट हारकर भी राजनीतिक रूप से तेजस्वी पर भारी पड़ गए।

निष्कर्ष

तेजस्वी की चुनौती अब सिर्फ राजनीति नहीं, अपनी छवि बचाने की भी हैबिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव आज जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहाँ से वापसी निश्चित है या नहीं—यह कहना जल्दबाजी होगा, लेकिन इतना तय है कि उनकी राह अब और कठिन हो गई है।

बाहरी विरोधियों से ज्यादा सहयोगियों की मनमानी,रणनीतिकारों के हमले,और परिवार की अंदरूनी खींचतानने उन्हें वह नुकसान पहुंचाया है जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी।तेजस्वी यादव को अब नई राजनीतिक रणनीति, नए सहयोगी, और सबसे अहम—नई छवि के साथ मैदान में उतरना होगा।

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