दिल्ली एनकाउंटर में ढेर हुआ बिहार का खूंखार ‘सिग्मा गैंग’ सरगना रंजन पाठक, चुनाव से पहले रच रहा था खून-खराबे की साजिश

बी के झा

NSK

सीतामढ़ी (बिहार )/नई दिल्ली , 23 अक्टूबर

बिहार के सीमावर्ती जिलों में दहशत का दूसरा नाम बन चुका कुख्यात अपराधी रंजन पाठक आखिरकार पुलिस की गोलियों से ढेर हो गया। दिल्ली के रोहिणी इलाके में बुधवार रात हुए एनकाउंटर में पुलिस ने सिग्मा एंड कंपनी गैंग के चार मोस्ट वांटेड अपराधियों को मार गिराया। मारे गए बदमाशों में रंजन पाठक के अलावा अमन ठाकुर, बिमलेश महतो और मनीष पाठक शामिल हैं।

सूत्रों के अनुसार, ये चारों बिहार विधानसभा चुनाव से पहले किसी बड़ी साजिश को अंजाम देने की फिराक में थे। दिल्ली और बिहार पुलिस की संयुक्त टीम ने महीनों की निगरानी के बाद इस गिरोह के ठिकाने का पता लगाया और बेहद सटीक ऑपरेशन में इसे समाप्त कर दिया।

कौन था रंजन पाठक? ‘सिग्मा एंड कंपनी’ का खूनी मास्टरमाइंड सीतामढ़ी जिले का रहने वाला रंजन पाठक अपराध की दुनिया में ‘सिग्मा एंड कंपनी’ नाम से कुख्यात गिरोह चलाता था। यह गिरोह बिहार-नेपाल सीमा तक फैला था और रंगदारी, सुपारी किलिंग, हथियार तस्करी जैसे मामलों में सक्रिय था।रंजन सिर्फ अपराधी नहीं, बल्कि क्रिमिनल मार्केटिंग का नया चेहरा बन गया था — वह सोशल मीडिया के जरिए अपने खौफ को प्रचारित करता था और अपने हर अपराध की जिम्मेदारी खुद लेता था।

बताया जाता है कि उसकी गैंग को नेपाल के रास्ते से फंडिंग मिलती थी। सिग्मा गैंग की जड़ें बिहार के सीमावर्ती जिलों के अलावा झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक फैली थीं।

हत्याओं की लंबी फेहरिस्त: “डर ही पहचान बने” का जुनून रंजन पाठक ने एक के बाद एक कई सनसनीखेज हत्याओं को अंजाम दिया —बाजपट्टी में आदित्य सिंह की हत्या,परोहा पंचायत की मुखिया रानी देवी के देवर मदन कुशवाहा की हत्या,और ब्रह्मर्षि सेना के जिला अध्यक्ष राम मनोहर शर्मा को दिनदहाड़े गोली मारना।

हर हत्या के बाद रंजन पुलिस और मीडिया को कॉल कर खुलकर जिम्मेदारी लेता था। उसने तो एक बार पत्रकारों को अपने गैंग का नाम बताने और अपनी छवि गढ़ने के लिए ‘क्रिमिनल बायोडेटा’ तक भेजा था।

उसका संदेश साफ था — “डर पैदा करो, नाम बनाओ।”

शिवहर में हुई मुठभेड़ से बच निकला था रंजन

कुछ महीने पहले शिवहर जिले में गुड्डू झा की हत्या के बाद जब पुलिस ने उसका पीछा किया, तो STF और सीतामढ़ी पुलिस के साथ मुठभेड़ में रंजन के चार साथी घायल हुए, मगर वह खुद फरार हो गया।उसके खिलाफ हत्या, लूट, रंगदारी, और अवैध हथियार कारोबार के एक दर्जन से अधिक मामले दर्ज थे।

पुलिस के लिए बना सिरदर्द,

चुनावी सीजन में बड़ा खतरा रंजन पाठक का बढ़ता नेटवर्क बिहार पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गया था। चुनावी मौसम में उसके गैंग की हलचल ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी थी।पुलिस ने कई हफ्तों तक रंजन और उसके साथियों की डिजिटल ट्रैकिंग की। जब दिल्ली के रोहिणी सेक्टर में उनका ठिकाना पक्का हो गया, तो एक संयुक्त ऑपरेशन में चारों अपराधियों को ढेर कर दिया गया।

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक —अगर यह गैंग सक्रिय रहता तो चुनाव के दौरान बिहार में बड़ी वारदातें हो सकती थीं। यह ऑपरेशन न सिर्फ एक आपराधिक गिरोह का अंत है बल्कि चुनावी सुरक्षा के लिहाज से बड़ी सफलता भी।”

‘सिग्मा एंड कंपनी’ का अंत, पर सवाल बाकी रंजन पाठक का अंत भले हो गया, लेकिन उसके पीछे छोड़ी गई खूनी विरासत और नेटवर्क अब भी पुलिस के लिए जांच का विषय है। कई जिलों में उसके समर्थक और सहयोगी अब भी भूमिगत हैं।

सुरक्षा एजेंसियां अब उसके फंडिंग नेटवर्क और हथियार आपूर्ति चैन की तहकीकात में जुट गई हैं।

आखिरी अध्याय:

अपराध की दुनिया में भय और अंत दोनों तय हैं रंजन पाठक ने अपराध की राह चुनी थी, शायद मजबूरी में, जैसा उसने अपने पर्चे में लिखा था — “सिस्टम ने मुझे अपराधी बनाया”।लेकिन सच यही है कि जिस रास्ते पर उसने कदम रखा, वही रास्ता आखिरकार उसकी मौत की पटकथा बन गया।

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