बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 11 नवंबर
दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास हुए धमाके ने न सिर्फ शहर को दहशत में डुबोया, बल्कि कई परिवारों की दुनिया भी उजाड़ दी। कंझावला के रहने वाले 32 वर्षीय पंकज जैन भी उन्हीं में से एक थे—जो रोज की तरह घर से निकले, पर कभी लौट नहीं सके।लोक नायक अस्पताल की मोर्चरी के बाहर खड़े परिजन उस दर्द को शब्दों में बयां नहीं कर पा रहे, जो धमाके की धमक से उनके जीवन में उतर आया है।
पंकज की पहचान उनके पैर पर पुराने फ्रैक्चर के निशान से हुई—और यही वह क्षण था जब परिवार की अंतिम उम्मीद भी टूट गई।पड़ोसी को स्टेशन छोड़ने गया था, वापसी में मिली मौत परिवार के रिश्तेदार निकेश ने बताया कि पड़ोसी दीपक गुप्ता को अपने पैतृक गांव में एक शादी में जाना था। उसने पंकज से कहा कि उसे रेलवे स्टेशन छोड़ दे।“पंकज दोपहर में ही दीपक को लेकर घर से निकला था… बस यही आखिरी बार था उसे देखते हुए,” निकेश की आवाज टूट जाती है।
दीपक को सुरक्षित छोड़ने के बाद पंकज घर लौट रहा था। उसी रास्ते से गुजरते हुए वह उस घातक धमाके की चपेट में आ गया जिसने कई जिंदगियां तबाह कर दीं।मां गेट पर टकटकी लगाए बैठी, पिता की तबीयत बिगड़ी निकेश बताते हैं कि पंकज की मां शाम तक गेट पर बैठकर उसका इंतजार करती रहीं।
हर आहट पर उन्हें लगता—“शायद यही पंकज है।”लेकिन देर रात पुलिस की कॉल ने सबकुछ बिखेर दिया।पंकज के पिता दिल और अस्थमा के मरीज हैं। बेटे की खबर सुनते ही उनकी हालत बिगड़ गई। घर में सन्नाटा गूंजता है और हर दीवार पर सवाल—पंकज क्यों? कैसे? किसने?घर के लिए सहारा था
पंकज पहले एक निजी कंपनी में नौकरी करता था।लेकिन जैसे-जैसे पिता की बीमारी बढ़ी, उसने नौकरी छोड़कर उनकी कैब चलानी शुरू कर दी।दो बहनों का भाई, एक अलग रह रहे बड़े भाई का सहारा—पंकज घर का छोटा बेटा था, पर सबसे बड़ा जिम्मेदार।उनका जाना सिर्फ एक जिंदगी का खत्म होना नहीं, बल्कि एक परिवार की रीढ़ टूट जाना है।एक और परिवार, एक और कहानी… और कई अनउत्तरित सवाल
दिल्ली धमाके ने N नंबर की सुरक्षा रिंगें, हजारों जवान, दर्जनों एजेंसियां और कड़े सुरक्षा इंतजामों के बावजूद आम आदमी को फिर से यह एहसास करा दिया—कि आतंक की आग सबसे पहले मासूमों को ही झुलसाती है।पंकज जैसे लोग—जो किसी राजनीति, किसी एजेंडा, किसी दुश्मनी का हिस्सा नहीं होते—सबसे पहले शिकार बनते हैं।पंकज की कहानी इस धमाके की सबसे गहरी और दर्दनाक परत है—जहाँ आतंक नहीं, इंसान की सादगी और कर्तव्य का अंत हुआ है।
