बी के झा
NSK

कोलकाता/नई दिल्ली , 9 दिसंबर
बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले पश्चिम बंगाल के विधायक हुमायूं कबीर एक बार फिर सुर्खियों में हैं। कबीर का दावा है कि उन्हें पिछले सात दिनों से लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं—वह भी पश्चिम बंगाल के बाहर से आने वाले फोन कॉल के जरिए।टीएमसी से निलंबित किए जा चुके कबीर का कहना है कि यह धमकियां इतनी गंभीर हैं कि अब उन्हें उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।“वे कह रहे हैं—बाबरी की नींव रखी थी, अब जान लेंगे!”एक टीवी चैनल से बातचीत में कबीर ने कहा—सात दिनों से लगातार धमकी आ रही है…
बाहर से फोन आ रहा है…कहते हैं कि बाबरी मस्जिद की नींव रखने से पहले ही जान से मार देंगे।मैं डरता नहीं, अल्लाह पर पूरा भरोसा है, पर सुरक्षा की जरूरत है।”कबीर ने साफ कहा कि वह राज्य सरकार से सुरक्षा की मांग करेंगे और आवश्यक हुआ तो कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका डालेंगे।“8 निजी गार्ड रखूंगा… राज्य पुलिस पर भरोसा नहीं” – कबीरकबीर ने वार्ता से बातचीत में कहा कि स्थिति इतनी खराब है कि वह कल से 8 निजी सुरक्षाकर्मी नियुक्त करने जा रहे हैं।उन्होंने यह भी कहा:पश्चिम बंगाल पुलिस पर भरोसा नहीं है।
टीएमसी बीजेपी पर फंडिंग का आरोप लगा रही है, ऐसे माहौल में मेरी सुरक्षा जोखिम में है।”कबीर 6 दिसंबर के बाद से लगातार टारगेट में होने की बात कह रहे हैं।उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार दोनों को सुरक्षा के लिए मेल किया है।राजनीतिक हलचल: धमकियों का दावा… या समुदाय में फिर छवि चमकाने की कोशिश?हुमायूं कबीर की राजनीति हमेशा कॉन्ट्रोवर्सी के केंद्र में रही है।बाबरी मस्जिद की नींव रखने का दावा, टीएमसी से निलंबन, नई पार्टी की घोषणा और अब धमकियां—यह सब एक पैटर्न की तरह दिखता है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि—
मुस्लिम समाज में सहानुभूति जुटाने का प्रयास?पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक वोट हर दल के लिए निर्णायक होते हैं।टीएमसी से बाहर होने के बाद कबीर को अपने राजनीतिक भविष्य के लिए एक मजबूत नैरेटिव की जरूरत थी—धमकियों का दावा उसी राजनीतिक प्रतीकवाद की ओर इशारा करता है।
खुद को ‘बाबरी संघर्ष का अकेला योद्धा’ दिखाने की रणनीति
विशेषज्ञों का कहना है कि कबीर—• बाबरी मस्जिद की नींव रखने की भूमिका को लगातार उभारते रहे हैं• और अब धमकियों के जरिए वे उसी छवि को और “संघर्षशील” बनाना चाहते हैं
हाईकोर्ट जाने की घोषणा—एक राजनीतिक संदेश?यह भी माना जा रहा है कि हाईकोर्ट जाने की बात कह कर कबीर यह संदेश देना चाहते हैं कि“राज्य सरकार भरोसेमंद नहीं है, मुझे खुद अदालत का सहारा लेना पड़ेगा।”यह राजनीति का वह संस्करण है जिसमें खुद को पीड़ित और टारगेटेड दिखाना फायदे का सौदा बन जाता है।टीएमसी की चुप्पी और बंगाल की बढ़ती सियासी तल्खी टीएमसी ने अभी तक इस मुद्दे पर खुलकर कुछ नहीं कहा है।
लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि कबीर के आरोपों को “राजनीतिक नौटंकी” माना जा रहा है।वहीं बंगाल बीजेपी इस मुद्दे को कबीर के खिलाफ या पक्ष में किसी बयान से दूर ही रखे हुए है, शायद इसलिए कि मामला धार्मिक-संवेदनशील है।
क्या हुमायूं कबीर संकट में हैं—या नया राजनीतिक अध्याय लिख रहे हैं?
यह सवाल खुला है।लेकिन इतना तय है कि—• धमकियों का दावा• निजी सुरक्षा• हाईकोर्ट की चेतावनी• और मामले का बाबरी मस्जिद से जुड़ाव—इन सबने कबीर को एक बार फिर बंगाल की राजनीति के केंद्र में ला दिया है।
अंत में—एक बड़ा सवाल
क्या वाकई हुमायूं कबीर गंभीर खतरे में हैं?
या यह सब एक चुनावी तैयारी का मंचन है, जिसमें वह समुदाय की सहानुभूति और राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं?
इन सवालों के जवाब शायद आने वाले दिनों की न्यायिक कार्यवाही और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में मिलेंगे।
