नक़ाब खींचने से तरक़्क़ी नहीं रुकती, सोच खींचने से रुकती है एक महिला, एक मुख्यमंत्री और वह सवाल जो लोकतंत्र को आईना दिखाता है

बी के झा

पटना/नई दिल्ली, 20 दिसंबर

लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा उसके शिष्टाचार से होती है।और जब सत्ता सार्वजनिक मंच पर किसी महिला के शरीर, कपड़े या व्यक्तिगत चुनाव को छूती है—तो सवाल केवल शालीनता का नहीं, संवैधानिक गरिमा और स्त्री की आज़ादी का बन जाता है।बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर व्यापक बहस का केंद्र है।

वीडियो में मुख्यमंत्री नौकरी से जुड़ा काग़ज़ लेने आई एक महिला के चेहरे से नक़ाब हटाते दिखते हैं। आसपास मौजूद लोग मुस्कुराते हैं, माहौल हल्का दिखता है—लेकिन सवाल बेहद भारी है।

यह विवाद नहीं, अधिकार का प्रश्न है

शिक्षाविदों और महिला अधिकार विशेषज्ञों का साफ़ कहना है कि इसे “विवाद” कहना ही गलत है।

क्योंकि—किसी स्त्री की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उसके शरीर या पहनावे के साथ कोई भी हस्तक्षेप कानूनन और नैतिक रूप से जुर्म के दायरे में आता है।यह मुद्दा नक़ाब, हिजाब या घूंघट का नहीं है—यह मुद्दा स्त्री की सहमति, उसके निर्णय और उसकी गरिमा का है।

राजनीतिक बयान: संवेदना या संवेदनहीनता?

यूपी मंत्री संजय निषाद का बयान मुख्यमंत्री के बचाव में उत्तर प्रदेश के मंत्री संजय निषाद का बयान आग में घी का काम करता दिखा।

उनका कथन—छू लिया नक़ाब तो इतना हो गया, कहीं और छूते तो क्या होता…

”कानूनविदों के अनुसार यह बयान यौनिक हिंसा को सामान्य बनाने की मानसिकता दर्शाता है।हालांकि बाद में मंत्री ने सफ़ाई दी, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि—माफ़ी शब्दों की नहीं, सोच की होनी चाहिए।”

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का पक्ष

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने मुख्यमंत्री के व्यवहार को सही ठहराते हुए कहा—नीतीश कुमार ने कुछ गलत नहीं किया।”

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे बयान सत्ता के ऊँचे पदों से आते हैं, तो वे समाज के बड़े हिस्से को अनुकरण का संदेश देते हैं।

विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया:

‘यह सत्ता का पितृसत्तात्मक चेहरा’

कांग्रेस, वाम दलों और कुछ क्षेत्रीय दलों ने इस घटना को संवैधानिक मर्यादा और महिला सम्मान के ख़िलाफ़”बताया।एक विपक्षी नेता ने कहा—अगर यही हरकत कोई आम आदमी करता, तो कार्रवाई होती। सत्ता में बैठे लोग क्या क़ानून से ऊपर हैं?”

केंद्र और बिहार सरकार का रुख

बिहार सरकार की ओर से इसे “अनजाने में हुई घटना” बताया गया, जबकि केंद्र सरकार ने आधिकारिक टिप्पणी से दूरी बनाए रखी।

लेकिन शिक्षाविदों का कहना है—अनजाने में हुई हिंसा भी हिंसा ही होती है।”

कानूनविद: ‘पिता तुल्य’ तर्क क़ानूनी नहीं वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि“पिता तुल्य” या “बड़ों का स्नेह” जैसे तर्क कानून में कहीं मान्य नहीं हैं।

एक संवैधानिक विशेषज्ञ के अनुसार—सहमति के बिना स्पर्श, चाहे वह कपड़े का हो या शरीर का, अनुचित व्यवहार की श्रेणी में आता है।”

वहीं हिन्दू संगठनों और धर्मगुरुओं की राय

कुछ हिन्दू संगठनों ने इसे सांस्कृतिक असंवेदनशीलता बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा—किसी भी महिला की गरिमा सभी धर्मों में सर्वोपरि है।

”एक प्रमुख हिन्दू धर्मगुरु ने कहा—संस्कार सिखाते हैं कि स्त्री की देह और इच्छा का सम्मान हो। सत्ता में बैठा व्यक्ति उदाहरण होता है।

”इस्लामी मौलानाओं की प्रतिक्रिया

मुस्लिम धर्मगुरुओं ने स्पष्ट किया कि नक़ाब किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए, और न ही जबरन हटाया जाना चाहिए।

”एक मौलाना ने कहा—अगर कोई महिला नक़ाब में नौकरी कर रही है, तो वह पहले ही समाज की कई बाधाएं पार कर चुकी है।”मुस्लिम स्त्री: दो तरफ़ा दबाव का सच समाज शाऊस्त्रियों के अनुसार मुस्लिम महिलाओं पर एक ओर आधुनिकता के नाम पर कपड़े उतारने का दबाव दूसरी ओर समुदाय के भीतर ‘अच्छी धार्मिक स्त्री’ दिखने का दबाव दोनों ही स्त्री की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।

शिक्षाविद:

‘कपड़ों की राजनीति में स्त्री पिसती है

’शिक्षाविदों का मानना है कि कपड़े स्त्री की पहचान नहीं, उसका निजी चुनाव हैं।इतिहास बताता है कि कई महिलाओं के लिए पर्दा ही शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में प्रवेश का रास्ता बना।

निष्कर्ष:

यह एक वीडियो नहीं, चेतावनी हैयह मामला किसी व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं है।यह सवाल पूछता है—क्या सत्ता स्त्री की सहमति से ऊपर है?क्या मज़ाक़ के नाम पर हिंसा स्वीकार्य है?

क्या तरक़्क़ी की परिभाषा कपड़ों से तय होगी?अगर हम इन सवालों से आँख चुराते हैं,तो शायद हम एक और पीढ़ी की लड़कियों के रास्ते संकरे कर रहे होंगे।लोकतंत्र की कसौटी यही हैकि सबसे कमजोर नागरिक—

एक महिला—सत्ता के सामने भी सुरक्षित महसूस करे।

NSK

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