बी के झा
NSK

पटना / नई दिल्ली, 25 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव के बीच अब पोस्टर वॉर ने पूरे राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। पटना की सड़कों पर महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव को “नायक” बताने वाले पोस्टर लगाए जाने के बाद सियासी तूफान खड़ा हो गया है।बीजेपी और जेडीयू दोनों ने इस पोस्टर को लेकर तेजस्वी यादव और उनके पिता लालू प्रसाद यादव पर तीखे हमले बोले हैं, वहीं आरजेडी ने भी जवाबी पलटवार कर सियासत को और गर्म कर दिया है।
BJP का हमला — “जिसके पिता खलनायक, वो नायक कैसे?”डिप्टी सीएम और भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने सबसे तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा,जिसके पिता खलनायक हैं, वह नायक कैसे हो सकता है? लालू प्रसाद यादव बिहार के ‘गब्बर सिंह’ हैं। भ्रष्टाचार के कई मामलों में आरोपी और कोर्ट से सजायाफ्ता हैं। उनके चुनाव लड़ने तक पर रोक है।”उन्होंने आगे कहा कि तेजस्वी यादव पर भी आईआरसीटीसी घोटाला केस में आरोप तय हो चुके हैं, ऐसे में उन्हें नायक बताना बिहार की जनता का अपमान है।भ्रष्टाचार के प्रतीक पिता और घोटालों में फंसा बेटा— यही है उनका असली चेहरा,” सम्राट चौधरी ने कहा।
जेडीयू का तंज — “नायक शब्द को किया अपमानित”वहीं जेडीयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने भी तेजस्वी पर जमकर निशाना साधा।उन्होंने कहा,420 का अभियुक्त नायक नहीं, खलनायक ही होता है। बिहार में 18, दिल्ली में 7, महाराष्ट्र और यूपी में 1-1 मामला दर्ज है। आर्थिक अपराध के 27 केस लंबित हैं। ऐसे व्यक्ति को नायक बताना नायक शब्द का ही अपमान है।नीरज कुमार ने तंज कसते हुए कहा कि तेजस्वी यादव “लालू युग की राजनीति” की उपज हैं — जहां सत्ता परिवार की संपत्ति समझी जाती है।
आरजेडी का पलटवार — “सम्राट चौधरी खुद इतिहास के खलनायक”जैसे ही बीजेपी और जेडीयू के बयान आए, आरजेडी और महागठबंधन नेताओं ने भी पलटवार शुरू कर दिया।
आरजेडी की राष्ट्रीय प्रवक्ता कंचना यादव ने तीखा प्रहार करते हुए कहा,जो इंसान 7-7 लोगों के नरसंहार का आरोपी रहा हो, जिसने सत्ता के लिए हर पार्टी के आगे सिर झुकाया हो, वही आज बिहार के सबसे लोकप्रिय नेता को खलनायक कह रहा है। इससे बड़ा दोगलापन क्या हो सकता है?”उन्होंने कहा कि सम्राट चौधरी और एनडीए के नेताओं को अब जनता का डर सता रहा है, क्योंकि बिहार का युवा अब जात-पात और झूठी बातों से ऊपर उठ चुका है।
तेजस्वी बने महागठबंधन के सीएम फेस”तेजस्वी यादव को महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया जा चुका है।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने पटना में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में तेजस्वी को सीएम और मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम उम्मीदवार घोषित किया।हालांकि इस घोषणा के बाद यह सवाल भी उठे कि दलित या मुस्लिम वर्ग से किसी नेता को डिप्टी सीएम पद क्यों नहीं दिया गया।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यह पोस्टर विवाद तेजस्वी यादव के सीएम चेहरे बनने के तुरंत बाद आया है — जिससे स्पष्ट है कि एनडीए अब सीधी टक्कर में उतर चुका है और हर प्रतीकात्मक मुद्दे को भुनाने की कोशिश कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का नजरिया — “मर्यादा की सीमा लांघ गई राजनीति
”राजनीतिक विश्लेषकों और समाजशास्त्रियों ने इस पूरे विवाद को “सियासी मर्यादा का पतन” बताया है।वरिष्ठ विश्लेषक प्रो. एस.के. झा ने कहा,इस चुनाव में हर दल मर्यादा भूल चुका है। व्यक्तिगत टिप्पणियां और चरित्र हनन की भाषा लोकतंत्र को कमजोर करती है। जनता मुद्दों पर बात चाहती है, न कि पोस्टर और गालियों पर।”
उन्होंने कहा कि यह बहस असल मुद्दों — बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन — से ध्यान भटकाने की साजिश है।
जनता की राय — “वोट पोस्टर से नहीं, काम से मिलेगा”पटना की गलियों और सोशल मीडिया पर यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कई लोगों का कहना है कि अब जनता इतनी समझदार है कि वह नायक या खलनायक के पोस्टर से नहीं, बल्कि काम और नीयत से फैसला करेगी।
निष्कर्ष
:तेजस्वी यादव के “नायक पोस्टर” ने बिहार की राजनीति में नई आग जला दी है।एक ओर भाजपा और जेडीयू इसे “नैतिक पतन” बता रही हैं, वहीं आरजेडी इसे “जनता के बीच लोकप्रियता से उपजे डर” का परिणाम मान रही है।
पोस्टर का यह संग्राम अब सियासी रणनीति से बढ़कर इज्जत और विचारधारा की लड़ाई बन चुका है।बिहार का मैदान अब और गरम है — और जनता तय करेगी कि “नायक कौन, खलनायक कौन।
