पाकिस्तान की ओर झुकाव, भारत की सख्ती* *यूनुस ‘आग से खेल रहे हैं’, हसीना का तीखा आरोप—ढाका में वीजा सेंटर बंद, रिश्तों में बढ़ा तनाव

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ढाका, 17 दिसंबर भारत–बांग्लादेश संबंध इस समय एक नाजुक और निर्णायक मोड़ पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। पाकिस्तान से बढ़ती नजदीकियों, ‘सेवन सिस्टर्स’ को लेकर विवादित बयान और ढाका में भारतीय मिशन की सुरक्षा को मिली धमकियों के बीच भारत ने कूटनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर सख्त कदम उठाए हैं। इसी पृष्ठभूमि में बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का News18 को दिया गया इंटरव्यू सामने आया है, जिसने पूरे घटनाक्रम को और तीखा बना दिया है।हसीना ने अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस पर सीधे हमला बोलते हुए कहा कि “पाकिस्तान से नजदीकियां बढ़ाकर यूनुस आग से खेल रहे हैं। उन्हें न अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की समझ है और न ही जनादेश। भारत हमारा भरोसेमंद पड़ोसी रहा है, और उकसावे के बावजूद जिस धैर्य का उसने परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है।”

भारत का कड़ा संदेश: सुरक्षा से समझौता नहींबढ़ते तनाव के बीच भारत सरकार ने ढाका स्थित भारतीय वीजा एप्लिकेशन सेंटर (IVAC) को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। यह सेंटर जमुना फ्यूचर पार्क में स्थित है और बांग्लादेश में भारतीय वीजा सेवाओं का मुख्य केंद्र माना जाता है।आईवीएसी के अनुसार, मौजूदा सुरक्षा स्थिति को देखते हुए सभी अपॉइंटमेंट्स को आगे की तारीख के लिए पुनर्निर्धारित किया जाएगा।इससे पहले विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश के उच्चायुक्त एम. रियाज हमीदुल्लाह को तलब कर ढाका में भारतीय मिशन के आसपास बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और चरमपंथी तत्वों की गतिविधियों पर गहरी चिंता जताई थी।

भारत ने साफ कहा कि वियना कन्वेंशन के तहत राजनयिक मिशनों की सुरक्षा बांग्लादेश सरकार की जिम्मेदारी है।शेख हसीना का बड़ा आरोप: ‘कंगारू कोर्ट’ और लोकतंत्र पर हमलाअपने इंटरव्यू में शेख हसीना ने अंतरिम सरकार पर लोकतंत्र को कुचलने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि आवामी लीग पर लगाया गया प्रतिबंध और उनके खिलाफ सुनाई गई मौत की सजा एक “कंगारू कोर्ट” का फैसला है, जो बिना चुनी सरकार के इशारे पर काम कर रही है।

हसीना ने स्पष्ट शब्दों में कहा—“किसी पार्टी पर प्रतिबंध लगाकर उसके लाखों समर्थकों को खत्म नहीं किया जा सकता। आवामी लीग बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा है। लोकतंत्र लौटेगा, और हमारी पार्टी भी अपने सम्मानजनक स्थान पर लौटेगी।”पाकिस्तान फैक्टर और 1971 की स्मृतियां हसीना ने पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकियों को 1971 की त्रासदी से जोड़ते हुए कहा कि आज अल्पसंख्यकों पर हमले, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और मुक्ति संग्राम के इतिहास को मिटाने की कोशिशें उसी दमनकारी विचारधारा की गूंज हैं, जिसके खिलाफ बांग्लादेश ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी।

उनका कहना था—“पाकिस्तान से स्थिर संबंध हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए मजबूत और जिम्मेदार नेतृत्व चाहिए, न कि ऐसा नेतृत्व जो देश को अस्थिरता की ओर धकेल दे।”

राजनीतिक विश्लेषकों की राय:

यह सिर्फ बयान नहीं, रणनीतिक टकराव हैं राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह विवाद केवल व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भू-राजनीति का संकेत है।

एक वरिष्ठ विश्लेषक के अनुसार,“यूनुस सरकार का पाकिस्तान की ओर झुकाव भारत के लिए सुरक्षा और रणनीतिक चिंता का विषय है, खासकर उत्तर–पूर्व और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के संदर्भ में। भारत का धैर्य अब ‘रेड लाइन’ के साथ जुड़ा हुआ है।”

शिक्षाविदों का नजरिया:

इतिहास और कूटनीति का टकराव अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिक्षाविद इसे इतिहास बनाम तात्कालिक राजनीति का संघर्ष बताते हैं।एक प्रोफेसर कहते हैं,“भारत–बांग्लादेश संबंधों की नींव 1971 में पड़ी थी। लेकिन अंतरिम सरकार की अस्थिरता और बाहरी शक्तियों की भूमिका उस विरासत को कमजोर कर रही है।”

कानून विशेषज्ञों की राय

भारत का कदम अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद कुमार सिंह का कहना है कि वीजा सेंटर बंद करना और उच्चायुक्त को तलब करना कूटनीतिक दबाव का वैध तरीका है।“जब किसी मिशन की सुरक्षा पर खतरा हो, तो मेजबान देश की जिम्मेदारी तय होती है। भारत का रुख अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है,” एक वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ ने कहा।

निष्कर्ष:

धैर्य के साथ सख्ती की नीतिएक ओर शेख हसीना भारत के धैर्य की सराहना कर रही हैं, दूसरी ओर भारत जमीन पर ठोस कदम उठाकर यह संकेत दे रहा है कि सुरक्षा और संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा।वीजा सेंटर का बंद होना, उच्चायुक्त को तलब किया जाना और कड़े बयान—ये सभी संकेत हैं कि भारत हालात पर नजर रखे हुए है और जरूरत पड़ने पर और सख्त कदम भी उठा सकता है।अब सवाल यही है—

क्या मोहम्मद यूनुस इस चेतावनी को समझेंगे?

या भारत–बांग्लादेश संबंध एक लंबे कूटनीतिक तनाव के दौर में प्रवेश करने जा रहे हैं?फिलहाल इतना तय है कि दक्षिण एशिया की राजनीति में यह टकराव आने वाले दिनों में और गहराने वाला है।

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