बंगाल में ‘हुमायूं कबीर की बाबरी मस्जिद’ को मिला रिकॉर्ड चंदा: राजनीति, समाज और धर्म की नई बहसें तेज

बी के झा

NSK

मुर्शिदाबाद/कोलकाता / नई दिल्ली , 8 दिसंबर

पश्चिम बंगाल की सियासत इन दिनों फिर एक ऐसे मुद्दे पर गर्म है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। TMC के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर द्वारा बाबरी जैसी मस्जिद बनाने की घोषणा के बाद बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के रेजिनगर में 6 दिसंबर को मस्जिद का शिलान्यास हो चुका है। लेकिन राजनीतिक तापमान को वास्तव में बढ़ाने वाला मुद्दा है—मस्जिद निर्माण के लिए जमा हुआ चंदा, जिसकी राशि ने हर किसी को चौंका दिया है।

1.3 करोड़ रुपये से ज्यादा का चंदा, गिनती मशीनों से रातभर जारीकबीर के करीबी सूत्रों के अनुसार,37.33 लाख रुपये नकद93 लाख रुपये ऑनलाइनयानि कुल 1.30 करोड़ रुपये की राशि जमा हो चुकी है।इसमें अभी 7 सीलबंद दान पेटियां खोली जानी बाकी हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार समर्थक पैसे के साथ ईंट तक लाकर दे रहे हैं।गिनती की प्रक्रिया के लिए 30 सदस्यीय विशेष टीम बनाई गई है। पारदर्शिता के नाम पर इसका सीधा प्रसारण भी किया जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक: “यह सिर्फ मस्जिद नहीं, चुनावी गणित की नई बिसात”राजनीतिक विश्लेषक डॉ. रमेश पाठक का कहना है—“मुर्शिदाबाद और आसपास के क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी काफी बड़ी है। इतने बड़े स्तर पर चंदा जुटना सिर्फ धार्मिक भावनाओं का विषय नहीं, बल्कि चुनावी माहौल में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति भी है। विपक्ष इसे ध्रुवीकरण के रूप में देखेगा और सत्ता पक्ष इसे अलग तरह से भुनाने की कोशिश करेगा।”

वरिष्ठ पत्रकार: “मस्जिद बनी तो भी चर्चा, न बनी तो भी फायदा”कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार सलमान नदीम कहते हैं—“6 दिसंबर का दिन चुनना, बाबरी मस्जिद के नाम पर बंगाल में ‘समानांतर कथा’ खड़ी करना यह सब राजनीतिक संकेतों से भरा है। यह केवल मस्जिद निर्माण नहीं, बल्कि ‘नैरेटिव बिल्डिंग’ का प्रयास है। धनराशि का यह आकार दिखाता है कि भावनाएं कितनी उफान पर हैं।”

शिक्षाविदों की राय: “इस समय जनता की भावनाएं किसी भी दिशा में मुड़ सकती हैं”जादवपुर विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर अनामिका दे ने चेताया—“धार्मिक भावनाओं पर आधारित बड़े अभियानों में पारदर्शिता आवश्यक है। जनता का पैसा किसके लिए, किस हद तक और किस उद्देश्य से इस्तेमाल हो रहा है, यह स्पष्ट होना चाहिए। इतनी बड़ी रकम का अर्थ केवल संरचना नहीं, बल्कि एक ‘भावनात्मक निवेश’ है।”

हिन्दू संगठन भड़के: “बंगाल में सुनियोजित उकसावा”कई हिंदी और बंगाल-आधारित हिंदू संगठनों ने इसे “राजनीतिक उकसावे की कोशिश” बताया।विश्व हिन्दू परिषद (VHP) के एक वरिष्ठ नेता का बयान—“यह स्पष्ट रूप से माहौल खराब करने का प्रयास है। बाबरी मस्जिद का मुद्दा अदालत में सुलझ चुका है। बंगाल में चुनाव से पहले इस तरह की गतिविधि समाज को बांटने की कोशिश है।”हिन्दू धर्म गुरु स्वामी ईश्वरानंद जी महाराज ने कहा—“मंदिर-मस्जिद के नाम पर जनता की भावनाओं से खेलना खतरनाक है। यह चंदा किस उद्देश्य के लिए है—सिर्फ मस्जिद के लिए या किसी दूसरे ‘राजनीतिक मकसद’ के लिए?”

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया:भाजपा (BJP)राज्य भाजपा अध्यक्ष ने कहा—“TMC के निलंबित विधायक का यह कदम ट्रायल-बैलून है। TMC दूर से खेल रही है और मुसलमान वोटर को साधने की कोशिश हो रही है।”TMCपार्टी ने खुद को इससे पूरी तरह अलग करते हुए कहा—“कबीर अब पार्टी में नहीं हैं। उनका कोई भी कदम TMC की नीति नहीं है।”

कांग्रेस

“धार्मिक ध्रुवीकरण के इस नए खेल का राज्य पर बुरा असर पड़ेगा।”वाम दल“यह पूरा अभियान वास्तविक मुद्दों से जनता को भटकाने का तरीका है।क्या यह चंदा सिर्फ मस्जिद निर्माण के लिए है या कुछ और?यही सवाल अब बंगाल ही नहीं बल्कि पूरे देश की बहस का केंद्र है।संभावनाएं—राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार

: 1. धार्मिक संरचना का निर्माण – जनता की आस्था से जुड़ा प्रयास

2. भविष्य के चुनाव में ‘ध्रुवीकरण’ की रणनीति

3. स्थानीय नेतृत्व का राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का तरीका

4. बाहरी संगठनों से संभावित फंडिंग की जांच आवश्यक

5. अगर रकम बहुत बड़ी हुई तो ED/IT की जांच की संभावना

राजनीतिक विशेषज्ञों की राय में “मस्जिद बन भी जाए तो भी चर्चा जारी रहेगी, न बने तो उसका राजनीतिक लाभ मिलता रहेगा।

”निष्कर्ष:

बंगाल में ‘मस्जिद विवाद’ की नई लकीर हुमायूं कबीर का यह कदम बंगाल की राजनीति में नई रेखाएं खींच रहा है।एक ओर धार्मिक उत्साह और जनता का विशाल समर्थन,दूसरी ओर राजनीतिक दलों की शंकाएं,और ऊपर से चुनाव निकट—

यह संयोग अपने आप में एक बड़ा संकेत है कि बंगाल में आने वाला चुनाव बेहद उग्र और भावनात्मक होने वाला है।यह कहानी केवल मस्जिद निर्माण की नहीं—यह धर्म, राजनीति, जनभावनाओं और सत्ता की बदलती चालों की कहानी है।

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