बी. के. झा
NSK



नई दिल्ली, 14 दिसंबर
संसद में ‘बंदे मातरम’ के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने पर हुई बहस का उद्देश्य भले ही इतिहास के पन्नों को टटोलना बताया गया हो, लेकिन उसका राजनीतिक निहितार्थ किसी से छिपा नहीं रहा। इस बहस के केंद्र में ‘बंदे मातरम’ से अधिक जवाहरलाल नेहरू थे—और विडंबना यह कि उन्हें खलनायक सिद्ध करने की कोशिश ने अंततः उनके कद को और ऊँचा कर दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इस बहस की शुरुआत करते हुए 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा ‘बंदे मातरम’ के केवल एक अंश को स्वीकार किए जाने के निर्णय को आधार बनाकर नेहरू पर परोक्ष रूप से मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना की आपत्तियों के आगे झुकने का आरोप मढ़ने की कोशिश की। यह वही पुरानी छिद्रान्वेषण प्रवृत्ति थी, जो ऐतिहासिक संदर्भों को काट-छांटकर वर्तमान की राजनीति में फिट करने का प्रयास करती है।
नेहरू का पत्र और समावेशी राष्ट्रवाद
इतिहास के दस्तावेज़ इस आरोप का खंडन स्वयं करते हैं। 15 जून 1948 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधानचंद्र राय को लिखे पत्र में अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘बंदे मातरम’ भारत की स्वतंत्रता संग्राम की चेतना का प्रतीक है और रहेगा, लेकिन राष्ट्रगान का प्रश्न अलग है—
इसे संविधान सभा ही तय करेगी। नेहरू ने यह भी रेखांकित किया था कि ‘बंदे मातरम’ और ‘जन-गण-मन’ की प्रकृति, भूमिका और संदर्भ भिन्न हैं।यह पत्र उस समय लिखा गया था, जब बिधानचंद्र राय, मध्य प्रांत के मुख्यमंत्री के बाद, ‘
बंदे मातरम’ को राष्ट्रगान बनाए जाने के पक्ष में खुलकर सामने आए थे। बंगाल से जुड़े प्रतीकों के कारण राय की भावनात्मक संलग्नता स्वाभाविक थी।
नेहरू ने उस भावनात्मक आग्रह को समझते हुए भी निर्णय को तर्क, समावेशन और राष्ट्रीय सहमति के धरातल पर रखा—और अंततः राय को भी सहमत कर लिया।आम सहमति का ऐतिहासिक निर्णय परिणाम स्वरूप, देश ने बिना किसी कटुता के ‘जन-गण-मन’ को राष्ट्रगान और ‘बंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया। यह निर्णय न किसी दबाव का परिणाम था, न किसी समुदाय को खुश करने की कवायद—
बल्कि उस समावेशी राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति था, जिसकी बुनियाद पर आधुनिक भारत खड़ा हुआ।यह तथ्य भी अक्सर जानबूझकर भुला दिया जाता है कि 26 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘जन-गण-मन’ को भी उसके संपूर्ण पाठ के बजाय एक अंश को ही राष्ट्रगान घोषित किया था—
ठीक वैसे ही जैसे ‘बंदे मातरम’ के साथ हुआ। यदि अंश स्वीकार करना ‘खंडन’ है, तो यह तर्क दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
राजनीति की मंशा और बहस का बैक फायर इसके बावजूद संसद में हुई ताज़ा बहस में ‘बंदे मातरम’ की आड़ में नेहरू को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई। इस प्रक्रिया में कई वक्तव्यों की आंच ‘जन-गण-मन’ की गरिमा तक को छूती दिखी।
दरअसल, निशाना गीत नहीं था—निशाना था नेहरू का ऐतिहासिक मूल्यांकन।कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने भाषण में इस बहस के दो राजनीतिक उद्देश्यों की ओर संकेत किया—पहला, पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भावनात्मक ध्रुवीकरण; दूसरा, स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं पर नए आरोप गढ़कर जनता का ध्यान आज की ज्वलंत समस्याओं से हटाना।लेकिन सवाल यह है कि क्या सत्ता पक्ष अपने इन उद्देश्यों में सफल हो पाया?
संसद की बहस का समग्र प्रभाव देखें, तो उत्तर नकारात्मक ही प्रतीत होता है। विपक्षी नेताओं के सवालों के सामने सत्ता पक्ष की दलीलों की कमजोरी उजागर हुई और यह बहस अंततः उसके लिए ‘बैकफायर’ बन गई।टैगोर, नेहरू और ऐतिहासिक विवेक
इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि एक बार फिर यह तथ्य सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ गया कि 1937 में ‘बंदे मातरम’ को लेकर कांग्रेस का निर्णय रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर आधारित था।
इतिहासकार और लेखक सुगत बोस के अनुसार, उस समय सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू ने टैगोर से परामर्श कर यह तय किया था कि पार्टी की राष्ट्रीय बैठकों में ‘बंदे मातरम’ का केवल पहला भाग गाया जाएगा—
क्योंकि टैगोर नहीं चाहते थे कि राष्ट्रवादी आंदोलन धार्मिक प्रतिस्पर्धा का शिकार बने।यह निर्णय किसी भय या दबाव का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक विवेक और राष्ट्रीय एकता की गहरी समझ का परिणाम था।
निष्कर्ष
बहस के बाद नेहरू
अंततः, ‘
बंदे मातरम’ पर हुई यह बहस उस निष्कर्ष तक पहुँची, जिसकी शायद उसके सूत्रधारों ने कल्पना नहीं की थी।
नेहरू का कद कम होने के बजाय और बड़ा हो गया है। उनका महानायक त्वं इसलिए नहीं, कि वे आलोचना से परे हैं—बल्कि इसलिए कि ऐतिहासिक दस्तावेज़, तर्क और समावेशी दृष्टि आज भी उनके पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
इस अर्थ में, संसद की यह बहस एक राजनीतिक हमला कम और नेहरू के विचारों की पुनर्पुष्टि अधिक साबित हुई है।
