बलूचिस्तान में चीन की सैन्य दस्तक की आशंका: बलूच नेता ने विदेश मंत्री जयशंकर को किया आगाह CPEC के अंतिम चरण पर बढ़ता खतरा, भारत–बलूचिस्तान सहयोग की खुली अपील

बी के झा

NSK

नई दिल्ली / जिनेवा, 2 जनवरी

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक नई और गंभीर चेतावनी सामने आई है। बलूचिस्तान के प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता और फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट के प्रतिनिधि मीर यार बलूच ने भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को एक खुला पत्र लिखकर आगाह किया है कि आने वाले महीनों में चीन बलूचिस्तान में अपनी सैन्य टुकड़ियाँ तैनात कर सकता है।यह चेतावनी न केवल बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के लिए खतरे की ओर इशारा करती है, बल्कि भारत की रणनीतिक सुरक्षा चिंताओं को भी सीधे छूती है।“अगर बलूचों की अनदेखी हुई, तो चीन उतरेगा जमीन पर”1 जनवरी 2026 को लिखे इस पत्र में मीर यार बलूच ने स्वयं को बलूचिस्तान का प्रतिनिधि बताते हुए कहा है कि यदि बलूचिस्तान की रक्षा और स्वतंत्रता सेनाओं को लगातार नजरअंदाज किया गया, तो चीन को वहां सैन्य हस्तक्षेप का अवसर मिल जाएगा।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेताया कि—“छह करोड़ बलूच लोगों की इच्छा के विरुद्ध यदि चीनी सैनिक बलूचिस्तान की धरती पर उतरे, तो यह भारत और बलूचिस्तान—दोनों के भविष्य के लिए अकल्पनीय खतरा होगा।”

CPEC के ‘अंतिम चरण’ पर पहुंचने का दावापत्र में चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को लेकर भी गहरी चिंता जताई गई है। मीर यार बलूच के अनुसार, पाकिस्तान और चीन का रणनीतिक गठजोड़ अब CPEC के उस अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां आर्थिक परियोजनाएं सैन्य और सुरक्षा नियंत्रण में बदल सकती हैं।उनका कहना है कि यही वह मोड़ है, जहां चीन अपने निवेश की रक्षा के नाम पर स्थायी सैन्य मौजूदगी स्थापित कर सकता है।

भारत–बलूचिस्तान सहयोग की खुली अपील

मीर यार बलूच ने भारत और बलूचिस्तान के बीच ठोस, व्यावहारिक और पारस्परिक सहयोग की वकालत की। उन्होंने लिखा कि दोनों पक्ष जिन खतरों का सामना कर रहे हैं, वे काल्पनिक नहीं बल्कि वास्तविक, तत्काल और साझा हैं।उन्होंने बलूचिस्तान और भारत के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख करते हुए हिंगलाज माता मंदिर जैसे पवित्र स्थलों को साझा विरासत का प्रतीक बताया।

ऑपरेशन सिंदूर की सराहना पत्र में मीर यार बलूच ने मोदी सरकार द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के तहत की गई कार्रवाइयों की खुलकर सराहना की।उन्होंने कहा कि पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के ठिकानों को निशाना बनाना—विशेषकर पहलगाम आतंकी हमले के बाद—क्षेत्रीय सुरक्षा और न्याय के प्रति भारत की असाधारण दृढ़ता और साहस का परिचायक है।

राजनीतिक विश्लेषक:

‘यह चेतावनी नहीं, रणनीतिक संकेत है’वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. आर. के. मल्होत्रा मानते हैं—“मीर यार बलूच का पत्र केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत है। चीन का बलूचिस्तान में सैन्य प्रवेश भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं के लिए नई चुनौती पैदा कर सकता है।”

रक्षा विशेषज्ञों की राय:

‘दो मोर्चों का खतरा’पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एस. के. पांडे के अनुसार—“अगर चीन बलूचिस्तान में स्थायी सैन्य मौजूदगी बनाता है, तो भारत के सामने एक तरह से दो मोर्चों की स्थिति और जटिल हो जाएगी—पूर्व में चीन और पश्चिम में पाकिस्तान, वह भी एक ही रणनीतिक धुरी पर।”

केंद्र सरकार का रुख: सतर्क निगाह

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत सरकार बलूचिस्तान की स्थिति और CPEC से जुड़े हर घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है। हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं आया है, लेकिन विदेश नीति विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पत्र नई दिल्ली के रणनीतिक विमर्श में गंभीरता से लिया जाएगा।

विपक्ष की प्रतिक्रिया: संसद में बहस की मांग

कुछ विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर संसद में चर्चा की मांग करते हुए कहा है कि—“चीन–पाक गठजोड़ के सैन्य आयामों पर देश को स्पष्ट नीति और पारदर्शिता की जरूरत है।

”प्रबुद्ध समाजसेवी: मानवाधिकार का सवाल भी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यकर्ता अनुज वर्मा का कहना है—“बलूचिस्तान केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय संकट का भी मामला है। वहां किसी भी विदेशी सैन्य तैनाती का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा।”दक्षिण एशिया की राजनीति में नया मोड़?मीर यार बलूच का यह पत्र ऐसे समय आया है, जब चीन वैश्विक स्तर पर अपने आर्थिक प्रोजेक्ट्स को सैन्य सुरक्षा के दायरे में लाने की कोशिश कर रहा है।

यदि बलूचिस्तान में चीनी सैनिक उतरते हैं, तो यह न केवल पाकिस्तान की संप्रभुता, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की शक्ति-संतुलन राजनीति को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।

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