बी के झा
NSK

नई दिल्ली / ढाका / सिलहट, 10 जनवरी
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर आशंकाएं अब केवल चेतावनी नहीं, बल्कि रक्तरंजित यथार्थ बनती जा रही हैं। सुनामगंज जिले में जॉय महापात्रो की पीट-पीटकर और ज़हर देकर की गई हत्या ने यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का जीवन अब कानून के भरोसे नहीं रहा?
परिजनों के अनुसार, जॉय महापात्रो को पहले बेरहमी से पीटा गया और फिर ज़हर दे दिया गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें सिलहट के एमएजी उस्मानी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। यह हत्या कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि एक भयावह सिलसिले की अगली कड़ी है।
डर के साये में बांग्लादेश का हिंदू समाज
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में हिंदू समुदाय के भीतर भय असाधारण रूप से बढ़ा है। नरसिंगदी में 40 वर्षीय हिंदू की हत्या, जशोर में हिंदू व्यापारी और पत्रकार राणा प्रताप की गोली मारकर हत्या, मयमनसिंह में दीपू चंद्र दास को ईशनिंदा के आरोप में पीट-पीटकर मारना और शव को जलाना—ये घटनाएं सामाजिक असहिष्णुता के खतरनाक विस्तार की ओर इशारा करती हैं।
31 दिसंबर 2025 को शरियतपुर में व्यापारी खोकन चंद्र दास को चाकू मारकर जलाया गया। तीन दिन बाद ढाका में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। इन घटनाओं में गिरफ्तारी में देरी, ढीली जांच और राजनीतिक चुप्पी ने हालात को और गंभीर बना दिया है।
मोहम्मद यूनुस सरकार पर उठते सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अंतरिम प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस की सरकार के दौरान राज्य की पकड़ कमजोर होती दिख रही है। कट्टरपंथी तत्वों को यह संदेश जा रहा है कि वे दंड से बच सकते हैं। कानूनविदों के अनुसार, यह स्थिति बांग्लादेश के संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों—विशेषकर ICCPR (International Covenant on Civil and Political Rights)—का उल्लंघन है, जिन पर बांग्लादेश हस्ताक्षर कर्ता है।
हिंदू संगठनों और धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया
भारत और बांग्लादेश के हिंदू संगठनों ने इन हत्याओं को धार्मिक उत्पीड़न करार देते हुए अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग की है। प्रमुख हिंदू धर्मगुरुओं का कहना है कि“जब आस्था के आधार पर लोगों की हत्या हो और राज्य मूकदर्शक बना रहे, तो यह केवल कानून व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि नैतिक पतन है।
”विपक्ष और भाजपा का तीखा हमला
भारत में विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा ने यूनुस सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा राज्य प्रायोजित मौन समर्थन के बिना संभव नहीं। उन्होंने भारत सरकार से कड़े कूटनीतिक कदम, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुद्दा उठाने और सीमापार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को विदेश नीति का स्पष्ट एजेंडा बनाने की मांग की है।
भारत सरकार की संतुलित लेकिन सख्त कूटनीति
भारत सरकार ने अब तक सार्वजनिक रूप से संयमित भाषा का प्रयोग किया है, लेकिन कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, नई दिल्ली ने ढाका को स्पष्ट संदेश दिया है किअल्पसंख्यकों की सुरक्षा बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी है। लगातार हो रही हिंसा द्विपक्षीय संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी भारत इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों पर भी आवाज़ उठा सकता है
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश में अस्थिरता का सीधा असर पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और कट्टरपंथी नेटवर्क पर पड़ सकता है।
निष्कर्ष:
यह केवल बांग्लादेश का आंतरिक मामला नहींजब किसी देश में एक समुदाय को उसकी पहचान के कारण मारा जाए, तो वह केवल आंतरिक कानून व्यवस्था का प्रश्न नहीं रहता—
वह मानवता, अंतरराष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय स्थिरता का विषय बन जाता है।जॉय महापात्रो की हत्या एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि बांग्लादेश के बहुलतावादी ताने-बाने पर गहरा घाव है। अब सवाल यह नहीं है कि घटनाएं हो रही हैं—
सवाल यह है कि क्या ढाका की सत्ता उन्हें रोकने का साहस और इच्छाशक्ति रखती है?
