बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले हुमायूं कबीर का ‘राजनीतिक विद्रोह’ — नई पार्टी, 135 सीटों की घोषणा और ममता बनर्जी को सीधी चुनौती, संपत्ति, सियासत, रणनीति और समीकरणों का बड़ा खेल, बंगाल की सियासत में उभरता एक नया ‘गेम चेंजर’?

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ कोलकाता, 8 दिसंबर

पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों असाधारण उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है।इस तूफ़ान का केंद्र हैं—मुर्शिदाबाद के विधायक हुमायूं कबीर, जो बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले व्यक्तियों में शामिल रहे और अब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से निर्णायक मोड़ पर अलग होकर नई पार्टी बनाने जा रहे हैं।उनका दावा है—“2026 में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी… बंगाल की राजनीति बदलने जा रही है।”यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि बंगाल में मुस्लिम राजनीति, वामपंथी पुनर्जीवन और विपक्षी रणनीति को नई दिशा देने वाला कारक माना जा रहा है।

करोड़ों की संपत्ति वाले कबीर: ADR रिपोर्ट क्या कहती है?ADR (Association for Democratic Reforms) की 2021 रिपोर्ट के अनुसार—कुल संपत्ति — ₹3,07,42,300चल संपत्ति — ₹96,75,930अचल संपत्ति — ₹2,10,66,370उनके हलफनामे में शामिल:टाटा स्टॉर्म सफारी कार80 ग्राम सोना (₹3.95 लाख)कृषि भूमिकबीर के समर्थक इन संपत्तियों को “ईमानदारी और पारदर्शिता का प्रमाण” बताते हैं, जबकि आलोचक पूछते हैं—“राजनीतिक भटकाव के बीच संपत्ति का ग्राफ कैसे बढ़ा?

राजनीतिक सफर: कांग्रेस से TMC, फिर SP, BJP और दोबारा TMC—अब अपनी पार्टीहुमायूं कबीर की राजनीति उतनी ही बहुरंगी है जितनी बंगाल की संस्कृति।उनका सफर इस प्रकार रहा—

कांग्रेस से शुरुआतकभी अधीर रंजन चौधरी के बेहद करीबी।2011 में पहली बार विधायक बने।

2012 में TMC में शामिलसीधे मंत्री पद मिला—तेज रफ्तार उन्नति।लेकिन रेजिनानगर उपचुनाव हारने पर पद गया।

2015—ममता पर पहली बड़ी बगावतउन्होंने आरोप लगाया—“ममता अपने भतीजे को राजा बनाने में लगी हैं।”जिसके बाद 6 साल के लिए पार्टी से निलंबन

SP → निर्दलीय → कांग्रेस → BJP → TMC (2020)राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार—“कबीर बंगाल के सबसे अधिक दलबदल करने वाले नेता हैं, और हर बदलाव के पीछे मुस्लिम राजनीति की नई दिशा खोजने का प्रयास रहा है।

AIMIM, CPM और नए ‘मुस्लिम फ्रंट’ की तैयारी हाल के एक महीने में कबीर ने बड़ा ऐलान किया है—सेक्युलर गठबंधन बनाने की कोशिश CPM के साथ सकारात्मक बातचीतAIMIM से असदुद्दीन ओवैसी के साथ संपर्क135 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का एलान मुर्शिदाबाद, मालदा, नदिया और 24 परगना में हेलीकॉप्टर दौराकबीर का दावा:“135 सीटों पर मुस्लिम वोट के ध्रुवीकरण से TMC की राजनीतिक जमीन हिलेगी।”लेकिन AIMIM ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी—ये सस्पेंस बंगाल की राजनीति में बड़ा रहस्य बन गया है।

22 दिसंबर—नई पार्टी का लॉन्च: क्या ये ‘मुस्लिम पार्टी 2.0’ होगी?

कबीर ने NDTV को कहा—मैं मुसलमानों के लिए काम करने वाली नई पार्टी बनाऊंगा।

”विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह पार्टी AIMIM या वाम मोर्चे के साथ आती है, तो—

TMC को मुस्लिम वोट में पहली बार गंभीर चुनौती

कांग्रेस-CPM की खोई जमीन वापस लाने की कोशिश

BJP को परोक्ष लाभ (वोट विभाजन)यह समीकरण बंगाल की चुनावी राजनीति को पूरी तरह उलट सकता है।

ममता बनर्जी पर सीधी चोट: “CM अब मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी”कबीर का बयान राजनीतिक तूफ़ान जैसा था—2026 में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी… वे शपथ नहीं लेंगी… पूर्व मुख्यमंत्री बन जाएंगी।”यह बयान दो अर्थों में अहम है—

1. मुस्लिम वोट बैंक पर सीधी टक्करमुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना में मुस्लिम चुनावी प्रभाव 50% से ऊपर है।

2. TMC में असंतोष का संकेतअंदरूनी सूत्र बताते हैं कि TMC में कई पुराने नेता टिकट वितरण और शक्ति केंद्रित होने से असंतुष्ट हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय: क्या सच में ‘गेम चेंजर’?

1. मुस्लिम वोटों में पहली बार ‘पैन–बंगाल’ चुनौतीकबीर जिस तरह AIMIM और CPM को संकेत दे रहे हैं, इससे मुस्लिम वोटों का त्रिकोणीय बंटवारा संभव।

2. TMC को सबसे बड़ा नुक्सान विशेषकर मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे संवेदनशील जिलों में।

3. BJP को अप्रत्यक्ष लाभ विपक्षी मुसलमान वोट जितने अधिक बंटेंगे, BJP का एंटी-इन्कम्बेंसी कैश हो सकता है।

4. कांग्रेस और वाम दलों की डूबती नैया को सहाराकबीर इनके लिए ‘मोबिलाइज़र’ की भूमिका निभा सकते हैं।

निष्कर्ष:

हुमायूं कबीर—उम्मीद, चुनौती या 2026 की राजनीति का नया रहस्य?

बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले विधायक का यह नया राजनीतिक अवतार बंगाल की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ का संकेत माना जा रहा है। बयान TMC विरोध के साथ बंगाल में एक नए मुस्लिम पॉलिटिकल ब्लॉक की जमीन तैयार कर रहे हैं।2026 के चुनाव तक कबीर बंगाल की सियासत के सबसे चर्चित और निर्णायक किरदारों में शामिल हो सकते हैं।लेकिन अंत में सवाल वही—क्या हुमायूं कबीर ‘किंगमेकर’ बनेंगे या ‘एक और दलबदलू अध्याय’?

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