बी के झा
पटना/लखनऊ/ न ई दिल्ली, 20 नवंबर
बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार के गठन के बाद जहां सत्ता पक्ष जश्न में डूबा है, वहीं विपक्ष की करारी हार ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर आरजेडी के पारंपरिक MY (मुस्लिम–यादव) वोट बैंक में आई दरार ने न सिर्फ बिहार की राजनीति का ट्रैक बदल दिया है, बल्कि इसका असर अब पड़ोसी उत्तर प्रदेश तक महसूस किया जा रहा है।सबसे चौंकाने वाले नतीजे बिहार के सीमांचल में देखने को मिले—
जहां असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने 5 सीटें जीतकर मुस्लिम विधायकों वाली सबसे बड़ी पार्टी का तमगा हासिल कर लिया। यही ट्रेंड अब अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है।सीमांचल में क्या बदल गया?AIMIM का वोट लगभग दोगुना, RJD का गढ़ हिला**
बिहार के सीमांचल क्षेत्र को हमेशा से आरजेडी का मजबूत आधार माना जाता था। लेकिन इस बार AIMIM ने न सिर्फ अपनी उपस्थिति मजबूत की, बल्कि मुस्लिम वोटों में सेंधमारी भी दिखाई।2020 में AIMIM का वोट प्रतिशत: 1.03%2025 में AIMIM का वोट प्रतिशत: 1.85%यानी वोट शेयर लगभग दोगुना, जबकि सीटें वैसी ही पाँच।यह संकेत है कि मुस्लिम मतदाता अब “टactical voting” के बजाय “independent choice” पर विचार कर रहे हैं—
जहां यादवों की संख्या कम है, वहाँ वे अपने पसंदीदा उम्मीदवार को जिता कर सत्ता समीकरण बदल सकते हैं।और यह सब अखिलेश यादव के लिए अलर्ट क्यों?यूपी का भूगोल और जनसंख्या संरचना बताती है कि कई जिलों में वही समीकरण मौजूद हैं जो बिहार के सीमांचल में पाए जाते हैं—
मुस्लिम आबादी अधिक, लेकिन यादवों की संख्या प्रभावी नहीं।सपा की राजनीति MY सूत्र पर हमेशा खड़ी रही है। लेकिन अगर मुस्लिमों में यह सोच मजबूत होती है कि “जहाँ यादव कम हैं, वहाँ सपा के बिना भी जीत संभव है”—तो 2027 में ओवैसी का उतरना सपा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।इसके साथ ही मुस्लिम समाज में यह चर्चा भी है कि अखिलेश यादव ने आज़म खान के मामले में उतनी मजबूती से आवाज़ नहीं उठाई, जितनी उनसे अपेक्षित थी।
यह असंतोष 2027 के चुनावी माहौल में AIMIM के लिए अवसर और सपा के लिए चुनौती बन सकता है।किन जिलों में UP को सीमांचल जैसी चुनौती मिल सकती है?विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश AIMIM के लिए सबसे उर्वर जमीन माना जा रहा है—
गाजियाबाद, नोएडा, हापुड़, मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, संभल और रामपुर जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी अच्छी-खासी है, पर यादव वोट निर्णायक नहीं।इसी तरह अवध के कई जिलों में भी स्थिति ऐसी बन सकती है जहाँ यादवों के साथ-साथ ब्राह्मण और ठाकुरों का बीजेपी की ओर झुकाव मजबूत है। ऐसे क्षेत्रों में मुस्लिम वोटों का स्वतंत्र झुकाव चुनावी नक्शे को बदल सकता है।2022 में AIMIM का यूपी में वोट प्रतिशत: 0.49%यदि यह बढ़कर 2% के आसपास भी पहुंचा—
तो पश्चिमी यूपी और रोहिलखंड की कई सीटों का परिणाम पूरी तरह बदल सकता है।भविष्य का गणित:2027 में यूपी का मुकाबला बहुकोणीय होगा?
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अभी तक यूपी में मुस्लिमों के पास सपा ही एक बड़ा विकल्प रहा। लेकिन सीमांचल के परिणाम दिखाते हैं कि यह स्थिति अब बदल सकती है।अगर AIMIM कुछ चुनिंदा सीटों पर रणनीतिक ढंग से उम्मीदवार उतारती है, तो यह न सिर्फ मुस्लिम वोटों को बिखेर सकता है, बल्कि सपा के पारंपरिक कोर को भी चुनौती दे सकता है।इसलिए बिहार के सीमांचल का ये छोटा-सा परिणाम, यूपी की 2027 की बड़ी जंग में एक निर्णायक संकेत माना जा रहा है।
निष्कर्ष:
MY गठजोड़ की टिकाऊ शक्ति पर सवाल, और विपक्षी राजनीति के सामने नया समीकरण
बिहार के सीमांचल ने एक बात साफ कर दी है—राजनीतिक निष्ठाएं स्थायी नहीं होतीं, और वोटर अब विकल्प चाहता है।अखिलेश यादव के लिए यह समय आत्ममंथन का है—
क्या सपा मुस्लिम समाज का भरोसा बरकरार रख पाएगी, या ओवैसी उनकी सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरेंगे?
2027 का यूपी चुनाव सिर्फ बीजेपी बनाम सपा का मुकाबला नहीं होगा,बल्कि यह मुस्लिम वोटों की दिशा तय करने वाली निर्णायक लड़ाई भी बन सकता है।
