बी के झा
NSK

पटना / नई दिल्ली, 30 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव का मैदान अब और गरम हो गया है।पहले चरण की वोटिंग नजदीक आते ही कांग्रेस ने अपनी सबसे बड़ी ‘ट्रंप कार्ड जोड़ी’ —
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा — को मैदान में उतारने का फैसला किया है।पार्टी ने इस बार कोई कसर नहीं छोड़ी है —
15 रैलियों का रोडमैप तैयार हो चुका है, पोस्टर, नारे, और भाषणों की स्क्रिप्ट तक दिल्ली में फाइनल की जा रही है।लेकिन बड़ा सवाल यह है —क्या गांधी परिवार की चमक बिहार के सियासी धुंध को चीर पाएगी?
या यह भी वही पुराना नारा बनकर रह जाएगा — “दिल्ली बोलेगी, बिहार सुनेगा?
राहुल-तेजस्वी की जोड़ी ने भरी हुंकार: “बदलाव की हवा” या “भ्रम का प्रचार”?
राहुल गांधी ने बुधवार को मुजफ्फरपुर और दरभंगा से अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की।
मंच पर उनके साथ थे तेजस्वी यादव, जो महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के चेहरा हैं।दोनों नेताओं ने मंच से एनडीए पर तीखे वार किए —राहुल ने मोदी सरकार को “भ्रष्ट और सांप्रदायिक ताकतों का गठबंधन” बताया,तो तेजस्वी ने जनता से अपील की कि “अब वक्त आ गया है कि बिहार से अन्याय की सत्ता उखाड़ फेंकी जाए।”
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने सोशल मीडिया पर दावा किया —सकरा और दरभंगा की रैलियों ने चुनावी माहौल बदल दिया है। जनता बदलाव चाहती है।लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और बयां करती है —
राहुल-तेजस्वी की रैली में भीड़ तो दिखी, मगर उत्साह सीमित रहा।राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि “लालू परिवार की छाया में कांग्रेस अपनी अलग पहचान खो रही है।”
प्रियंका गांधी वाड्रा की एंट्री — “महिलाओं और युवाओं पर कांग्रेस का फोकस”इस हफ्ते के अंत तक प्रियंका गांधी वाड्रा बिहार पहुंचने वाली हैं।
उनकी सभाओं का शेड्यूल फाइनल हो चुका है —
पटना, भागलपुर, गया, नवादा और पूर्णिया में बड़े जनसंवाद तय हैं।पार्टी चाहती है कि प्रियंका “महिलाओं और युवाओं के एजेंडे” को फिर से केंद्र में लाएं।कांग्रेस रणनीतिकारों का मानना है कि प्रियंका की भाषा, शैली और तेवर “भावनात्मक कनेक्ट” बना सकते हैं —
खासकर ग्रामीण महिलाओं के बीच।पार्टी के एक नेता ने कहा,प्रियंका जी का अभियान कांग्रेस में नई ऊर्जा भरेगा। उनकी सभाएं महिला मतदाताओं को सीधे संबोधित करेंगी — शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान के मुद्दों पर।”लेकिन कांग्रेस के अंदर ही कुछ नेताओं का मानना है कि “प्रियंका का जादू” सिर्फ मीडिया सुर्खियों तक सीमित रहेगा —बिहार की जातीय सियासत में भावनात्मक भाषण की पकड़ सीमित होती है।
खड़गे, सोनिया, पायलट और बघेल भी मैदान में — “
दिल्ली का पूरा कुनबा सक्रिय”पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी जल्द बिहार पहुंचेंगे।हाल ही में मेडिकल प्रक्रिया से गुजरने के बावजूद उन्होंने तीन रैलियों का कार्यक्रम तय किया है। सोनिया गांधी, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, सचिन पायलट और पप्पू यादव भी महागठबंधन के प्रचार अभियान में शामिल होंगे।
कांग्रेस चाहती है कि एक संयुक्त चेहरा पेश किया जाए —
एक ऐसा संदेश जो “मोदी बनाम गठबंधन” की तस्वीर को धुंधला कर दे।लेकिन क्या कांग्रेस बिहार में “केंद्रीय चेहरों की रैलियों” के सहारे वोट बैंक बना सकती है?या यह वही कहानी दोहराएगी जो हर चुनाव में दोहराई जाती है — “रैली बड़ी, असर छोटा”?
विशेषज्ञों की टिप्पणी:
“राहुल का भाषण, तेजस्वी की छाया और कांग्रेस की उलझन
”एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने चुटकी ली —
अब चाहे प्रियंका वाड्रा आएं या सोनिया गांधी, लेकिन तेजस्वी के कंधे पर बैठकर राहुल गांधी बिहार में राजनीति नहीं सीख सकते।”
उन्होंने आगे कहा —
महागठबंधन का घोषणापत्र खुद उसके पतन का बीज बन चुका है।
बटाईदारी को मालिकाना हक दिलाने का जिक्र, छठ महापर्व पर तंज, और मुसलमान मतदाताओं को खुली प्रधानता देना —
इन सबने बिहार की जातीय चेतना को झकझोर दिया है।”
उनका तंज और भी धारदार था —
राहुल गांधी की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वो सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर हमला करते हैं,लेकिन जनता का दिल नहीं जीत पाते।और जब वो हिंदू धर्म की परंपराओं पर व्यंग्य करते हैं, तो वोट बैंक नहीं, आक्रोश बढ़ता है।”
क्या कांग्रेस वाकई बिहार में ‘रीबूट’ हो सकती है?बिहार में कांग्रेस आज भी “गठबंधन की बैसाखी” पर टिकी है।
स्वतंत्र पहचान, जमीनी संगठन और ठोस मुद्दे — तीनों ही कमजोर कड़ियाँ हैं।
गांधी परिवार की एंट्री से उत्साह जरूर बढ़ा है, लेकिन जमीनी समीकरण वही पुराने हैं —जात, समुदाय और स्थानीय नेतृत्व का समीकरण ही बिहार में चुनाव तय करता है।
निष्कर्ष:
गांधी परिवार की आखिरी बाजी — या फिर बिहार कांग्रेस का पुनर्जीवन?”
बिहार में कांग्रेस का मिशन इस बार ‘करो या मरो’ जैसा है।राहुल-प्रियंका की जोड़ी के सामने चुनौती सिर्फ मोदी या नीतीश नहीं —बल्कि जनता का विश्वास वापस पाना है।
अगर इस बार भी कांग्रेस जनता की भावनाओं को नहीं समझ पाई,तो आने वाले चुनावों में बिहार उसके लिए सिर्फ “पोस्टर का प्रदेश” बनकर रह जाएगा।
बिहार की जनता अब वादों की राजनीति नहीं,विश्वास की राजनीति चाहती है।और यही कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा है
क्या गांधी परिवार बिहार के दिल तक पहुंच पाएगा,या यह भी एक और राजनीतिक रैली बनकर इतिहास में दर्ज हो जाएंगी।
