बी के झा
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नई दिल्ली, 21 नवंबर
2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़े षड्यंत्र के मामले की सुनवाई गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने उस समय और सख्त हो गई, जब दिल्ली पुलिस ने आरोपियों—उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफ़िशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शादाब अहमद और मोहम्मद सलीम ख़ान—को “राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में संलिप्त सफेदपोश मास्टरमाइंड” बताते हुए उनकी जमानत का कड़ा विरोध किया।पुलिस की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने सुप्रीम कोर्ट के सामने एक तीखी दलील दी—
जब बुद्धिजीवी आतंकवादी बन जाते हैं, तो वे जमीनी आतंकवादियों से कहीं ज्यादा खतरनाक होते हैं।”यही वाक्य कोर्टरूम में बहस को असाधारण रूप से गरमा गया।NYT का जिक्र: “विदेशी प्रेस इन्हें बुद्धिजीवी बताकर भ्रम फैलाता है”ASG ने दलील दी कि अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स और कुछ अन्य विदेशी मीडिया संस्थान आरोपियों को “बुद्धिजीवी” बताकर गलत नैरेटिव गढ़ते हैं। उनका कहना था कि—जैसे ही जमानत की सुनवाई होती है, विदेशी प्रेस इनके समर्थन में स्टोरी छापने लगता है। उन्हें पता नहीं कि ये बुद्धिजीवी नहीं, बल्कि देशद्रोही गतिविधियों के केंद्र में बैठे लोग हैं।”ASG ने दावा किया कि आरोपियों ने CAA विरोध प्रदर्शन को केवल एक “कवर स्टोरी” की तरह इस्तेमाल किया, जबकि असली मकसद “सरकार को गिराना और देश में आर्थिक ठहराव लाना” था।‘
साजिश सरकार गिराने की थी, दंगे ट्रिगर मात्र थे’—पुलिसपुलिस का दावा था कि यह कोई अलग-अलग विरोध या असंतोष का मामला नहीं, बल्कि “एक व्यापक, बहु-स्तरीय साजिश” थी, जिसमें दंगों का समय, ट्रिगर और प्रभाव सब कुछ योजनाबद्ध था।राजू ने कोर्ट में कहा—इस साजिश का असर 53 लोगों की मौत, 530 से ज्यादा घायल और IB अधिकारी व पुलिसकर्मी की हत्या के रूप में सामने आया। यह साधारण विरोध नहीं था। यह लो-इंटेंसिटी सिविल वॉर जैसा परिदृश्य बनाने का प्रयास था।”उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह योजना पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे से मेल खाते समय पर इसलिए बनाई गई थी ताकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को बदनाम किया जा सके।
शरजील इमाम पर विशेष टिप्पणी: ‘
इंजीनियरिंग डिग्री, लेकिन भाषण आग भड़काने वाले’ASG ने शरजील इमाम की इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि पर तंज कसते हुए कहा—आजकल डॉक्टर और इंजीनियर अपनी प्रोफेशनल जिम्मेदारियों से हटकर राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में कूद पड़ते हैं। यही लोग ज्यादा खतरनाक होते हैं, क्योंकि इनके पास सोचने की क्षमता और नेटवर्क दोनों होते हैं।”कोर्ट में शरजील के 2019–20 के भाषणों के वीडियो भी चलाए गए, जिनमें पुलिस का दावा है कि इमाम ने “चक्का जाम”, “दिल्ली तो ट्रेलर है” जैसे बयान दिए और ‘चिकन नेक’ को अवरुद्ध करने जैसी बातें कही।
आरोपियों का पक्ष: “
न हिंसा, न साजिश—सब कुछ राजनीतिक व्याख्या”जमानत की मांग कर रहे आरोपियों के वकीलों ने एक स्वर में कहा कि पुलिस का पूरा मामला “कल्पना और राजनीतिक व्याख्या” पर टिके आरोपों का पुलिंदा मात्र है।उमर खालिद का बचावखालिद के वकील ने कहा—उमर उस समय दिल्ली में नहीं थे। उन्होंने कहीं भी हिंसा का आह्वान नहीं किया।
”शरजील इमाम का पक्षउनके वकील ने दावा किया कि—इमाम ने केवल शांतिपूर्ण नागरिक प्रतिरोध का समर्थन किया था। सरकार की आलोचना कर देना देशद्रोह नहीं होता।”गुलफिशा, हैदर, शादाब और सलीम का तर्कइनके बचाव पक्ष ने कहा कि ये सभी छात्र आंदोलन का हिस्सा थे, किसी गुप्त साजिश के नहीं।मीरान हैदर के वकील ने यहां तक कहा—हैदर खुद शरजील की मौजूदगी का विरोध करते थे। यह कैसे संभव है कि वह उसी साजिश का हिस्सा हों!”वकीलों ने लंबी अवधि से चल रही हिरासत, ट्रायल की धीमी रफ्तार और आरोपों की प्रकृति को देखते हुए जमानत की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच गंभीर, बहस का स्वर तीखा
सुनवाई कर रही बेंच—जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजरिया—ने दोनों पक्षों की दलीलें गंभीरता से सुनीं। कोर्ट ने पुलिस और बचाव पक्ष के तर्कों को रिकॉर्ड में लिया।बेंच से यह भी साफ था कि मामला सिर्फ जमानत का नहीं, बल्कि विरोध की सीमा, राजनीतिक असहमति, राज्य की शक्ति, और नागरिक अधिकारों जैसे संवेदनशील मुद्दों को छूता है।
निष्कर्ष:
जमानत से ज्यादा बड़ी है यह ‘कथा’—बुद्धिजीवी बनाम आतंकी का विमर्शदिल्ली दंगों का केस अब सिर्फ एक आपराधिक केस नहीं रह गया है। यह एक राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन चुका है—यह बहस कि—विरोध कब राष्ट्र-विरोध माना जाए,शिक्षित नागरिक कब ‘खतरनाक’ कहे जाएं,विदेशी मीडिया की कथाएं कितना असर डालती हैं,और सरकार-विरोधी आवाज़ों को किस हद तक सुरक्षा खतरा समझा जाए।सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सिर्फ कानूनी मामला नहीं—लोकतंत्र, असहमति और राष्ट्रीय सुरक्षा की जटिल परतों वाला युगीन सवाल है।
