भारत की BRICS अध्यक्षता: रणनीतिक संतुलन, वैश्विक आतंकवाद और बहुध्रुवीय विश्व की नई धुरी

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/मॉस्को, 10 फरवरी

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का यह बयान कि “भारत की अध्यक्षता में BRICS के एजेंडे का रूस पूर्ण समर्थन करेगा” केवल औपचारिक कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन में भारत की बढ़ती भूमिका की स्पष्ट स्वीकृति भी है। ऐसे समय में जब पश्चिमी दुनिया रूस पर दबाव बनाए हुए है और एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है, भारत की BRICS अध्यक्षता रूस के लिए भी रणनीतिक राहत का संकेत देती है—और पाकिस्तान के लिए अप्रत्यक्ष असहजता का।

भारत का एजेंडा: वर्तमान संकट, भविष्य की तैयारी

लावरोव ने जिस भारत-केंद्रित एजेंडे की प्रशंसा की, उसका मूल फोकस तीन स्तंभों पर टिका है—आतंकवाद विरोधऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षाडिजिटल टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसराजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह एजेंडा भारत की उस “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति का विस्तार है, जिसमें वह किसी एक ध्रुव का हिस्सा बने बिना वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा रहा है।आतंकवाद का प्रश्न और पाकिस्तान की असहज स्थितिलावरोव का भारत–पाकिस्तान–अफगानिस्तान गलियारे का उल्लेख महज भौगोलिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत भी है। वरिष्ठ सुरक्षा विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) आर. के. मिश्रा के अनुसार,“जब रूस खुले तौर पर आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के साथ खड़ा दिखता है, तो यह पाकिस्तान की उस रणनीति को कमजोर करता है जिसमें वह खुद को ‘आतंकवाद का शिकार’ बताने की कोशिश करता रहा है।”

अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञ और पूर्व संयुक्त राष्ट्र सलाहकार एडवोकेट सीमा कुलश्रेष्ठ मानती हैं कि संयुक्त राष्ट्र में Global Counter Terrorism Framework पर भारत-रूस की साझेदारी पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क के लिए कूटनीतिक चुनौती बन सकती है।“भारत वर्षों से सीमा-पार आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय अपराध के रूप में स्थापित करना चाहता है। रूस का समर्थन इस प्रयास को कानूनी और नैतिक मजबूती देता है।”

BRICS: आर्थिक मंच से रणनीतिक मंच की ओर राजनीतिक शिक्षाविद प्रो. अरुणाभ चटर्जी का कहना है कि BRICS अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रहा।“यूक्रेन युद्ध, गाजा संकट और ऊर्जा आपूर्ति पर पश्चिमी नियंत्रण ने BRICS को एक वैकल्पिक वैश्विक संरचना में बदल दिया है, और भारत इसकी नैतिक धुरी बनकर उभर रहा है।”उनके अनुसार, भारत का फोकस Food Security Corridor, Energy Diversification और AI Governance पर होना विकासशील देशों के लिए पश्चिमी मॉडल का विकल्प प्रस्तुत करता है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया: अवसर के साथ सावधानी की मांग

हालांकि विपक्षी दलों ने भारत की कूटनीतिक सक्रियता की सराहना की है, लेकिन उन्होंने सरकार को संतुलन बनाए रखने की सलाह भी दी है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,“रूस के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि BRICS कहीं पश्चिम-विरोधी गुट में तब्दील न हो, जिससे हमारे यूरोप और अमेरिका के साथ संबंध प्रभावित हों।”वहीं वामपंथी दलों का मानना है कि आतंकवाद और ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ Global Inequality और Climate Justice को भी भारत को BRICS एजेंडे में मजबूती से उठाना चाहिए।रूस की दृष्टि: भारत एक भरोसेमंद साझेदाररशिया मामलों के विशेषज्ञ और पूर्व राजनयिक विक्रम सोकोलोव कहते हैं,“रूस के लिए भारत वह साझेदार है जो न तो प्रतिबंधों की भाषा बोलता है और न ही दबाव की।

भारत की अध्यक्षता में BRICS, रूस को वैश्विक मंच पर ‘अलग-थलग’ होने से बचाने का माध्यम भी है।”उनके अनुसार, AI शिखर सम्मेलन में रूस की भागीदारी यह दर्शाती है कि दोनों देश केवल रक्षा या ऊर्जा तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीकों में भी साझेदारी चाहते हैं।

निष्कर्ष:

भारत का क्षण, वैश्विक परीक्षा

भारत की BRICS अध्यक्षता ऐसे दौर में आई है जब दुनिया स्पष्ट रूप से Unipolar से Multipolar व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। लावरोव का समर्थन इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल “संतुलन साधने वाला देश” नहीं, बल्कि “एजेंडा तय करने वाला राष्ट्र” बनता जा रहा है।

आतंकवाद के खिलाफ कठोर रुख, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा पर व्यावहारिक समाधान और तकनीकी भविष्य की स्पष्ट दृष्टि—यदि भारत इन तीनों मोर्चों पर संतुलन बना पाया, तो BRICS उसकी कूटनीतिक परिपक्वता का मील का पत्थर साबित हो सकता है।और शायद यही वह बिंदु है,

जहां पाकिस्तान की चिंता और भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता एक-दूसरे से टकराती दिख रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *