भारत के टुकड़े होने तक शांति नहीं…” — बांग्लादेशी रिटायर्ड जनरल का ज़हर, पाकिस्तान की पुरानी ‘हज़ार घाव’ वाली नीति की छाया? भारत के भीतर भी कुछ सियासी आवाज़ें बढ़ा रहीं चिंता

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 3 दिसंबर

बांग्लादेश के रिटायर्ड ब्रिगेडियर जनरल अब्दुल्लाहिल अमान आज़मी का ताज़ा बयान दक्षिण एशिया की राजनीति में न केवल सनसनी पैदा करता है बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या पड़ोसी देशों के कट्टरपंथी तत्व भारत को लेकर पाकिस्तान जैसी ही रणनीति अपनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं?आजमी ने अपने एक वीडियो में साफ़ कहा—

“जब तक भारत के टुकड़े-टुकड़े नहीं हो जाते, बांग्लादेश में संपूर्ण शांति स्थापित नहीं हो सकती।”यह वही बयानबाज़ी है जो पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ आसिम मुनीर के कथित ‘ब्लीड इंडिया विद अ थाउज़ैंड कट्स’ वाली रणनीति की याद दिलाती है—भारत को सीधी जंग से नहीं, बल्कि विचारों, आतंकवाद, प्रचार और आंतरिक सांप्रदायिक तनाव भड़का कर कमजोर करना।**

कौन है अब्दुल्लाहिल अमान आज़मी?और क्यों उसके शब्दों से झलकती है 1971 की पराजय की खुन्नस**आजमी वही व्यक्ति है जो जमात-ए-इस्लामी के शीर्ष नेता और 1971 नरसंहार के दोषी गुलाम आज़म का बेटा है।गुलाम आज़म को हिंदुओं और बंगाली आज़ादी समर्थकों पर सामूहिक हत्या करवाने के लिए दोषी ठहराया गया था।यह रिटायर्ड जनरल 1971 के मृतकों की संख्या, पाकिस्तानी अत्याचार और यहां तक कि बांग्लादेश के राष्ट्रगान तक पर सवाल उठा चुका है।सितंबर 2024 में उसने कहा था—“1971 के बाद हमारा वर्तमान राष्ट्रगान भारत ने हम पर थोपा।”कट्टर विचारधारा खुलेआम यह मानती है कि भारत बांग्लादेश की संस्कृति, राजनीति और मीडिया में “हस्तक्षेप” करता है और जब तक भारत कमजोर नहीं होगा, तब तक बांग्लादेश मजबूत नहीं हो सकता।

पाकिस्तान की नीति की प्रतिछाया—”हज़ार कट” वाली योजना भारत के सुरक्षा विशेषज्ञ कहते हैं—यह बयान कोई भावनात्मक भड़काऊ भाषण नहीं, बल्कि पाकिस्तानी ISI शैली की दीर्घकालिक ‘प्रॉक्सी स्ट्रैटेजी’ की गूंज है।

पाकिस्तान की पुरानी नीति:“सीधी जंग नहीं… भारत को भीतर से कमजोर करो— आतंक, अस्थिरता, कट्टरता और प्रोपेगेंडा से।”और आज वही भाषा बांग्लादेश के कट्टरपंथी जनरलों की तरफ़ से सुनाई दे रही है।

बांग्लादेश में शेख हसीना के पतन के बाद कट्टर तत्वों का उभार हसीना के हटते ही—जमात-ए-इस्लामी,कट्टर इस्लामी छात्र संगठन,और पाकिस्तान समर्थक तत्व बिना किसी रोकटोक के फिर से सक्रिय हो गए हैं।आईआरआई सर्वे बताता है कि जमात की लोकप्रियता 29% तक पहुंच चुकी है—

इतिहास में पहली बार इतना बड़ा उभार।यानी बांग्लादेश में सत्ता बदलने पर भारत के लिए परिस्थितियां 2001–2006 की स्थिति जैसी खतरनाक बन सकती हैं, जब BNP–जमात सरकार के समय भारत-विरोधी आतंक पूरी तरह फल-फूल रहा था।

भारत के भीतर बढ़ती कट्टर बयानबाज़ी भी चिंता बढ़ाती है विश्लेषकों ने इस पूरे घटनाक्रम को भारत के भीतर उभरती कुछ ‘खतरनाक’ राजनीतिक आवाज़ों से भी जोड़ा है।

1. मौलाना मदनी और सपा सासंद मोहबिला नदमी का संसद से उग्र बयान राज्यसभा में मौलाना मदनी की ओर से किए गए “जिहादी प्रकृति के आह्वान” जैसे बयानों को विशेषज्ञ “लोकतंत्र की गरिमा के खिलाफ़ और समाज में विभाजन बढ़ाने वाला” मानते हैं।

2. समाजवादी सांसद मोहबिला नदमी का ‘जिहाद’ जैसे शब्दों का सहज उपयोग संसद में इस प्रकार की भाषा को राजनीतिक विश्लेषक “चुनावी ध्रुवीकरण और धार्मिक तनाव भड़काने की सोची-समझी रणनीति” बताते हैं।

3. कुछ दलों का मुस्लिम वोट बैंक के लिए बढ़ता कट्टर झुकाव राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार—“कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और टीएमसी के अंदर का एक बड़ा वर्ग वोट बैंक की राजनीति में इतना डूब चुका है कि वे सांप्रदायिक तत्वों को खुलकर हवा देने लगे हैं। यह देश की सुरक्षा के लिहाज़ से सबसे बड़ा खतरा है।”

वरिष्ठ पत्रकार और सुरक्षा विश्लेषकों की चेतावनी

1. राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ आर. एस. चौहान का विश्लेषण“यह बयान सिर्फ एक रिटायर्ड जनरल की जुबान नहीं, बल्कि दक्षिण एशियाई इस्लामी कट्टरपंथ की उस विचारधारा को दर्शाता है जो भारत को एक ‘सिविलाइजेशनल दुश्मन’ मानती है।

”2. वरिष्ठ पत्रकार अचिनंदन रॉयबांग्लादेश की राजनीति में जितना खालीपन बढ़ेगा, पाकिस्तान उतनी तेजी से वहां अपनी जड़ें जमाने की कोशिश करेगा। भारत को बेहद सतर्क रहना होगा।”

3. शिक्षाविद और भू-राजनीतिक विश्लेषक प्रो. पुष्पेन्द्र दास“भारत का असली खतरा बाहर नहीं, भीतर है। बाहरी कट्टरता तभी असर करती है जब भीतर की राजनीति उसके लिए जमीन तैयार करती है।”

क्या भारत पर कोई सीधा खतरा है?विशेषज्ञ कह रहे—‘सैन्य नहीं, वैचारिक और राजनीतिक युद्ध की तैयारी’**कोई भी देश भारत को सैन्य रूप से चुनौती नहीं दे सकता।लेकिन पाकिस्तान–बांग्लादेश–तुर्की समर्थित कट्टर नेटवर्क प्रोपेगेंडा सांप्रदायिक तनाव भीड़ को भड़काना सोशल मीडिया जिहाद राजनीतिक ध्रुवीकरण को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। यही “हज़ार कट की नीति” का आधुनिक रूप है।

भारत को क्या करना चाहिए? विशेषज्ञों की सलाह

1. बांग्लादेश में कट्टरपंथ पर कड़ी निगरानी।

2. भारत में कट्टर राजनीतिक बयानबाज़ी पर ज़ीरो टॉलरेंस।

3. खुफिया एजेंसियों को पूर्वोत्तर और बंगाल में विशेष सतर्कता।

4. पड़ोसी देशों में लोकतांत्रिक ताकतों को मज़बूती से समर्थन।

5. आंतरिक सामाजिक विभाजन को कम करने की राष्ट्रीय रणनीति।

निष्कर्ष

बांग्लादेशी जनरल का बयान सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में उभर रहे नए कट्टर गठजोड़ की तरफ़ इशारा है।और इसी समय भारत के भीतर कुछ राजनीतिक चेहरे “जिहाद” जैसे शब्दों को संसद में इस्तेमाल कर रहे हैं—

यह संयोग नहीं, बल्कि एक खतरनाक समानांतर प्रक्रिया का संकेत है।भारत को न तो डरना है न विचलित होना—

लेकिन अब समय आ गया है कि सुरक्षा एजेंसियां, राजनीतिक नेतृत्व और जनता—

सब पूरी सतर्कता से काम करें।

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