बी के झा
NSK

नई दिल्ली , 7 दिसंबर
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया भारत यात्रा ने सिर्फ यह नहीं दिखाया कि दिल्ली-मॉस्को की दोस्ती कितनी पुरानी और मजबूत है, बल्कि इसने पश्चिमी देशों के राजनीतिक गलियारों और थिंक टैंकों में बेचैनी भी बढ़ा दी। पुतिन को रेड कार्पेट स्वागत और प्रधानमंत्री मोदी का गर्मजोशी भरा व्यवहार—इन सबने पश्चिमी खेमे को गहरे असहज कर दिया। सोशल मीडिया के “पश्चिमी योद्धाओं” ने भारत की विदेश नीति पर सवाल उठाने की पुरज़ोर कोशिश की, लेकिन भारत ने साफ संदेश दिया—“हम दबाव में नहीं आते, हम अपने हित में फैसले खुद लेते हैं।”ऐसे माहौल में, भारत के शीर्ष कूटनीतिज्ञ और सऊदी अरब, UAE, ओमान जैसे देशों में पूर्व राजदूत तलमीज अहमद ने पश्चिम को आइना दिखाते हुए बेहद सटीक विश्लेषण किया है।
उन्होंने साफ कहा—“अमेरिकी वर्चस्व के दिन खत्म हो चुके हैं। भारत जैसे देश नया शीत युद्ध नहीं चाहते। हम सिर्फ अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं।
”भारत-रूस की गहरी दोस्ती — पश्चिम को क्यों चुभ रही है?न्यूज़ एजेंसी ANI को दिए इंटरव्यू में तलमीज अहमद ने कहा कि भारत-रूस संबंध दशकों पुराने हैं, जिन्होंने समय-समय पर अपनी विश्वसनीयता साबित की है।लेकिन पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब दुनिया ‘वन-वे’ राजनीति नहीं मान रही, और पश्चिम का यह दबाव—
“या तो हमारे साथ रहो या हमारे खिलाफ”—अब असरदार नहीं रहा। पूर्व राजदूत ने कहा,“पश्चिम ने रूस को ‘शैतान’ बनाने की कोशिश की है। वह दुनिया के बाकी देशों को मजबूर करता है कि वे सिर्फ उसकी लाइन पर चलें। लेकिन भारत जैसा देश बार-बार कह रहा है—हमें किसी खेमे में मत धकेलो।”रणनीतिक स्वायत्तता: भारत की नई विदेश नीति का असली नाम विदेश मंत्री जयशंकर भले इसे “मल्टी-अलाइनमेंट” या “मिनी-लैटरलिज्म” कहें, लेकिन तलमीज अहमद कहते हैं—
भारत की असली नीति है – रणनीतिक स्वायत्तता।”इसका अर्थ है:भारत किसी ब्लॉक का गुलाम नहींभारत अपने हित में फैसला करेगाभारत को कोई यह नहीं बताएगा कि किससे दोस्ती करे, किससे दूरीउन्होंने स्पष्ट कहा—“गुटनिरपेक्षता की आत्मा आज भी जीवित है। हम संप्रभु देश हैं, हमें कोई डिक्टेट नहीं करेगा।पश्चिम का दोहरा खेल उजागर — खुद रूस से खरीद, दूसरों को नसीहत!तलमीज अहमद ने पश्चिम की सबसे बड़ी कमजोर नस दबाई।उन्होंने कहा—यूरोपीय संघ के ज्यादातर देश आज भी रूस से ऊर्जा खरीद रहे हैं।
अमेरिका रूस से परमाणु ईंधन और रेयर-अर्थ ले रहा है।अमेरिका चीन को कोसता है, पर वहीं उसके साथ व्यापार भी बढ़ा रहा है।और फिर वही पश्चिम भारत को उपदेश देता है—“रूस के करीब मत जाओ।”अहमद ने तंज कसते हुए कहा—“जो खुद रूस से व्यापार कर रहे, वे भारत को नैतिकता ना सिखाएं।”
अमेरिकी वर्चस्व के अंत का युग — नई बहुध्रुवीय दुनिया उभर चुकी है पूर्व राजदूत का विश्लेषण बताता है कि अमेरिका का वह ‘सुपर पावर अब इतिहास है। इसके पीछे कई कारण हैं—अफगानिस्तान, इराक, लीबिया जैसे युद्धों से अमेरिका का नैतिक अधिकार ढह गया।चीन ने अर्थव्यवस्था, तकनीक और सप्लाई चेन में अमेरिका को चुनौती दे डाली।मिडिल पॉवर्स—जैसे भारत, तुर्की, ब्राज़ील, सऊदी—अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपना रहे।
अहमद ने कहा—“
यह नया शीत युद्ध नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय दुनिया का उदय है। हर देश अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का उपयोग कर रहा है।”भारत का संदेश दुनिया को—मित्रता हमारी शर्तों पर, आपके आदेश पर नहीं पुतिन की यात्रा पर पश्चिम की नाराज़गी ने यही साबित किया कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति उन्हें खटकती है।लेकिन भारत का रुख अटल है
—न हम किसी के ब्लॉक में शामिल होंगे न किसी की कठपुतली बनेंगे रिश्ते, दोस्ती और साझेदारी—
सब भारत की ज़रूरत और भारत के हित तय करेंगे और यही वजह है कि भारत-रूस दोस्ती पश्चिम को “चुभती” है।क्योंकि यह संदेश है—
एक आत्मविश्वासी भारत का, स्वतंत्र भारत का, और नई वैश्विक व्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाने वाले भारत का।
