मनरेगा के बाद ‘वीबी-जी राम-जी’: ग्रामीण रोजगार की गारंटी या नीति में बड़ा मोड़?

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 15 दिसंबर

ग्रामीण भारत की आजीविका से जुड़ी सबसे बड़ी योजनाओं में से एक—मनरेगा—अब इतिहास बनने की कगार पर है। केंद्र सरकार उसकी जगह एक नए कानून को लाने की तैयारी में है, जिसका नाम है VB-G RAM-G यानी विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)। प्रस्तावित ‘वीबी-जी राम-जी विधेयक’ को संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की संभावना है। सरकार इसे केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि ग्रामीण रोजगार नीति में संरचनात्मक बदलाव के रूप में पेश कर रही है।लेकिन सवाल यह है—

क्या यह बदलाव ग्रामीण गरीबों के लिए अवसरों का विस्तार करेगा या राज्यों पर बोझ बढ़ाने वाला कदम साबित होगा?क्या बदलेगा मनरेगा से आगे?

1. 100 से 125 दिन: कागज पर बढ़ी गारंटी मनरेगा के तहत हर ग्रामीण परिवार को कम से कम 100 दिन के रोजगार की गारंटी थी। नए कानून में इसे 125 दिन तक बढ़ाने का प्रस्ताव है।सरकार का तर्क है कि इससे ग्रामीण परिवारों की आय सुरक्षा मजबूत होगी।हालांकि जानकारों का कहना है कि मनरेगा में भी आपदा, सूखा और वन क्षेत्रों के लिए अतिरिक्त दिनों का प्रावधान पहले से मौजूद था, लेकिन वह सॉफ्टवेयर और प्रशासनिक शर्तों में उलझ कर रह गया। नया कानून इस सीमा को औपचारिक रूप से बढ़ाकर इसे “स्पष्ट गारंटी” बनाना चाहता है।

2. साप्ताहिक भुगतान: मजदूरों को राहत मनरेगा की सबसे बड़ी शिकायत—देरी से भुगतान—को दूर करने के लिए वीबी-जी राम-जी में बड़ा बदलाव प्रस्तावित है।अब मजदूरी का भुगतान हर हफ्ते या किसी भी हाल में 15 दिनों के भीतर करने की बाध्यता होगी।देरी की स्थिति में मुआवजा का प्रावधान पहले की तरह रहेगा, लेकिन मजदूरी दरों में फिलहाल कोई बदलाव प्रस्तावित नहीं है।

3. फंडिंग में बड़ा बदलाव: राज्यों की जेब पर असर यहीं से असली बहस शुरू होती है।मनरेगा में अनस्किल्ड मजदूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती थी। नए कानून में अब राज्य सरकारों को भी मजदूरी का बोझ साझा करना होगा।पूर्वोत्तर, पर्वतीय राज्य और बिना विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश: 90:10 (केंद्र:राज्य)बाकी राज्य और विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश: 60:40अगर तय सीमा से ज्यादा खर्च हुआ, तो अतिरिक्त राशि राज्य सरकार को ही देनी होगी।

4. खेती के मौसम में ‘ब्रेक पीरियड’वीबी-जी राम-जी का सबसे विवादास्पद प्रावधान है—खेती के पीक सीजन में रोजगार पर ब्रेक।राज्य सरकारों को हर वित्तीय वर्ष में 60 दिन पहले से घोषित करने होंगे, जब बुवाई से कटाई तक कोई काम नहीं कराया जाएगा।सरकार का तर्क है कि इससे खेतों में मजदूरों की कमी नहीं होगी।आलोचकों का कहना है कि यही समय ग्रामीण गरीबों की सबसे ज्यादा जरूरत का होता है।

राजनीतिक विश्लेषण:

नीति या विचारधारा?राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कानून सिर्फ रोजगार नीति में बदलाव नहीं, बल्कि मनरेगा की वैचारिक पहचान से दूरी भी है।एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं—मनरेगा गांधीवादी सामाजिक सुरक्षा की प्रतीक योजना थी। नया कानून ‘विकसित भारत’ के नैरेटिव में उसे समाहित करता है। यह नाम बदलने से ज्यादा, सोच बदलने का संकेत है—जहां गारंटी के साथ राज्यों की जवाबदेही भी बढ़ाई जा रही है।”

विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र सरकार वित्तीय अनुशासन के नाम पर राज्यों पर बोझ स्थानांतरित कर रही है।

विपक्ष का तीखा हमला

विपक्षी ने इस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई है।कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा—मनरेगा गरीब की ढाल थी। अब उसे खत्म कर नया कानून लाकर जिम्मेदारी राज्यों पर डाली जा रही है। खेती के मौसम में काम रोकना सीधे-सीधे ग्रामीण मजदूरों की आय पर चोट है।वाम दलों ने इसे ‘छिपा हुआ रोलबैक’ करार देते हुए कहा कि 125 दिन की गारंटी दिखावटी है, क्योंकि ब्रेक पीरियड के कारण वास्तविक काम के दिन घट जाएंगे।

समर्थक क्या कहते हैं?

सरकार समर्थक विशेषज्ञों का तर्क है कि यह बदलाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ज्यादा यथार्थवादी बनाएगा।एक नीति विशेषज्ञ के अनुसार—

मनरेगा कई बार खेती से मजदूर खींच लेता था। ब्रेक पीरियड से कृषि और ग्रामीण रोजगार में संतुलन बनेगा। राज्यों की भागीदारी से जवाबदेही भी बढ़ेगी।”

निष्कर्ष:

सुधार या जोखिम?वीबी-जी राम-जी विधेयक ग्रामीण भारत के लिए एक नई दिशा हो सकता है—यदि अतिरिक्त दिनों की गारंटी और समय पर भुगतान वास्तव में जमीन पर उतरें।लेकिन अगर राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ा और ब्रेक पीरियड मजदूरों की आय को प्रभावित करने लगा, तो यह योजना सुरक्षा कवच से नीति प्रयोग बन सकती है।फिलहाल इतना तय है—

मनरेगा के बाद आने वाला यह कानून ग्रामीण रोजगार पर बहस को एक बार फिर सियासी और वैचारिक केंद्र में ले आया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *