मशीन बता रही है तुम बांग्लादेशी हो ” मोबाइल से नागरिकता जांच का वीडियो वायरल, यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर देशभर में सवाल

बी के झा

NSK

गाजियाबाद, (उत्तर प्रदेश,) 1 जनवरी

उत्तर प्रदेश पुलिस एक बार फिर सोशल मीडिया के कठघरे में है। इस बार वजह कोई मुठभेड़ या बयान नहीं, बल्कि नागरिकता जांच का एक चौंकाने वाला वीडियो है, जिसने कानून, तर्क और तकनीक—तीनों को एक साथ कटघरे में खड़ा कर दिया है। गाजियाबाद के कौशांबी थाना क्षेत्र से सामने आए इस वीडियो में थाना प्रभारी अजय शर्मा एक संदिग्ध व्यक्ति की पीठ पर मोबाइल फोन रखकर यह कहते नजर आते हैं—“मशीन बता रही है कि यह शख्स बांग्लादेशी है।”विडियो 23 दिसंबर का बताया जा रहा है। लेकिन इसके सार्वजनिक होते ही यह मामला नए साल में राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है।

हाईटेक पुलिसिंग या हाई रिस्क मज़ाक?

आमतौर पर किसी व्यक्ति की नागरिकता जांच के लिए पासपोर्ट, वीजा, आधार, वोटर आईडी या बायोमेट्रिक सत्यापन की आवश्यकता होती है। लेकिन वायरल वीडियो में जो दिख रहा है, वह इन सभी प्रक्रियाओं से परे है—एक सामान्य स्मार्टफोन, जिसे पीठ पर रखकर “मशीन” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।स्थानीय झुग्गीवासियों का कहना है कि जिस व्यक्ति को बांग्लादेशी बताया जा रहा है, वह बिहार के अररिया जिले का निवासी है। इस दावे ने पूरे प्रकरण को और गंभीर बना दिया है।सोशल मीडिया पर मीम्स, लेकिन असल सवाल गंभीर वीडियो के सामने आते ही सोशल मीडिया पर मीम्स, व्यंग्य और तंज की बाढ़ आ गई। किसी ने इसे “डिजिटल छुआछूत” कहा, तो किसी ने “नागरिकता की एक्स-रे मशीन”।

लेकिन शिक्षाविद और समाजशास्त्री आगाह कर रहे हैं कि यह मामला सिर्फ हास्य का नहीं है।प्रो. (डा.) अनिरुद्ध वर्मा, राजनीतिक शिक्षाविद कहते हैं—“यह घटना बताती है कि कैसे शक, सत्ता और तकनीक मिलकर नागरिक अधिकारों को हास्यास्पद और भयावह—दोनों बना सकते हैं।”

सर्च ऑपरेशन की पृष्ठभूमि

यह वीडियो उस समय का है जब गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट और सीआरपी की टीमों ने कौशांबी थाना क्षेत्र के भोवापुर और बिहारी मार्केट इलाके में सघन सर्च ऑपरेशन चलाया था। अभियान का उद्देश्य अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान बताया गया।मेरठ से आई सीआरपी टीम का नेतृत्व सहायक कमांडेंट दीपू रमन सिंह रघुवंशी कर रहे थे। झुग्गियों में रह रहे लोगों के आधार, वोटर आईडी और अन्य दस्तावेजों की जांच की गई।

कानूनविदों की चेतावनी

वरिष्ठ अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ एस.पी. सिन्हा कहते हैं—“किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करना प्रशासनिक नहीं, न्यायिक प्रक्रिया है। पुलिस अगर मनमानी तरीकों से नागरिकता तय करेगी, तो यह सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।

”रक्षा विशेषज्ञों की राय

रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि अवैध घुसपैठ एक वास्तविक राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती है, लेकिन उससे निपटने के लिए प्रशिक्षित तंत्र और प्रमाणिक प्रक्रिया चाहिए, न कि प्रतीकात्मक या डर पैदा करने वाली कार्रवाइयाँ। वहीं एक रक्षा विश्लेषक के अनुसार—“ऐसी घटनाएं असली घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई को भी कमजोर करती हैं, क्योंकि इससे एजेंसियों की साख पर सवाल उठता है।”धार्मिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया

मुस्लिम संगठनों ने इस घटना को प्रोफाइलिंग और सामुदायिक निशानेबाजी का उदाहरण बताया है। उनका कहना है कि झुग्गियों और गरीब इलाकों में रहने वालों को शक की निगाह से देखा जा रहा है।वहीं कुछ हिंदू संगठनों ने कहा कि अवैध घुसपैठ पर सख्ती जरूरी है, लेकिन कानून की प्रक्रिया का पालन उतना ही आवश्यक है।

एक वरिष्ठ हिंदू धर्मगुरु ने कहा—“धर्म के नाम पर नहीं, प्रमाण के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए। अन्यथा निर्दोष अपमानित होंगे।”

विपक्ष का हमला, सरकार की चुप्पी

विपक्षी दलों ने इस वीडियो को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है।समाजवादी पार्टी और कांग्रेस नेताओं ने इसे “संवैधानिक अराजकता” बताया।एक विपक्षी नेता ने कहा—“अगर मोबाइल से नागरिकता तय होगी, तो कल को विचारधारा भी ऐप से नापी जाएगी।”अब तक गाजियाबाद पुलिस प्रशासन या उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इस वीडियो पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। यह चुप्पी सवालों को और गहरा कर रही है।

एक वीडियो, कई खतरे

यह मामला केवल एक वायरल क्लिप तक सीमित नहीं है। यह सवाल उठाता है—क्या पुलिसिंग में प्रशिक्षण की गंभीर कमी है?

क्या अवैध घुसपैठ के नाम पर गरीबों और प्रवासियों को निशाना बनाया जा रहा है?और क्या तकनीक का नाम लेकर असंवैधानिक तरीकों को वैध ठहराया जा रहा है?

नागरिकता कोई ऐप नहीं, जिसे ऑन–ऑफ किया जा सके। यह पहचान, अधिकार और सम्मान से जुड़ा सवाल है। गाजियाबाद का यह वीडियो भले ही लोगों को हँसा रहा हो, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।

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