बी के झा
NSK

हवाना / वॉशिंगटन / नई दिल्ली, 1 फरवरी
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा क्यूबा को तेल आपूर्ति करने वाले देशों के खिलाफ टैरिफ लगाने के फैसले ने वैश्विक कूटनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। यह सिर्फ एक व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि आर्थिक दबाव के जरिए राजनीतिक लक्ष्य साधने की अमेरिकी रणनीति का ताजा अध्याय माना जा रहा है। क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कैनेल बर्मुडेज ने इस कदम को सीधे-सीधे “क्यूबा की अर्थव्यवस्था का गला घोंटने की कोशिश” करार देते हुए तीखी चेतावनी दी है।
राष्ट्रपति डियाज-कैनेल के शब्दों में—“फैसला एक ही है: मातृभूमि या मौत! हम जीतेंगे।”यह बयान सिर्फ भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि क्यूबा की दशकों पुरानी प्रतिरोध राजनीति का पुनः उद्घोष है।
ट्रंप का फैसला: व्यापारिक हथियार से भू-राजनीतिक संदेश
गुरुवार को राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश के तहत क्यूबा को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तेल सप्लाई करने वाले किसी भी देश के उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है। आदेश में क्यूबा को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “असाधारण खतरा” बताया गया है।इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि क्यूबा—रूस, चीन और ईरान जैसे देशों के साथ गठबंधन करता है हमास और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को कथित समर्थन देता है ।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह आदेश प्रतिबंधों की एक्स्ट्रा-टेरिटोरियल (Extra-territorial) नीति को और आक्रामक बनाता है, जिसका असर केवल क्यूबा तक सीमित नहीं रहेगा।
क्यूबा की प्रतिक्रिया: संप्रभुता बनाम साम्राज्यवाद
क्यूबा के राष्ट्रपति ने अपने बयान में ट्रंप प्रशासन पर “साम्राज्यवादी वर्चस्व थोपने” का आरोप लगाया। उनके अनुसार अमेरिका आर्थिक नाकेबंदी के जरिए क्यूबा की विदेश नीति को नियंत्रित करना चाहता है।
राजनीतिक शिक्षाविदों के अनुसार, क्यूबा की यह प्रतिक्रिया—घरेलू स्तर पर जनसमर्थन मजबूत करनेऔर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नैतिक दबाव बनाने—दोनों उद्देश्यों को साधती है।अंतरराष्ट्रीय कानून के नजरिये सेअंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों का कहना है कि तीसरे देशों को निशाना बनाकर लगाए गए ऐसे टैरिफ—विश्व व्यापार संगठन (WTO) की भावना के खिलाफ माने जाते हैं और “द्वितीयक प्रतिबंधों” (Secondary Sanctions) की श्रेणी में आते हैं हालांकि, अमेरिका अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर इन नियमों से खुद को अलग मानता रहा है।
रक्षा और रणनीतिक दृष्टिकोण
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, क्यूबा का सामरिक महत्व आज भी अमेरिका के लिए प्रतीकात्मक रूप से बड़ा है। शीत युद्ध भले खत्म हो गया हो, लेकिन कैरेबियन क्षेत्र में चीन और रूस की बढ़ती मौजूदगी ने वॉशिंगटन की चिंता फिर बढ़ा दी है। ट्रंप का यह कदम उसी रणनीतिक चिंता की अभिव्यक्ति माना जा रहा है।
क्यूबा का आंतरिक संकट और बढ़ती मुश्किलें
ईंधन की भारी कमी, लंबी बिजली कटौती, खाद्य और जल आपूर्ति में बाधा—इन सबके चलते क्यूबा 1959 की क्रांति के बाद के सबसे गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। ऐसे समय में तेल सप्लाई पर अतिरिक्त दबाव वहां की सामाजिक स्थिरता को और चुनौतीपूर्ण बना सकता है।
भारत की संतुलित कूटनीति:विदेश मंत्रालय का दृष्टिकोण
भारतीय विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, भारत पारंपरिक रूप से—संप्रभुता के सम्मान,एकतरफा प्रतिबंधों के विरोध,और संवाद व कूटनीति से समाधान का पक्षधर रहा है।हालांकि भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी मजबूत है, लेकिन भारत ने अतीत में भी क्यूबा पर अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर संयुक्त राष्ट्र में संतुलित रुख अपनाया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत इस मुद्दे पर सार्वजनिक बयान देने से बचते हुए बहुपक्षीय मंचों पर नियम-आधारित व्यवस्था का समर्थन करेगा।
निष्कर्ष
ट्रंप का यह टैरिफ फैसला केवल क्यूबा के खिलाफ नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में शक्ति प्रदर्शन का संकेत है। क्यूबा की “मातृभूमि या मौत” की हुंकार बताती है कि यह टकराव सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि वैचारिक और राजनीतिक भी है।
अब सवाल यह नहीं कि दबाव पड़ेगा या नहीं—
सवाल यह है कि क्या 21वीं सदी में प्रतिबंध और नाकेबंदी अब भी वैश्विक राजनीति का निर्णायक औज़ार रहेंगे?
