बी के झा
नई दिल्ली , 31 जनवरी
बिहार विधानसभा चुनाव और महाराष्ट्र (खासकर मुंबई) के निकाय चुनावों ने कांग्रेस के भीतर एक नई बहस और बेचैनी को जन्म दे दिया है। असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के बढ़ते प्रभाव और कांग्रेस की मौन रणनीति ने पार्टी के कुछ मुस्लिम नेताओं को खुलेआम नेतृत्व पर सवाल उठाने को मजबूर कर दिया है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल चुनावी चिंता नहीं, बल्कि कांग्रेस के वैचारिक युद्ध और नेतृत्व संकट का संकेत है।
बिहार और महाराष्ट्र के नतीजे: कांग्रेस की नींद उड़ाई
बिहार के सीमांचल क्षेत्र में मुस्लिम बहुल 24 सीटों में से AIMIM ने अकेले 5 सीटें जीतकर महागठबंधन और कांग्रेस दोनों को चौंका दिया।महाराष्ट्र के मुंबई नगर निगम चुनाव (BMC) में AIMIM ने 8 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस केवल 24 सीटों पर सिमट गई।वरिष्ठ नेता हुसैन दलवई का कहना है कि ये सीटें कांग्रेस की हो सकती थीं, अगर पार्टी ने मजबूती और स्पष्टता दिखाई होती।
राजनीतिक विश्लेषक अभय दुबे का कहना है:“ओवैसी केवल अल्पसंख्यक वोट बैंक का प्रतिनिधि नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक और राजनीतिक विकल्प बनकर उभरा है।
कांग्रेस का मौन, उसके नेतृत्व के भीतर असुरक्षा को दर्शाता है।
”पार्टी के भीतर नाराजगी और जयचंद विवाद
कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने अंदरूनी बहस को सार्वजनिक कर दिया।लोकसभा व्हिप माणिक्यम टैगोर ने सवाल उठाने वाले नेताओं को ‘जयचंद’ करार दिया।पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद ने राहुल गांधी पर हमला बोलते हुए उन्हें असुरक्षित और डरा हुआ नेता बताया।पूर्व राज्यसभा सांसद राशिद अल्वी ने कहा कि गुलाम नबी आजाद और नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ चुके हैं क्योंकि कांग्रेस में मुस्लिम नेतृत्व की जगह सिकुड़ती जा रही है।सिनियर्स का मानना है कि यह नाराजगी केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संघीय और संगठनात्मक कमजोरी की तरफ इशारा करती है।
राहुल गांधी की रणनीति और ‘मौन’ की राजनीति
कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी अपने भाषणों में SC, ST और OBC का जिक्र बार-बार करते हैं, लेकिन ‘मुस्लिम’ शब्द से परहेज करते हैं।CPI(ML) के दीपांकर भट्टाचार्य ने गठबंधन बैठकों में सुझाव दिया था कि कांग्रेस को उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत और उनके साथ हो रहे व्यवहार पर बोलना चाहिए, लेकिन पार्टी ने मौन साधे रखा।कांग्रेस के निपटुल निर्णय पर वरिष्ठ पत्रकार सागर मेहता कहते हैं:“यह मौन केवल रणनीतिक नहीं है, बल्कि चुनावी डर और भूतपूर्व सामरिक असुरक्षा का परिणाम भी है।
”भेदभाव का आरोप: मंदिर बनाम मॉब लिंचिंग
उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ नेता ने पार्टी के दोहरे मापदंड पर सवाल उठाए:
अगर नोएडा में कोई हिंदू डूबता है या वाराणसी में मंदिर तोड़े जाते हैं, तो कांग्रेस तुरंत प्रतिक्रिया देती है।लेकिन मुस्लिम समुदाय पर अत्याचार, लिंचिंग या संपत्ति पर हमला होने पर पार्टी मौन रहती है। वहीं, महाराष्ट्र के एक मुस्लिम AICC नेता ने तर्क दिया कि“कांग्रेस मुस्लिम पार्टी के रूप में ब्रांडेड नहीं हो सकती। भाजपा इसका चुनावी लाभ उठाती है। मौन नीतियां लंबी अवधि में समुदाय के हित में हैं।”
शिक्षाविदों और मुस्लिम नेतृत्व की दृष्टि
शिक्षाविद और राजनीतिक विश्लेषक प्रो. रेणु मलिक का कहना है कि कांग्रेस का यह मौन सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व खालीपन को दर्शाता है।
मुस्लिम मौलाना और सामाजिक चिंतक भी चेतावनी देते हैं कि अगर कांग्रेस अपना नेतृत्व स्पष्ट नहीं करती, तो ओवैसी केवल वोट बैंक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व का विकल्प बन जाएगा।
कानूनी और संवैधानिक परिप्रेक्ष्य
कानूनविदों का कहना है कि राजनीतिक दलों का यह दोहरा व्यवहार न केवल नैतिक संकट, बल्कि संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्य पर सवाल उठाता है।अनुच्छेद 14 और 15 के तहत सभी नागरिक समान हैं।अगर कोई दल किसी समुदाय के मुद्दों पर चुप रहता है, तो यह समानता और न्याय की संवैधानिक भावना के विरुद्ध है।वरिष्ठ अधिवक्ता आर.के. सेन का कहना है:“राजनीति में रणनीति हो सकती है, लेकिन संवैधानिक मूल्यों से समझौता नहीं। यह कांग्रेस के लिए दीर्घकालीन नेतृत्व और वैचारिक संकट को जन्म दे रहा है।”
निष्कर्ष
वैचारिक युद्ध और भविष्य
कांग्रेस वर्तमान में एक वैचारिक युद्ध से गुजर रही है।एक तरफ उसे अपना धर्मनिरपेक्ष आधार बचाना है।दूसरी तरफ ओवैसी की AIMIM उसके पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगा रही है।पार्टी के अंदरूनी संकेत साफ हैं:यदि कांग्रेस ने अब अपनी रणनीति नहीं बदली, तो वह मुस्लिम समुदाय के नेतृत्व और भरोसे दोनों खो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषक अभय दुबे कहते हैं:“यह केवल सीटों की हानि नहीं, बल्कि वैचारिक और नेतृत्वगत पतन का पूर्वाभास है।”
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