मोकामा की सियासत पर अदालत की सख़्ती अनंत सिंह को जमानत नहीं, ‘बाहुबली राजनीति’ पर फिर बहस तेज

बी के झा

NSK

पटना , 16 दिसंबर

बिहार की राजनीति में अपने दबदबे, विवादों और चुनावी जीत—तीनों के लिए पहचाने जाने वाले मोकामा विधायक अनंत सिंह को एक बार फिर अदालत से राहत नहीं मिली है। दुलारचंद यादव हत्याकांड में पटना की एमपी–एमएलए कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी है।

नतीजा साफ है—जेल में रहते हुए छठी बार विधायक बनने वाले ‘छोटे सरकार’ को फिलहाल बेऊर जेल में ही रहना होगा।यह फ़ैसला सिर्फ़ एक जमानत याचिका की अस्वीकृति नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीति में कानून, बाहुबल और जनादेश के टकराव की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

क्या है दुलारचंद यादव हत्याकांड?

29 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोकामा के बसावनचक गांव के पास यह वारदात हुई थी।दुलारचंद यादव, जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी के समर्थन में प्रचार कर रहे थे। इसी दौरान पीयूष प्रियदर्शी और जदयू उम्मीदवार अनंत सिंह के काफ़िले आमने-सामने आ गए।

पुलिस के अनुसार—दोनों पक्षों में पहले कहासुनी हुईफिर मारपीट और फायरिंग हुई दुलारचंद यादव के पैर में गोली लगी हालांकि, पोस्टमार्टम और जांच में यह बात सामने आई कि मौत गोली से नहीं, बल्कि शरीर के ऊपर से किसी भारी वाहन के गुजरने से हुई। परिजनों का आरोप है कि गोली लगने के बाद अनंत सिंह और उनके समर्थकों ने दुलारचंद यादव को कुचलकर मार डाला।इस मामले में अनंत सिंह समेत 80 से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हुई थी।

पुलिस और CID की संयुक्त टीम अब भी जांच में जुटी है।जेल से जीत, लेकिन आज़ादी नहींइस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति को और जटिल बना दिया है।अनंत सिंह ने—

जेल में रहते हुए चुनाव लड़ाबाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी को 28 हजार से अधिक वोटों से हराकर मोकामा सीट से छठी बार जीत दर्ज की लेकिन चुनावी जीत भी उन्हें अदालत से राहत नहीं दिला सकी।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं—यह बिहार की राजनीति का विरोधाभास है। जनता का जनादेश एक तरफ़, और न्यायिक प्रक्रिया दूसरी तरफ़। अदालत का फ़ैसला यह संकेत देता है कि बाहुबल कितना भी मजबूत हो, कानून के सामने उसे झुकना ही पड़ता है।

”जदयू की चुप्पी, विपक्ष का हमला

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के क़रीबी माने जाने वाले अनंत सिंह के मामले में जदयू ने अब तक बेहद संयमित रुख अपनाया है। पार्टी के भीतर इसे “कानूनी प्रक्रिया का विषय” बताया जा रहा है।वहीं विपक्ष ने इस फ़ैसले को सरकार पर हमला बोलने का अवसर बना लिया है।

आरजेडी का बयान

आरजेडी नेताओं का कहना है—यह मामला दिखाता है कि बिहार में अपराध और राजनीति किस तरह गुथे हुए हैं। नीतीश कुमार सुशासन की बात करते हैं, लेकिन उनके चहेते विधायक गंभीर आपराधिक मामलों में जेल में हैं।

”जन सुराज पार्टी की प्रतिक्रियाएं

सुराज पार्टी ने अदालत के फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा—यह सिर्फ़ हमारे कार्यकर्ता दुलारचंद यादव को न्याय दिलाने की दिशा में एक कदम है। हम चाहते हैं कि बिना किसी राजनीतिक दबाव के निष्पक्ष सुनवाई हो।”क्या यह ‘बाहुबली राजनीति’ के पतन का संकेत है?

राजनीतिक अध्येता मानते हैं कि—बिहार में बाहुबली नेताओं का सामाजिक आधार अभी भी मजबूत है, लेकिन अदालतों का रुख़ सख़्त हुआ है। जमानत खारिज होना इस बात का संकेत है कि अब केवल जनसमर्थन से क़ानूनी राहत मिलना आसान नहीं रहा।हालांकि, यह भी सच है कि अनंत सिंह जैसे नेता अब भी चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं, जो राजनीति और अपराध के गठजोड़ पर बड़े सवाल खड़े करता है।

आगे क्या?

जमानत खारिज होने के बाद अनंत सिंह उच्च अदालत का रुख कर सकते हैं

CID और पुलिस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, केस की धार और तेज़ होगी मोकामा की राजनीति में सत्ता, संगठन और सड़क—तीनों स्तरों पर हलचल बनी रहेगी।

निष्कर्ष

अनंत सिंह का जेल में रहना यह साबित करता है कि चुनावी जीत कानून से ऊपर नहीं है, लेकिन साथ ही यह भी उजागर करता है कि बिहार की राजनीति में बाहुबल अब भी एक सशक्त वास्तविकता है।

अदालत का यह फ़ैसला सिर्फ़ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि यह बिहार की लोकतांत्रिक राजनीति के उस सवाल से जुड़ा है—क्या सत्ता और ताक़त से ऊपर सचमुच कानून खड़ा हो पा रहा है?इसका जवाब आने वाले मुक़दमों और फ़ैसलों में छिपा है।

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