“यह आतंकवाद से भी बड़ा खतरा है” — कश्मीर की राजनीति पर भाजपा का तीखा प्रहार, बढ़ती बयानबाज़ी ने खोली लोकतंत्र की दरारें — जम्मू-कश्मीर में शांति, पहचान और सत्ता की जंग पर एक व्यापक राजनीतिक-वैचारिक विश्लेषण

बी के झा

NSK

नई दिल्ली / श्रीनगर , 5 जनवरी

जम्मू-कश्मीर में जब आतंकवाद की तीव्रता पहले के मुकाबले घटी मानी जा रही है, ठीक उसी समय राजनीतिक बयानबाज़ी एक नए टकराव का केंद्र बनती जा रही है। भारतीय जनता पार्टी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि इन दलों के नेता अपने “भड़काऊ और विभाजनकारी” बयानों से कश्मीर में आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक माहौल पैदा कर रहे हैं।

भाजपा प्रवक्ता रजनी सेठी के बयान ने घाटी की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है—क्या कश्मीर की मौजूदा चुनौती बंदूक से ज्यादा भाषा और बयान बन चुके हैं?

भाजपा का आरोप: सत्ता छिनने की खीझ में ज़हर रजनी सेठी ने कहा कि 2014 के बाद केंद्र में आई मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर में:बिना धार्मिक भेदभाव के विकास योजनाएं लागू कीं सुरक्षा स्थिति में उल्लेखनीय सुधार किया आम नागरिकों तक कल्याणकारी योजनाओं की सीधी पहुंच बनाई उनका आरोप है कि इसी वजह से एनसी और पीडीपी का पारंपरिक राजनीतिक वर्चस्व कमजोर हुआ, और अब वे “हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण” तथा भय का सहारा ले रहे हैं।“

आतंकवादी हमला बाद में करता है, लेकिन गैर-जिम्मेदार बयान रोज़-रोज़ नुकसान करते हैं। आज कश्मीर को सबसे ज्यादा नुकसान राजनीति से हो रहा है।”

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा का हमला केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पोस्ट-370 राजनीति की वैचारिक लड़ाई का हिस्सा है।कुछ विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा कश्मीर की समस्याओं को “राष्ट्रीय एकीकरण” के फ्रेम में रख रही हैवहीं क्षेत्रीय दल पहचान, स्वायत्तता और अस्मिता के सवाल उठा रहे हैं एक शिक्षाविद का कहना है:“यह टकराव सुरक्षा बनाम पहचान का है। लेकिन जब भाषा उग्र हो जाती है, तो लोकतांत्रिक संवाद टूटने लगता है।”

हिंदू संगठनों और धर्म गुरुओं की प्रतिक्रिया की हिंदू संगठनों और संत-समाज से जुड़े धर्म गुरुओं ने भाजपा के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि:राष्ट्रविरोधी संकेत देने वाले बयान सामाजिक सौहार्द को तोड़ते हैं राष्ट्रीय प्रतीकों और नारों से दूरी जनता में भ्रम पैदा करती है एक प्रमुख धर्म गुरु ने कहा:“हिंदुत्व को मुस्लिम-विरोधी बताना सबसे बड़ा झूठ है। हिंदुत्व राष्ट्र और मानवता से प्रेम की विचारधारा है।”

हालांकि कुछ संतों ने यह भी चेतावनी दी कि धार्मिक पहचान को राजनीतिक हथियार न बनाया जाए, वरना समाज में स्थायी दरार पड़ सकती है।

कानूनविदों का सवाल: अभिव्यक्ति बनाम राष्ट्रविरोध

संवैधानिक कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस बेहद संवेदनशील है।अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है लेकिन वही संविधान राष्ट्रीय एकता और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा भी करता है एक वरिष्ठ कानूनविद के अनुसार:“हर आलोचनात्मक बयान राष्ट्रविरोधी नहीं होता, लेकिन यदि बयान से हिंसा, अलगाव या घृणा को बढ़ावा मिले, तो राज्य का हस्तक्षेप न्यायोचित हो सकता है।

”विपक्षी दलों का पलटवार

एनसीपी और पीडीपी से जुड़े नेताओं ने भाजपा के आरोपों को “ध्यान भटकाने की राजनीति” बताया।उनका कहना है कि बेरोजगारी, नशाखोरी और लोकतांत्रिक रिक्तता असली मुद्दे हैं उन्होंने सवाल उठाया कि युवाओं से किए गए रोजगार के वादे कहां हैं?

नशे के बढ़ते जाल पर केंद्र और यूटी प्रशासन की चुप्पी क्यों है?

एक विपक्षी नेता ने कहा:“अगर कश्मीर में सब कुछ सामान्य है, तो फिर निर्वाचित सरकारों को कमजोर क्यों किया जा रहा है?”

भारत सरकार की प्रतिक्रिया

केंद्र सरकार के सूत्रों का कहना है कि:जम्मू-कश्मीर में शांति, विकास और कानून-व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता है-किसी भी ऐसे बयान या गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, जो सांप्रदायिक तनाव या अलगाव को बढ़ावा दे गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि कानून सबके लिए समान है, चाहे वह सत्ताधारी हो या विपक्ष में।

निष्कर्ष:

बंदूक से आगे की चुनौती आज कश्मीर में सवाल सिर्फ आतंकवाद का नहीं है।

सवाल है—भरोसे का भाषा की जिम्मेदारी का और राजनीति की परिपक्वता का यदि बयानबाज़ी ही समाज को बांटने लगे, तो शांति केवल सुरक्षा बलों से नहीं आएगी।

कश्मीर को अब बंदूक से ज्यादा संवाद की जरूरत है।यह लड़ाई केवल सत्ता की नहीं,कश्मीर के भविष्य की है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *