बी के झा
NSK


लखनऊ / नई दिल्ली , 13 दिसंबर
उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चल रही कवायद ने राज्य की राजनीति को साफ संदेश दे दिया है—
2027 की लड़ाई योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही लड़ी जाएगी। संगठन की कमान एक ओबीसी नेता को सौंपने की तैयारी केवल एक संगठनात्मक फैसला नहीं, बल्कि इसके जरिए बीजेपी ने सामाजिक संतुलन, नेतृत्व और भविष्य की रणनीति—
तीनों पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है।राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह फैसला सीधे-सीधे उस भ्रम को तोड़ता है, जो 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर फैलाया जा रहा था। पार्टी ने यह दिखा दिया है कि सरकार का चेहरा योगी आदित्यनाथ ही हैं और रहेंगे—योगी ही उपयोगी हैं।ओबीसी अध्यक्ष: नाराज़ तबकों को साधने की कोशिश बीजेपी का यह कदम खास तौर पर गैर-यादव ओबीसी समाज को संदेश देने वाला माना जा रहा है।
2024 के लोकसभा चुनाव में इस वर्ग का एक हिस्सा बीजेपी से खिसका था। अब संगठन की कमान ओबीसी नेता को देकर पार्टी ने यह संकेत दिया है कि वह सामाजिक समीकरणों की अनदेखी नहीं कर रही।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. के.पी. सिंह कहते हैं, “अगर बीजेपी सामान्य वर्ग के नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाती, तो इसका मतलब नेतृत्व परिवर्तन की भूमिका माना जाता। लेकिन ओबीसी अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने सत्ता और संगठन में संतुलन कायम किया है—
सरकार अगड़े के पास, संगठन पिछड़े वर्ग के हाथ में।”नेतृत्व परिवर्तन की अटकलनों पर विराम
2024 के लोकसभा नतीजों के बाद यह चर्चा तेज हो गई थी कि योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली से पार्टी के कुछ नेता असहज हैं। अंदरखाने केंद्रीय नेतृत्व तक शिकायतें भी पहुंचीं। आरोप लगे कि कठोर प्रशासन और सख्त फैसलों की वजह से ब्राह्मण और गैर-यादव ओबीसी वर्ग का एक हिस्सा नाराज़ हुआ।
हालांकि, पार्टी नेतृत्व का आकलन इससे अलग रहा। उसके मुताबिक, कानून-व्यवस्था पर योगी की सख्ती, अपराध पर नियंत्रण और विकास कार्यों की निरंतरता ने उन्हें बीजेपी का सबसे मजबूत चेहरा बनाए रखा है। ऐसे में नेतृत्व बदलना फायदे से ज्यादा नुकसानदेह हो सकता था।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं, “
योगी की छवि एक निर्णायक प्रशासक की है। यही छवि बीजेपी को शहरी मध्यवर्ग और कोर वोटर में मजबूती देती है।”
‘स्टार प्रचारक’ योगी और पार्टी की मजबूरी
योगी आदित्यनाथ अब सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नेता नहीं रहे। दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनावों में वे बीजेपी के स्टार प्रचारक बन चुके हैं। हिंदुत्व और सुशासन की उनकी छवि कार्यकर्ताओं में जोश भरती है।एक वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार, “बीजेपी के पास योगी के कद का दूसरा नेता फिलहाल यूपी में नहीं है। यही वजह है कि तमाम असहमतियों के बावजूद पार्टी उन्हें आगे रखे हुए है।”
क्षेत्रीय संतुलन की नई चुनौतीओबीसी नेता पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से एक नई बहस भी खड़ी हो गई है। वे पूर्वांचल के महाराजगंज से आते हैं, जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इसी इलाके से जुड़े हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वाराणसी से सांसद हैं। यानी सत्ता और संगठन—दोनों की कमान पूर्वांचल के हाथों में चली गई है।
राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि अब मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को संतुलित करने के लिए जल्द ही मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है।विपक्ष का हमला: ‘सब दिखावा’विपक्षी दलों ने बीजेपी के इस कदम को राजनीतिक दिखावा बताया है।
समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, “प्रदेश अध्यक्ष बदलने से ज़मीनी सच्चाई नहीं बदलती। बेरोज़गारी, महंगाई और किसानों की परेशानी पर सरकार जवाब देने से बच रही है।”कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि बीजेपी जातीय संतुलन के नाम पर सिर्फ चुनावी गणित साध रही है। उनके मुताबिक, “असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए संगठनात्मक फैसलों को बड़ा राजनीतिक संदेश बनाया जा रहा है।
”निष्कर्ष:
2027 की सीधी तैयारी कुल मिलाकर,
यूपी बीजेपी के अध्यक्ष चुनाव का सबसे बड़ा संदेश साफ है—2027 में चेहरा बदलेगा नहीं, बल्कि समीकरण बदले जाएंगे। योगी आदित्यनाथ पार्टी के केंद्र में रहेंगे, जबकि संगठन और मंत्रिमंडल के जरिए सामाजिक व क्षेत्रीय संतुलन साधा जाएगा।अब देखना यह है कि बीजेपी इस संतुलन को ज़मीन पर कितना उतार पाती है और क्या यह रणनीति 2027 में सत्ता की हैट्रिक दिलाने में कामयाब होती है या नहीं।
