बी के झा
NSK

अयोध्या/ लखनऊ/ नई दिल्ली, 24 नवंबर
अयोध्या एक बार फिर ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने जा रही है। 25 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर के शिखर पर भगवा ध्वज फहराकर ध्वजारोहण की अविश्वसनीय परंपरा की शुरुआत करेंगे। इस आयोजन को लेकर पूरी रामनगरी दुल्हन की तरह सज रही है, वहीं राजनीतिक तापमान भी तेज़ी से चढ़ रहा है। कार्यक्रम से पहले सपा के वरिष्ठ सांसद अवधेश प्रसाद के रुख में आए अचानक बदलाव ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है।दो दिन पहले सत्य सनातन धर्म प्रचारक दिवाकराचार्य महाराज ने सपा सांसद पर आरोप लगाया था कि वे सार्वजनिक धार्मिक आयोजनों में कम ही दिखाई देते हैं। पर अब सांसद अवधेश प्रसाद ने न केवल इन आरोपों को खारिज किया, बल्कि जोर देकर कहा है—“मुझे यदि न्योता मिलेगा तो मैं अपने सारे कामधाम छोड़कर नंगे पैर राम मंदिर ध्वजारोहण में शामिल होने जाऊंगा।”
उनके इस भावुक बयान के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं।क्या उपचुनाव की करारी हार ने बदला सपा सांसद का स्वर?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अयोध्या और उसके आसपास के राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं। हाल ही में हुए उपचुनावों में सपा को मिली करारी हार के बाद पार्टी के कई नेताओं ने पारंपरिक वोट बैंक को नए ढंग से साधने की कोशिश शुरू कर दी है। यही कारण है कि अवधेश प्रसाद का यह “ह्रदय परिवर्तन” राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
एक राजनीतिक विश्लेषक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—“अयोध्या मुद्दे पर सपा नेताओं का बदलता रुख चुनावी गणित से जुड़ा है। धार्मिक कार्यक्रमों में दूरी बनाकर चलने की सपा की पुरानी छवि अब नुकसान पहुँचा रही है।”हिंदू संगठनों और वीएचपी की पैनी प्रतिक्रिया
अवधेश प्रसाद के बयान पर वीएचपी और हिंदू संगठनों ने भी तीखी टिप्पणी की है।
वीएचपी के क्षेत्रीय प्रवक्ता ने कहा—“अयोध्या केवल राजनीति का विषय नहीं है, यह आस्था का केंद्र है। जिन्हें वर्षों तक श्रीराम की भव्यता दिखाई नहीं दी, उन्हें आज ध्वजारोहण पर अचानक प्रेम उमड़ता दिख रहा है। यह चुनावी हिंदुत्व है, वास्तविक श्रद्धा नहीं।”हिंदू महाविद्यालय सभा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने तंज कसते हुए कहा—
“नंगे पैर जाना कोई प्रमाणपत्र नहीं। सबसे पहले मन की श्रद्धा ज़रूरी है। कार्यक्रम के एक दिन पहले याद आने वाली भक्ति जनता समझ चुकी है।
”भाजपा का सपा पर सीधा हमला
बीजेपी प्रवक्ता एस.एन. सिंह ने कहा—“सपा नेताओं को अयोध्या की भव्यता चुभती है। अब जब पूरा देश श्रीराम की भक्ति में डूबा है, ये लोग अवसरवाद में डूबे दिख रहे हैं। उपचुनावों में जनता ने जो संदेश दिया है, वह इनके ‘नंगे पैर’ जाने से नहीं बदलने वाला।”एक अन्य बीजेपी नेता ने टिप्पणी की—“
ध्वजारोहण धार्मिक कार्यक्रम है। लेकिन यह स्पष्ट है कि सपा नेता इसे भी राजनीतिक लॉस रिकवरी का माध्यम मान रहे हैं।”सपा का पलटवार—“यह श्रद्धा है, राजनीति नहीं”सपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अवधेश प्रसाद को “हृदय परिवर्तन” कहना गलत है। वे अयोध्या के मूल निवासी हैं और रामलला के प्रति उनकी श्रद्धा पहले से रही है।
सपा के एक नेता ने कहा—“अवधेश जी की आस्था को राजनीति चश्मे से देखना गलत है। वह सदा से रामभक्त रहे हैं। आज जब अयोध्या विश्व मंच पर चमक रहा है, स्थानीय सांसद का शामिल होना स्वाभाविक है।”अवधेश प्रसाद की भावुकता—भक्ति या रणनीति?
एक निजी चैनल से बातचीत में सपा सांसद ने कहा—“मेरे ऊपर प्रभु श्रीराम, माता सीता, हनुमान जी और सरयू माई की कृपा है। सीता रसोई में मैं छात्र जीवन से जाता रहा हूं।”“सांसद और अयोध्या के नागरिक होने के नाते तैयारियों को देखने की जिम्मेदारी मेरी भी है।”उनकी भाषा में एक गहरी भावुकता दिखी, जिसे कुछ लोग वास्तविक भक्ति बता रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक मजबूरी मान रहे हैं।अयोध्या में माहौल चुनावी भी, भावनात्मक भी प्रधानमंत्री के आगमन से पहले पूरा शहर सुरक्षा और भव्यता से लकदक है।
ध्वजारोहण के इस ऐतिहासिक अवसर पर देशभर की नजरें अयोध्या पर होंगी। ऐसे में किसी भी नेता की गतिविधि, बयान और बदलता स्वर स्वाभाविक रूप से चर्चा का केंद्र बन रहा है।
निष्कर्ष
अवधेश प्रसाद का “नंगे पैर ध्वजारोहण में जाने” वाला बयान धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति है या बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत—यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि अयोध्या के धार्मिक आयोजनों में राजनीतिक दलों की सक्रियता आने वाले चुनावों की दिशा भी तय करेगी।रामनगरी का माहौल अभी भक्तिमय भी है और राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी—और यही इस कहानी को और भी रोचक बनाता है।
