बी के झा
NSK

पटना, 18 नवंबर —
बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद लालू परिवार की कलह अब सार्वजनिक हो चुकी है। तेजस्वी यादव और उनके करीबी सलाहकारों पर गंभीर आरोप लगाकर घर छोड़ चुकीं रोहिणी आचार्य के भावुक वार-पलटवार के बाद आज आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है।पार्टी विधायकों की बैठक में लालू यादव ने स्थिति को शांत करने की कोशिश करते हुए कहा—
यह पूर्णत: पारिवारिक मामला है। इसे परिवार के भीतर सुलझा लिया जाएगा। मैं इसके लिए मौजूद हूँ।’इस दौरान बैठक में तेजस्वी यादव को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुना गया—
जिसका अर्थ है कि लालू प्रसाद ने अपनी राजनीतिक विरासत अब भी तेजस्वी के हाथों में ही रखने का संकेत दिया है।
रोहिणी आचार्य का विद्रोह: ‘मैं दूर जा रही हूँ’,
तेजस्वी-संजय यादव पर तीखा हमला
46 वर्षीय रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर फटकार भरा पोस्ट लिखकर—राजनीति छोड़ने परिवार से दूरी बनानेऔर पार्टी में “गुटबाज़ी, चापलूसी और षड्यंत्र” बढ़नेका आरोप लगाया था।रोहिणी ने सीधे तौर पर राज्यसभा सांसद संजय यादव और तेजस्वी के करीबी रमीज को दोषी ठहराया था, जिसकी पृष्ठभूमि पार्टी की सिर्फ 25 सीटों वाली ऐतिहासिक हार रही।
मीसा भारती का पलटवार:
“ये पारिवारिक बातें हैं, सुलझ जाएँगी”लालू परिवार की बड़ी बेटी और पाटलिपुत्र सांसद मीसा भारती ने विवाद को नकारते हुए कहा—
परिवारों में ऐसी बातें होती रहती हैं। मिल-बैठकर हल निकाल लिया जाएगा।’
उन्होंने यह भी साफ किया कि परिवार की संपत्ति पर कब्ज़े के आरोप निराधार हैं, क्योंकि ईडी और सीबीआई की कार्रवाई के चलते सारी संपत्तियाँ पहले से निगरानी में हैं।
तेज प्रताप और साधु यादव का हमला: “रोहिणी का अपमान बर्दाश्त नहीं
”निष्कासित बड़े बेटे तेज प्रताप यादव (जो अब अपनी अलग पार्टी बनाकर चुनाव हार चुके हैं) ने कहा—
रोहिणी का अपमान हमारी विरासत को बर्बाद कर देगा।’’वहीं लालू के साले साधु यादव ने तेजस्वी यादव के “अहंकार” को जिम्मेदार ठहराते हुए “विश्वासघाती सलाहकारों को हटाने” की माँग की— जिससे यह साफ हो गया कि मामला केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों से भी गहराई से जुड़ा है।
लालू की कमजोरी और वोट बैंक में दरार:राजनीतिक विश्लेषकों की
रायराजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, लालू यादव की बीमारी और उम्र के चलते सक्रियता कम होने का असर आरजेडी पर साफ दिख रहा है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अनील झा कहते हैं—रोहिणी का यह विद्रोह केवल पारिवारिक नाराज़गी नहीं है। यह आरजेडी के भीतर नेतृत्व संघर्ष का पहला सार्वजनिक संकेत है। तेजस्वी पर केंद्रीकरण बढ़ रहा है और कई पुराने चेहरे निर्णायक ढंग से हाशिए पर जा रहे हैं।
वहीं चुनावी रुझानों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ शैलेंद्र मिश्र का कहना है—
आरजेडी का मुस्लिम-यादव गठजोड़ पहली बार इतनी मजबूती से बिखरता दिखा है। तेजस्वी की रणनीति और सलाहकारों की भूमिका को लेकर अंदरखाने में असंतोष लंबे समय से था, रोहिणी ने बस उसे सार्वजनिक कर दिया।
”एक वरिष्ठ समाजशास्त्री डॉ. कविता सिंह इस विवाद को “पार्टी के भविष्य का सबसे बड़ा मोड़” मानते हुए कहती हैं—लालू परिवार की नैतिक छवि तब सबसे मज़बूत बनी थी जब रोहिणी ने पिता को किडनी दी। आज उसी रोहिणी का दर्द पार्टी की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है।”
बीजेपी की प्रतिक्रिया: ‘पितृ सत्तात्मक मानसिकता’ का तंज
बीजेपी नेता दिलीप जायसवाल ने तंज कसते हुए कहा कि—लालू यादव की पितृसत्तात्मक मानसिकता का यह ताज़ा उदाहरण है। जिसने किडनी दी, उसे ही बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।उनका यह बयान साफ बताता है कि एनडीए इस विवाद को विपक्ष पर दबाव बनाने के हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहता है।
क्या यह आरजेडी के लिए अस्तित्व संकट है?राजनीतिक गलियारों में यह सवाल ज़ोर से उठ रहा है कि—परिवार की टूटवोट बैंक में बिखराव पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोषऔर संगठनात्मक कमजोरी
क्या मिलकर आरजेडी के लिए अस्तित्व का संकट बन सकते हैं?विशेषज्ञों का बड़ा वर्ग मानता है कि यदि विवाद लंबा चला और तेजस्वी इस संकट को सामूहिक नेतृत्व में बदलने में विफल रहे, तो आरजेडी का पारंपरिक ढाँचा और कमजोर हो सकता है।
लालू की पहली कोशिश: संकट को ‘परिवार तक सीमित’ रखो लालू यादव ने आज भले ही इसे “पारिवारिक मामला” कहकर शांत करने की कोशिश की हो, लेकिन यह विवाद अब—राजनीतिक भावनात्मकऔर रणनीतिक तीनों मोर्चों पर आरजेडी को चुनौती देने लगा है।
आने वाले कुछ हफ्ते यह तय कर देंगे कि—क्या लालू परिवार इस उथल-पुथल को संभाल पाएगा या यह आरजेडी के लिए निर्णायक मोड़ साबित होगा?
