बी के झा
NSK

नई दिल्ली , 8 दिसंबर
लोकसभा का सोमवार का सत्र इतिहास की धाराओं को चीरता हुआ एक नए राजनीतिक मोड़ पर पहुंचा। वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर विशेष चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, पर अब तक का सबसे तीखा प्रहार किया। उनकी 38 मिनट की यह ऐतिहासिक टिप्पणी न केवल सदन में, बल्कि बाहर राजनीतिक गलियारों, बुद्धिजीवी वर्गों और हिंदू संगठनों में भी नई बहस का ज्वार पैदा कर गई।
प्रधानमंत्री की यह घोषणा कि “सरकार वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण को राष्ट्रगान जैसे मानक स्वरूप में लागू करने पर विचार कर रही है”, सत्र के बाद चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बन गई।
विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी आंतरिक बैठक में इसकी पुष्टि की है कि ”इस सत्र में सरकार इसे आगे बढ़ाने का संकेत दे सकती है”।प्रधानमंत्री मोदी के भाषण की 10 बड़ी बातें—
एक नए राजनीतिक विमर्श की प्रस्तावना
1. “वंदे मातरम्…. एक पवित्र युद्धघोष”पीएम मोदी ने शुरुआत में कहा:“वंदे मातरम् केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का मंत्र नहीं था, यह भारत माता को औपनिवेशिक बेड़ियों से मुक्त कराने का पवित्र युद्धघोष था।”
2. “कांग्रेस ने वंदे मातरम् के टुकड़े किए”प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा—“तुष्टीकरण की राजनीति के दबाव में कांग्रेस वंदे मातरम् के बंटवारे के लिए झुक गई। इसलिए एक दिन उसे भारत के बंटवारे के लिए भी झुकना पड़ा।”
3. नेहरू–जिन्ना प्रकरण पर हमलामोदी ने 1936 की घटना का उल्लेख करते हुए कहा—“जिन्ना ने 15 अक्टूबर 1936 को लखनऊ से वंदे मातरम् के खिलाफ नारा बुलंद किया। नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा और उन्होंने वंदे मातरम् की ही जांच शुरू कर दी।”
4. आपातकाल और 100 साल का विडंबनापूर्ण संयोग“जब वंदे मातरम् 100 साल का हुआ, तब देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा था।”
5. “युवा पीढ़ी को असली इतिहास बताना होगा”मोदी बोले—“वंदे मातरम् के साथ दूसरी सदी में अन्याय हुआ। युवाओं तक इसकी सच्चाई पहुंचाई जानी चाहिए।
”6. “कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में घुटने टेके”“वंदे मातरम् काटने का फैसला सद्भाव नहीं, तुष्टीकरण था।
”7. “यह गीत महज़ गीत नहीं, मातृभूमि का मुक्तिसंग्राम था
”8. “अब इसकी महानता पुनर्स्थापित करने का समय है”
9. राष्ट्रगान–स्तर पर वंदे मातरम् की बहाली का संकेतअंदरूनी सूत्रों के अनुसार सरकार इस सत्र में वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण को “औपचारिक राष्ट्रीय महत्व” देने का प्रस्ताव ला सकती है।
10. “यह ऐतिहासिक अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए
राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रियाएँ
1. प्रख्यात राजनीतिक विश्लेषक प्रो. सुशील निगम“मोदी ने आज इतिहास का विमर्श बदलने की कोशिश की है। यह भाषण सिर्फ अतीत का संदर्भ नहीं बल्कि आने वाले वर्षों की सांस्कृतिक नीति का रोडमैप है।
2. वरिष्ठ पत्रकार अरुणेश बरनवाल“यह भाषण सीधे 2026 और 2029 के राजनीतिक संदेशों का आधार बनेगा। कांग्रेस को रक्षात्मक करने की सफल रणनीति है।”
3. दक्षिण भारतीय राजनीति विशेषज्ञ डॉ. पार्वती रमन“यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पुनर्जीवन है। केंद्र वंदे मातरम् को राष्ट्रीय पहचान की धुरी बनाना चाहता है।
हिंदू संगठन और धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया विश्व हिंदू परिषद
“प्रधानमंत्री ने वह कहा जो देश वर्षों से महसूस कर रहा था। वंदे मातरम् भारत की आत्मा है।”आचार्य महेशानंद गिरी (हिंदू धर्म गुरु)“वंदे मातरम् हमारी संस्कृति की ध्वनि है। इसे काटा जाना 20वीं सदी की सबसे बड़ी भूल थी।”राष्ट्रीय संत राघवदास“यदि सरकार पूर्ण संस्करण को अपनाती है, यह सनातन परंपरा की विजय होगी।
कांग्रेस और विपक्ष की प्रतिक्रिया:
असहजता साफ दिखी जयराम रमेश (कांग्रेस)“प्रधानमंत्री इतिहास को तोड़–मरोड़ रहे हैं। नेहरू पर यह हमला राजनीतिक है, तथ्यात्मक नहीं।”
अखिलेश यादव (सपा)“वंदे मातरम् पर बहस ठीक है, पर बेरोज़गारी और महंगाई पर क्यों नहीं?”टीएमसी“यह सांस्कृतिक भावनाओं का चुनावी दोहन है।भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में क्या बदलेगा?
1. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मुख्य धारा में मोदी के भाषण ने संकेत दे दिया है कि अगला दशक इतिहास–विमर्श और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दों पर आधारित रहेगा।
2. वंदे मातरम् राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में ऊंचे दर्जे की ओरयदि सरकार इसे आधिकारिक दर्जा देती है तो यह राष्ट्रगान–राष्ट्रगीत बहस को नए आयाम पर ले जाएगा।
3. कांग्रेस पर दबाव बढ़ेगानेहरू–जिन्ना प्रसंग को बार–बार उठाकर BJP कांग्रेस को रक्षात्मक स्थिति में लाने की रणनीति पर है।
4. विपक्ष धार्मिक–सांस्कृतिक मुद्दों में पिछड़ता दिख रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा 2026 के बंगाल, 2027 के यूपी, और 2029 के लोकसभा चुनाव में अहम भूमिका निभाएगा।
निष्कर्ष:
मोदी ने वंदे मातरम् को केवल गीत नहीं, राजनीतिक–सांस्कृतिक शक्ति बना दिया आज का भाषण केवल राजनीतिक हमला नहीं था। यह एक संस्कृति-अभियान, एक ऐतिहासिक विमर्श, और एक राजनीतिक दिशा का संयोजन था।यदि वंदे मातरम् का पूर्ण संस्करण संसद द्वारा मान्यता पाता है, तो यह आधुनिक भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों में सबसे बड़ा परिवर्तन होगा।
