संपादकीय: होर्मुज का संकट और भारत की ऊर्जा परीक्षा—‘ग्रीन सांवी’ से मिली राहत, लेकिन चुनौती बरकरार

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 4 अप्रैल

मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की अस्थिरता के बीच भारत के लिए एक राहतभरी खबर सामने आई है। 46,000 टन से अधिक एलपीजी लेकर आ रहा विशाल टैंकर ‘ग्रीन सांवी’ भारत की ओर बढ़ रहा है और इसके 6 अप्रैल तक मुंबई पहुंचने की संभावना है। यह केवल एक जहाज का आगमन नहीं, बल्कि उस ऊर्जा संकट के बीच उम्मीद की किरण है, जिससे देश के लाखों परिवार जूझ रहे हैं।हालांकि इससे पहले ‘जग वसंत’ और ‘पाइन गैस’ जैसे जहाज भी सुरक्षित भारत पहुंच चुके हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज—जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है—आज भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र बन चुका है।संकट की गहराई: सिर्फ आपूर्ति नहीं, रणनीति का सवालस्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर दुनिया का लगभग एक-तिहाई तेल और गैस गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा असर भारत जैसे ऊर्जा-निर्भर देशों पर पड़ता है।भारत की रसोई गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है। ऐसे में ‘ग्रीन सांवी’ जैसे जहाजों का सुरक्षित पहुंचना केवल आपूर्ति का मामला नहीं, बल्कि देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है।

नौसेना और कूटनीति की दोहरी भूमिका

भारतीय नौसेना इस संकट में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ‘ग्रीन आशा’ और ‘जग विक्रम’ जैसे जहाज अभी भी सुरक्षित मार्ग की प्रतीक्षा में हैं। नौसेना चरणबद्ध तरीके से इन जहाजों को सुरक्षित निकालने की रणनीति पर काम कर रही है।साथ ही भारत सरकार ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत भी जारी रखे हुए है, ताकि इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को खुला रखा जा सके।यह स्पष्ट संकेत है कि आज के दौर में केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि संतुलित कूटनीति भी उतनी ही आवश्यक है।

अभी भी फंसे हैं जहाज, जारी है चिंता

ताजा आंकड़ों के अनुसार, फारस की खाड़ी में अभी भी 17 भारतीय जहाज फंसे हुए हैं। इसके अलावा ओमान की खाड़ी, अदन की खाड़ी और लाल सागर में भी भारतीय जहाज मौजूद हैं।करीब 20,500 भारतीय नाविक इस पूरे क्षेत्र में तैनात हैं, जिनकी सुरक्षा सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता बन चुकी है। अब तक 1,100 से अधिक नाविकों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, लेकिन खतरा अभी भी बना हुआ है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया: सरकार बनाम विपक्ष

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इसे “सरकार की सक्रिय कूटनीति और मजबूत नौसेना” का परिणाम बताते हुए कहा है कि भारत ने संकट की घड़ी में अपनी क्षमता साबित की है।वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सरकार से सवाल किया है कि देश की ऊर्जा निर्भरता को कम करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति क्यों नहीं बनाई गई। उनका कहना है कि हर बार अंतरराष्ट्रीय संकट के समय भारत को अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।

विशेषज्ञों की राय: चेतावनी और अवसर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संकट भारत के लिए “वेक-अप कॉल” है। ऊर्जा सुरक्षा केवल आयात बढ़ाने से नहीं, बल्कि विविध स्रोतों और वैकल्पिक ऊर्जा के विकास से सुनिश्चित की जा सकती है।

शिक्षाविदों का कहना है कि भारत को नवीकरणीय ऊर्जा, गैस भंडारण और घरेलू उत्पादन पर अधिक ध्यान देना होगा, ताकि भविष्य में इस प्रकार के संकट का प्रभाव कम किया जा सके।

कानूनविदों के अनुसार,

अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों की सुरक्षा और स्वतंत्रता सुनिश्चित करना वैश्विक कानून का हिस्सा है, और भारत को इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

निष्कर्ष:

राहत के साथ चेतावनी

‘ग्रीन सांवी’ का भारत पहुंचना निश्चित रूप से राहत की खबर है, लेकिन यह केवल अस्थायी समाधान है। असली चुनौती है—भारत की ऊर्जा सुरक्षा को दीर्घकालिक और स्थायी बनाना।होर्मुज का संकट हमें यह सिखाता है कि वैश्विक राजनीति का असर सीधे आम आदमी की रसोई तक पहुंचता है।अब समय आ गया है कि भारत इस चुनौती को अवसर में बदले—

और आत्मनिर्भर, सुरक्षित और स्थिर ऊर्जा भविष्य की दिशा में ठोस कदम उठाए।

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