सिंध पर राजनाथ सिंह के बयान से घबराया पाकिस्तान, भारत से ‘संयम’ की गुहार—दिल्ली से कराची तक सियासी हलचल तेज

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/इस्लामाबाद, 24 नवंबर

भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा सिंध के भारत से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों पर दिए गए बयान ने पाकिस्तान की सत्ता गलियारों में तूफान खड़ा कर दिया है। रविवार को सिंधी समाज के एक कार्यक्रम में राजनाथ सिंह ने कहा था कि “सीमाएँ स्थायी नहीं होतीं… और सिंध भले आज भारत का हिस्सा न हो, किंतु सभ्यतागत रूप से वह भारत का अभिन्न अंग है।”राजनाथ सिंह के इस वक्तव्य के बाद पाकिस्तान सरकार तुरंत हरकत में आ गई और आधिकारिक बयान जारी करते हुए इसे “संप्रभुता का उल्लंघन” तथा “हिंदुत्व विस्तारवाद का प्रमाण” बताया। पाकिस्तान का तीखा बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत के प्रति उसकी असुरक्षा आज भी उतनी ही गहरी है जितनी 1947 में थी।

राजनाथ सिंह ने क्या कहा था?—‘बॉर्डर बदले हैं, आगे भी बदल सकते हैं’सिंधी समाज के कार्यक्रम में बोलते हुए रक्षा मंत्री ने सिंध की सांस्कृतिक विरासत और भारत से उसके हजारों वर्षों के जुड़ाव को याद किया। उन्होंने कहा—“जमीनें कभी स्थायी रूप से बंटी नहीं रहतीं। बॉर्डर इतिहास में कई बार बदले हैं, आगे भी बदल सकते हैं। सिंध आज भौगोलिक रूप से भले भारत का हिस्सा नहीं है, लेकिन हमारी संस्कृति में वह सदैव मौजूद है।”उनके इस बयान को जनता से जोरदार समर्थन मिला और सिंधी समाज ने इसे उनके प्रति सम्मान के रूप में देखा।

पाकिस्तान बौखलाया—‘अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन’, ‘हिंदुत्व का विस्तारवाद’भारत में दिए गए इस भाषण के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने रातोंरात प्रेस रिलीज जारी कर कहा—“राजनाथ सिंह का बयान विस्तारवादी हिंदुत्व को दर्शाता है।”“यह अंतरराष्ट्रीय कानून और मान्यता प्राप्त सीमाओं की अखंडता का उल्लंघन है।”

“भारतीय नेता भड़काऊ बयानबाजी से बचें, वरना क्षेत्रीय शांति खतरे में पड़ सकती है।

”विशेषज्ञों का मत है कि पाकिस्तान की त्वरित प्रतिक्रिया से साफ़ जाहिर है कि वहाँ का सैन्य-राजनीतिक तंत्र सिंध में बढ़ती असंतोष की लहर से पहले ही डरा हुआ है—और भारत में सिंधी समाज से जुड़े बयान को वह राजनीतिक खतरे की तरह देख रहा है।

भारतीय विश्लेषकों की प्रतिक्रिया—‘सिंध का डर पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरी दिखाता है’भारत के सुरक्षा विशेषज्ञों ने पाकिस्तान की प्रतिक्रिया को “अतिरिक्त डर और असुरक्षा” बताया। उनका कहना है—पाकिस्तान सिंध प्रांत में बढ़ती सरकार-विरोधी गतिविधियों को लेकर पहले से बेचैन है।बलूचिस्तान की तरह, सिंध में भी अलगाववादी भावनाएँ समय–समय पर उठती रही हैं।ऐसे में भारत के किसी भी ऐतिहासिक संदर्भ को पाकिस्तान राजनीतिक खतरे की तरह देखता है।

कुछ विश्लेषकों ने यह भी कहा कि—“भारत ने कोई सैन्य या राजनीतिक दावा नहीं किया। बयान सांस्कृतिक संदर्भों में था। पाकिस्तान की प्रतिक्रिया उसके भीतर चल रही राजनीतिक घबराहट का परिणाम है।”

सियासी गलियारों में नई बहस—क्या भारत की विदेश–सुरक्षा नीति हो रही है assertive?

राजनाथ सिंह के बयान को विशेषज्ञ भारत की बदलती कूटनीति का संकेत मानते हैं। पिछले दस वर्षों में भारत ने—PoK,गिलगित-बाल्टिस्तान,बांग्लादेश सीमा,और अब सिंध—इन मुद्दों को लेकर एक मजबूत और आत्मविश्वासी रुख अपनाया है।यह संदेश पाकिस्तान के साथ-साथ वैश्विक मंचों पर भी गया है कि भारत अब सिर्फ रक्षा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भू-राजनीतिक दायित्वों की बात भी खुलकर करता है।

निष्कर्ष—

एक बयान जिसने खोल दी पाकिस्तान की घबराहट

राजनाथ सिंह की टिप्पणी मूल रूप से सांस्कृतिक जुड़ाव और सिंधी समाज के सम्मान से जुड़ी थी, लेकिन पाकिस्तान ने इसे रणनीतिक खतरे के रूप में लिया।विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की यह बेचैनी उसके भीतर की राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक कंगाली और सिंध—बलूचिस्तान—खैबर पख्तूनख्वा में उठते जनविद्रोह के कारण है।भारत के लिए यह बयान सांस्कृतिक इतिहास की पुनर्स्मृति था,लेकिन पाकिस्तान के लिए यह असुरक्षा, घबराहट और आंतरिक कमजोरी का आईना साबित हुआ है।

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