हमारे धैर्य का इम्तिहान न लें मंदिर–दरगाह विवाद पर मद्रास हाई कोर्ट की सख्ती, संसद से सुप्रीम कोर्ट तक बढ़ा तनाव, कानूनविद बोले—न्यायपालिका को निशाना बनाना खतरनाक ट्रेंड; राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा—तमिलनाडु में ‘धर्म बनाम सत्ता’ की नई जंग शुरू

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/चेन्नैई , 5 दिसंबर

तमिलनाडु के तिरुपरमकुंद्रम स्थित सुब्रमणिय स्वामी मंदिर और उसके समीप की दरगाह को लेकर उठा विवाद अब सामान्य धार्मिक मुद्दे से निकलकर राजनीति, न्यायपालिका और प्रशासन — तीनों का बड़ा टकराव बन चुका है।जहाँ सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है, वहीं संसद में टी. आर. बालू की टिप्पणी ने कोर्ट बनाम पॉलिटिक्स के टकराव को और तेज कर दिया।

मद्रास हाई कोर्ट ने इसे बेहद गंभीरता से लिया और शुक्रवार को बेंच ने कड़े शब्दों में कहा—“हम कुछ हद तक ही बर्दाश्त कर सकते हैं… हमारे धैर्य का इम्तिहान न लें।”संसद से लेकर अदालत तक—मामला क्यों भड़का?लोकसभा में द्रमुक नेता टी. आर. बालू ने मद्रास हाई कोर्ट के एक जज पर टिप्पणी करते हुए कहा कि “एक दल सांप्रदायिक तनाव पैदा कर रहा है”। उन्होंने जज को एक खास संगठन से जोड़ते हुए संकेत दिए।बस फिर क्या था—सदन में हंगामा,विपक्ष और सत्ता पक्ष आमने-सामने,और अगले ही दिन हाई कोर्ट ने इस टिप्पणी को न्यायपालिका पर हमला मानते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी। हाई कोर्ट की चेतावनी:“जज रिएक्ट नहीं कर सकते, इसका मतलब यह नहीं कि आप उनके खिलाफ ज़हर फैलाएँ”

जस्टिस जी जयचंद्रन और जस्टिस केके रामकृष्णन की बेंच ने बेहद तल्ख शब्दों में कहा—“लोग सोचते हैं कि कोर्ट जवाब नहीं देता, इसलिए जो चाहें बोल देते हैं।”“ज्यूडिशियरी को नीचा न दिखाएँ… If limits are crossed, strict action will follow.”“हमारे धैर्य का इम्तिहान न लें।”एडवोकेट एम. आर. वेंकटेश ने कोर्ट को बताया कि सिंगल जज जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन पर जाति आधारित निजी हमले किए जा रहे हैं। यह सुनकर बेंच खास तौर पर भड़क गई।

मामला क्या है?

मंदिर में ‘कार्तिगई दीपम’ बनाम दरगाह की संवेदनशीलता

1 दिसंबर को सिंगल जज ने आदेश दिया था कि:श्रद्धालुओं को दीपथून पर भी कार्तिगई दीपम जलाने दिया जाए।इससे “निकटवर्ती दरगाह के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।”जब सरकार ने आदेश लागू नहीं किया, तो 3 दिसंबर को जज ने श्रद्धालुओं को स्वयं दीप जलाने की अनुमति दी और CISF को सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा।राज्य सरकार ने इसे संवेदनशील मुद्दा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

राजनेताओं की प्रतिक्रिया:‘धार्मिक नहीं, राजनीतिक विवाद को हवा दी जा रही है’

DJP (DMK)“हम कानून का सम्मान करते हैं, लेकिन कुछ निर्णयों के पीछे राजनीतिक विचारधारा साफ दिखती है।

”BJP“

DMK अदालत पर हमला कर रही है। मंदिरों से जुड़े निर्णयों को समुदायों के बीच टकराव बताना गलत।”AIADMK“यह सब DMK की बदइंतजामी का नतीजा है। धार्मिक मामलों में सरकार की अस्पष्टता से ही विवाद पैदा हुआ।”

कानूनविद क्या कहते हैं?

न्यायपालिका पर हमले को बताया ‘रेड लाइन’

वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी दुबे“जजों पर निजी हमले न्यायपालिका के अस्तित्व पर हमला हैं। यह बेहद खतरनाक परंपरा है, इसे तुरंत रोकना होगा।”पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू“जहाँ राजनीति अदालतों को घसीटने लगे, वहाँ लोकतंत्र कमजोर होता है। तमिलनाडु इस समय बेहद संवेदनशील मोड़ पर है।”संवैधानिक विशेषज्ञ गौतम भट्टाचार्य“एक जज के आदेश की आलोचना तो हो सकती है, लेकिन उन्हें किसी संगठन, जाति या विचारधारा से जोड़ना बिल्कुल अवैधानिक है।”

राजनीतिक विश्लेषकों की राय:यह सिर्फ ‘दीप जलाने’ का मामला नहीं, एक बड़ी वैचारिक लड़ाई है

राजनीतिक विश्लेषक प्रभु चंद्रशेखरन (चेन्नै):“DMK की राजनीति द्रविड़ विचारधारा पर खड़ी है। मंदिरों से जुड़े मुद्दों में हाई कोर्ट की सक्रियता को वह राजनीतिक चुनौती के रूप में देख रही है।”वरिष्ठ पत्रकार नूपुर शर्मा:“यह विवाद तमिलनाडु में ‘हिंदू मंदिर बनाम वक्फ’ के पुराने तनाव को फिर जीवित कर रहा है। सरकार को संतुलित भूमिका निभानी होगी।”कॉलमिस्ट विनोद मेहता:“हाई कोर्ट की सख्ती संकेत देती है कि न्यायपालिका अब अपनी गरिमा पर हमले को बर्दाश्त नहीं करेगी। संसद में बयानबाज़ी ने स्थिति और बिगाड़ी है।”

निष्कर्ष—

यह विवाद अब सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि संवैधानिक, राजनीतिक और न्यायिक मर्यादा का सवाल है**मंदिर–दरगाह विवादअदालत के आदेशसंसद की बयानबाज़ीजजों पर व्यक्तिगत हमलेराज्य सरकार और केंद्र के बीच अप्रत्यक्ष तनाव—इन सबने मिलकर इस केस को तमिलनाडु की सबसे बड़ी संवेदनशील फाइल बना दिया है।और जैसा कि हाई कोर्ट ने कहा—“ज्यूडिशियरी के सब्र को टेस्ट मत कीजिए… वरना कार्रवाई तय है।

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