बी के झा
नई दिल्ली, 17 नवंबर तेलंगाना की राजनीति और न्यायपालिका के बीच तीखा टकराव सामने तब आया, जब देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई ने राज्य विधानसभा अध्यक्ष पर दलबदल संबंधी अयोग्यता याचिकाओं में अत्यधिक देरी पर गहरी नाराज़गी जताते हुए तीखी चेतावनी दी।
यह मामला उन 10 विधायकों से जुड़ा है जिन्होंने BRS के टिकट पर चुनाव जीता, लेकिन बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए।सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने पूरे राजनीतिक गलियारे में हलचल मचा दी है—
“या तो अगले हफ्ते तक फैसला सुनाइए, या अवमानना की सजा भुगतने के लिए तैयार रहिए। यह उन्हें तय करना है कि वे अपना नया साल कहाँ मनाना चाहते हैं।”
CJI की कड़ी भाषा—‘यह न्यायालय की घोर अवमानना’CJI गवई की अध्यक्षता वाली पीठ (जस्टिस विनोद चंद्रन और जस्टिस एन.वी. अंजारिया) ने सुनवाई के दौरान कहा:“तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष के आचरण से यह स्पष्ट है कि न्यायालय के आदेश की घोर अवमानना की गई है।”सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अवमानना नोटिस जारी कर दिया।
हालाँकि पीठ ने फिलहाल स्पीकर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट दी है।ध्यान देने वाली बात यह है कि 31 जुलाई 2025 को ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर को 3 महीने की सख्त समयसीमा दी थी—
जिसका पालन नहीं हुआ।आठ सप्ताह का और समय मांगते ही कोर्ट सख़्त हुआ विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय ने एक अलग याचिका के जरिए और आठ सप्ताह का समय माँगा।वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट से गुहार लगाई कि चार याचिकाओं की सुनवाई पूरी हो चुकी है, तीन मामलों में साक्ष्य दर्ज हो गए हैं,और प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
लेकिन कोर्ट का रुख बेहद कठोर रहा
।CJI ने कहा—“यह पूरा हो जाना चाहिए था। यह अस्वीकार्य देरी है…
और स्पष्ट अवमानना भी।”सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश—स्पीकर न्यायाधिकरण हैं, कोई ‘संवैधानिक छूट’ नहींकोर्ट ने दोहराया कि—
संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल कानून) के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर सुनवाई करते समय स्पीकर न्यायाधिकरण (Tribunal) के रूप में कार्य करते हैं।
इसलिए—उन्हें ‘संवैधानिक छूट’ नहीं मिल सकती,न ही वे न्यायालय के आदेशों की अनदेखी कर सकते हैं,और न ही देरी का बहाना बना सकते हैं।सुप्रीम कोर्ट की यह व्याख्या देश में दलबदल मामलों पर कामकाज की संवैधानिक सीमाओं को दोबारा रेखांकित करती है।BRS नेताओं की याचिका से शुरू हुआ विवाद
यह मामला तब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जब BRS नेताकेटी रामाराव,पाडी कौशिक रेड्डी,केओ विवेकानंदने दलबदल करने वाले 10 विधायकों पर कार्रवाई की मांग की।31 जुलाई के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने समयसीमा तय की थी।लेकिन पाँच महीने बाद भी कोई निर्णय न आने पर अवमानना याचिका दायर की गई।स्पीकर पर राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक ढिलाई?
न्यायपालिका की सख्त टिप्पणी से कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े होते हैं—
क्या स्पीकर राजनीतिक दबाव में फैसला टाल रहे थे?क्या दलबदल मामलों में ‘समय खरीदने’ की रणनीति अपनाई जा रही थी?या यह केवल प्रशासनिक ढिलाई का मामला है?इन सवालों के जवाब से ही तय होगा कि इस विवाद का असर सिर्फ तेलंगाना तक सीमित रहेगा या देशभर में दलबदल मामलों के लिए एक नया मिसाल बनकर उभरेगा।राहत की एक उम्मीद—4 हफ्ते की अंतिम मोहलतमुकुल रोहतगी ने आश्वासन दिया—
“मैं स्वयं स्पीकर कार्यालय को सुप्रीम कोर्ट की भावना से अवगत कराऊँगा। हमें उम्मीद है, निर्णय निर्धारित समय में आ जाएगा।”इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय कर दी है।
निष्कर्ष
CJI गवई की तीखी चेतावनी केवल एक राज्य के स्पीकर के लिए संदेश नहीं, बल्कि पूरे देश की विधायिकाओं को सख्त संकेत है कि दलबदल कानून पर फैसला टालने का दौर अब नहीं चलेगा।तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष के सामने अब दो ही रास्ते हैं—
या तो समय पर फैसला दें,या फिर सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना का सामना करें।आने वाले हफ्ते भारतीय राजनीति और संवैधानिक अनुशासन—
दोनों के लिए निर्णायक होने वाले हैं।
NSK

