बी. के. झा
NSK

सोनभद्र / नई दिल्ली, 28 अक्टूबर
भक्ति जब कर्म का रूप ले ले, तो चमत्कार घटित होते हैं — और यही कर दिखाया है सोनभद्र के नगवां ब्लॉक के चकयां गांव के रहने वाले इंद्रबहादुर ने।जहां न नदी थी, न तालाब, केवल आस्था की प्यास थी — वहीं एक व्यक्ति ने अपनी हिम्मत और श्रम से 40 फीट लंबा, 40 फीट चौड़ा और 5 फीट गहरा तालाब खुद अपने दम पर खोद डाला।
छठ” की आस्था बनी प्रेरणाचकयां गांव में करीब दो हजार की आबादी है, पर छठ पूजा के लिए कोई घाट नहीं था। हर साल गांव की महिलाएं दो किलोमीटर दूर कर्मनाशा नदी तक अर्घ्य देने जाती थीं — मगर नदी में मगरमच्छों और विषैले जीवों का भय हर बार उन्हें डराता था।इंद्रबहादुर कहते हैं —मैंने देखा कि माताएं-बहनें छठ पर कितनी कठिनाइयों में पूजा करती हैं। तभी मन में ठान लिया कि अबकी बार अर्घ्य हमारे अपने गांव में ही होगा।”
पाँच महीने की तपस्यामई 2025 से उन्होंने फावड़ा और कुदाल लेकर काम शुरू किया। कोई मजदूर नहीं, कोई मशीन नहीं — बस उनका संकल्प और आस्था।दिन में आठ से बारह घंटे तक मिट्टी खोदते रहे। रात में भी जब नींद खुलती, तो फिर तालाब की ओर निकल पड़ते। धीरे-धीरे मिट्टी के टीले में आकार लेने लगा उनका सपना — और पांच महीनों में वह सपना जीवंत तालाब बन गया।तालाब में बोरिंग से पानी की स्थायी व्यवस्था कर दी गई है। अब गांव की महिलाएं इस छठ पर पहली बार अस्ताचल और उदयाचल सूर्य को अर्घ्य इसी नव निर्मित तालाब से देंगी।
गांव ने कहा — “सोनभद्र का मांझी”इंद्रबहादुर के इस अद्भुत कार्य ने पूरे गांव को भावविभोर कर दिया।गांव वालों ने कहा —इंद्रबहादुर ने जो कर दिखाया, वह ‘मांझी’ फिल्म के नायक जैसा प्रेरणादायी काम है। उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया है।”
ब्लॉक प्रमुख ने किया सम्मानितउनके इस समर्पण से प्रभावित होकर नगवां ब्लॉक प्रमुख आलोक सिंह ने उन्हें सम्मानित किया। उन्होंने कहा —इंद्रबहादुर ने साबित किया है कि सच्चे मन से ठान लिया जाए, तो कोई काम नामुमकिन नहीं होता। यह मिसाल पूरे जिले के लिए प्रेरणा है।
निष्ठा की मिसालआज वह तालाब सिर्फ मिट्टी का गड्ढा नहीं, बल्कि भक्ति, श्रम और समर्पण की मूर्ति बन चुका है।गांव की महिलाएं अब गर्व से कहती हैं —अब हमें नदी तक नहीं जाना पड़ेगा। हमारे गांव का अपना घाट, अपने इंद्रभैया ने बना दिया है।
इस छठ पर्व पर जब पहली बार गांव की सूर्यमुखी नारियाँ इस नव-निर्मित तालाब में अर्घ्य देंगी — तब हर लहर, हर जलकण इंद्रबहादुर के उस श्रम, उस आस्था और उस संकल्प को प्रणाम करेगा जिसने ‘भक्ति’ को ‘परिश्रम’ से जोड़ दिया।
