बी के झा
NSK

Kochi/नई दिल्ली, 7 मार्च
मध्य पूर्व में तेज होते अमेरिका-ईरान टकराव के बीच भारत ने एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और मानवीय कदम उठाते हुए ईरानी युद्धपोत को अपने दक्षिणी नौसैनिक अड्डे पर शरण देने की अनुमति दी है। बताया गया है कि तेहरान की विशेष अपील के बाद भारत ने यह निर्णय लिया, जिसके तहत ईरान का युद्धपोत IRIS Lavan कोच्चि बंदरगाह पर लंगर डाले हुए है और उसके 183 सदस्यीय चालक दल को भारतीय नौसेना की सुविधाओं में अस्थायी ठहराव दिया गया है।यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब हाल ही में Sri Lanka के तट के पास अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा ईरान के एक फ्रिगेट IRIS Dena को टॉरपीडो से निशाना बनाए जाने की खबरों ने हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। इस हमले में लगभग 87 ईरानी नाविकों की मौत की बात कही जा रही है।
कैसे कोच्चि पहुंचा ईरानी युद्धपोत
सूत्रों के अनुसार, IRIS Lavan पिछले महीने भारत द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक आयोजन International Fleet Review में हिस्सा लेने के लिए हिंद महासागर क्षेत्र में आया था।बताया गया कि जहाज में तकनीकी खराबी आने के बाद Iran ने भारत से आपातकालीन सहायता की अपील की।एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार—“ईरानी पक्ष ने 28 फरवरी को भारत से संपर्क कर जहाज को सुरक्षित बंदरगाह में प्रवेश देने का अनुरोध किया था। आवश्यक प्रक्रियाओं के बाद 1 मार्च को अनुमति दी गई और 4 मार्च को युद्धपोत कोच्चि पहुंच गया।”जहाज के 183 चालक दल के सदस्यों को फिलहाल भारतीय नौसेना की सुविधाओं में रखा गया है और तकनीकी निरीक्षण भी किया जा रहा है।
श्रीलंका ने भी दिया एक ईरानी जहाज को आश्रय
इसी बीच Sri Lanka ने भी ईरान के एक अन्य युद्धपोत IRIS Bushehr को अपने बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति दी है।बताया गया कि इस जहाज में इंजन की खराबी आ गई थी, जिसके बाद उसने आपातकालीन प्रवेश की अनुमति मांगी। जहाज के 208 सदस्यीय चालक दल को श्रीलंकाई नौसैनिक शिविर में अस्थायी तौर पर ठहराया गया है।दोनों जहाज हाल ही में भारत की अंतरराष्ट्रीय बेड़ा समीक्षा में शामिल हुए थे।
हिंद महासागर में बढ़ता तनाव
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार ईरानी फ्रिगेट IRIS Dena के डूबने की घटना के बाद पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक हलचल तेज हो गई है।रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका-ईरान तनाव का प्रभाव अब मध्य पूर्व से निकलकर समुद्री व्यापार मार्गों तक पहुंचने लगा है।एक पूर्व नौसैनिक अधिकारी ने कहा—“हिंद महासागर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यदि अमेरिका-ईरान टकराव यहां तक फैलता है तो वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।”
भारत की ‘संतुलित कूटनीति’
विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि भारत का यह कदम पूरी तरह मानवीय और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के अनुरूप है।अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों के अनुसार समुद्री आपात स्थिति में किसी जहाज को सुरक्षित बंदरगाह देना अंतरराष्ट्रीय समुद्री प्रथाओं का हिस्सा है।एक वरिष्ठ कानूनविद का कहना है—“यदि किसी जहाज में तकनीकी खराबी हो या चालक दल की सुरक्षा खतरे में हो, तो किसी भी तटीय देश को उसे अस्थायी शरण देने का अधिकार और दायित्व दोनों होता है। भारत ने इसी सिद्धांत का पालन किया है।”
राजनीतिक हलकों में भी चर्चा
इस फैसले पर देश के राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है। विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने सरकार के कदम को “मानवीय और व्यावहारिक” बताया, जबकि कुछ ने सावधानी बरतने की सलाह दी है।एक विपक्षी नेता ने कहा—“भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए। मानवीय आधार पर सहायता देना उचित है, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि देश किसी बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष में अनावश्यक रूप से न उलझे।”
रणनीतिक संदेश भी छिपा?
कुछ रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम के पीछे एक व्यापक रणनीतिक संदेश भी हो सकता है।भारत लंबे समय से रणनीतिक संतुलन की नीति पर चलता आया है—जहां एक ओर उसके अमेरिका के साथ मजबूत संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा और क्षेत्रीय सहयोग के महत्वपूर्ण हित भी जुड़े हैं।एक सुरक्षा विशेषज्ञ के अनुसार—“भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत है—राष्ट्रीय हित सर्वोपरि। इस फैसले से भारत ने यह संदेश दिया है कि वह मानवीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करता है, लेकिन किसी भी सैन्य ध्रुवीकरण का हिस्सा नहीं बनना चाहता।”
समुद्री व्यापार पर मंडरा रहा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका-ईरान टकराव बढ़ता है तो इसका असर हिंद महासागर के व्यापारिक मार्गों पर भी पड़ सकता है।भारत, श्रीलंका और अन्य तटीय देशों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है क्योंकि यही समुद्री मार्ग तेल और वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा माने जाते हैं।
आगे क्या?
फिलहाल भारतीय नौसेना और संबंधित एजेंसियां ईरानी जहाज की तकनीकी जांच कर रही हैं। स्थिति सामान्य होने पर जहाज को आगे की यात्रा की अनुमति दी जा सकती है।लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव अब वैश्विक समुद्री सुरक्षा और कूटनीति को भी प्रभावित करने लगा है—
और भारत जैसे क्षेत्रीय शक्ति केंद्रों को हर कदम बेहद संतुलन और दूरदर्शिता के साथ उठाना पड़ रहा है।
