बी के झा
ढाका / वॉशिंगटन / नई दिल्ली, 23 दिसंबर
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार प्रो. मोहम्मद यूनुस इस समय अपने जीवन के सबसे कठिन राजनीतिक दौर से गुजर रहे हैं। जिस बांग्लादेश को “लोकतांत्रिक संक्रमण” की प्रयोगशाला बताया जा रहा था, वह आज हिंसा, अराजकता और सत्ता-संघर्ष की आग में झुलस रहा है।हिंसा की इस पृष्ठभूमि में यूनुस का अचानक अमेरिका की शरण में जाना, और दक्षिण व मध्य एशिया के लिए अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर को फोन कर समय पर चुनाव कराने का आश्वासन देना—सिर्फ एक कूटनीतिक बातचीत नहीं, बल्कि वैश्विक दबाव, सत्ता की असुरक्षा और अमेरिकी रणनीतिक हितों का संकेत माना जा रहा है।
जलता बांग्लादेश:
नोबेल शांति से रक्तरंजित सड़कों तकबीते महीनों में बांग्लादेश में जो हुआ, उसने दुनिया को चौंका दिया—हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा हत्या छात्र आंदोलन के प्रतीक शरीफ उस्मान हादी की रहस्यमयी मौत मीडिया हाउसों पर हमले भारतीय उच्चायोग और राजनयिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना अल्पसंख्यकों पर हमले और खुलेआम इस्लामी कट्टरपंथ का उभार
राजनीतिक विश्लेषकों के शब्दों में—“बांग्लादेश अब यूनुस के नियंत्रण में नहीं, बल्कि सड़कों की राजनीति और छाया शक्तियों के हाथ में चला गया है।”अमेरिका को फोन क्यों? यूनुस की मजबूरी क्या है सोमवार को मोहम्मद यूनुस ने अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर से लगभग आधे घंटे तक बातचीत की। इस दौरान उन्होंने तीन अहम बातें कहीं—12 फरवरी को आम चुनाव तय समय पर होंगे चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण होंगे हिंसा के पीछे “अपदस्थ शासन” और फरार नेतृत्व की साजिश है
राजनीतिक शिक्षाविद मानते हैं कि यह कॉलआत्मविश्वास नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वैधता बचाने की कोशिश है।एक वरिष्ठ प्रोफेसर कहते हैं—“जब किसी देश का अंतरिम नेतृत्व चुनाव की तारीख खुद घोषित न कर पाए और अमेरिका को आश्वासन दे, तो यह संप्रभुता का नहीं, निर्भरता का संकेत होता है।”
अमेरिका की भूमिका: लोकतंत्र या रणनीति?
यह तथ्य अब छिपा नहीं है कि शेख हसीना सरकार के पतन में अमेरिका की भूमिका को लेकर ढाका से दिल्ली तक सवाल उठे हैं।
यूनुस का सत्ता में आना—अमेरिकी समर्थन पश्चिमी NGO नेटवर्कऔर “लोकतांत्रिक सुधार” के नैरेटिव से जुड़ा माना जाता है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है—“अमेरिका के लिए यूनुस कोई नैतिक परियोजना नहीं, बल्कि एक रणनीतिक मोहरा हैं।”अमेरिका बांग्लादेश को क्यों नहीं खो सकता?
चीन को रोकने की रणनीतिबांग्लादेश, चीन की BRI परियोजनाओं का अहम हिस्सा है। राजनीतिक अस्थिरता में चीन निवेश और प्रभाव बढ़ा सकता है—जो अमेरिका के लिए खतरा है।
इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी बंगाल की खाड़ी वैश्विक समुद्री व्यापार की धुरी है। यहां अस्थिरता अमेरिका की नौसैनिक और व्यापारिक रणनीति को कमजोर करती है।
इस्लामी कट्टरपंथजमात-ए-इस्लामी और अन्य कट्टरपंथी समूहों का उभारअमेरिका के काउंटर-टेररिज्म हितों के खिलाफ है।
भारत फैक्टर भारत अमेरिका का प्रमुख इंडो-पैसिफिक साझेदार है।बांग्लादेश की अराजकता भारत की सुरक्षा को प्रभावित करती है, जिससे अमेरिकी रणनीति को अप्रत्यक्ष नुकसान होता है।टैरिफ में राहत: इनाम या दबाव?
सर्जियो गोर ने यूनुस की तारीफ करते हुए बताया किअमेरिका ने बांग्लादेशी उत्पादों पर टैरिफ घटाकर 20% कर दिया है।आर्थिक विश्लेषकों का कहना है—
“यह राहत नहीं, बल्कि राजनीतिक निवेश है—ताकि यूनुस ट्रैक पर बने रहें।”भारत की चिंता: पड़ोस में अस्थिरता भारत सरकार के रणनीतिक हलकों में यह चिंता गहरी है कि—बांग्लादेश में हिंसा भारत तक फैल सकती है अल्पसंख्यकों पर हमले क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाएंगे कट्टरपंथी गुट सीमापार सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैंभारत सरकार का रुख फिलहाल संयमित लेकिन सतर्क है।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया विपक्षी दलों का कहना है—“बांग्लादेश की स्थिति केवल विदेश नीति का सवाल नहीं, बल्कि मानवाधिकार और क्षेत्रीय शांति का मुद्दा है।”कुछ दलों ने अमेरिका की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि“लोकतंत्र के नाम पर सत्ता परिवर्तन करवाना, फिर अराजकता से पल्ला झाड़ लेना—
यह दोहरा मापदंड है।”
निष्कर्ष:
चुनाव होंगे, पर क्या शांति भी आएगी?
मोहम्मद यूनुस ने अमेरिका को चुनाव का भरोसा दे दिया है,लेकिन बड़ा सवाल यह है—क्या चुनाव हिंसा के बीच संभव हैं?क्या अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी?क्या बांग्लादेश अमेरिकी रणनीति और आंतरिक सच्चाई के बीच पिसता रहेगा?राजनीतिक विश्लेषक साफ कहते हैं—“अगर अमेरिका ने बांग्लादेश को सिर्फ ‘चीन-काउंटर’ के चश्मे से देखा, तो लोकतंत्र नहीं, अराजकता ही उपजेगी।”बांग्लादेश आज सिर्फ एक देश नहीं,दक्षिण एशिया की स्थिरता की परीक्षा बन चुका है।
NSK


