बी के झा
NSK



गुवाहाटी/नई दिल्ली, 4 जनवरी
असम विधानसभा चुनाव से ठीक चार महीने पहले मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा 37 लाख महिला लाभार्थियों को 8,000 रुपये की एकमुश्त नकद सहायता देने की घोषणा ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। ‘अरुणोदय योजना’ के तहत इसे बोहाग बिहू उपहार का नाम दिया गया है, लेकिन विपक्ष इसे खुले तौर पर चुनावी प्रलोभन करार दे रहा है।यह केवल एक वित्तीय घोषणा नहीं, बल्कि महिला मतदाताओं को केंद्र में रखकर रची गई एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति मानी जा रही है—जिसका असर न केवल असम बल्कि पूरे पूर्वोत्तर की चुनावी राजनीति पर पड़ सकता है।‘
असम मॉडल’ बनाम ‘रेवड़ी संस्कृति’
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पहले ही दावा कर चुके हैं कि बिहार में एनडीए की जीत में महिला-केंद्रित योजनाओं का अहम योगदान रहा, जो असम के ‘लखपति बाइदेओ’ मॉडल से प्रेरित थीं। अब उसी मॉडल को असम में और आक्रामक रूप से लागू किया जा रहा है।सीएम सरमा का तर्क है—“चुनाव के समय अरुणोदय योजना को लेकर विवाद होता है, इसलिए हमने तय किया कि जनवरी से अप्रैल तक का पैसा एक साथ देकर महिलाओं को त्योहार का सम्मानजनक उपहार दिया जाए।”सरकार के अनुसार यह एडवांस भुगतान है, न कि कोई अतिरिक्त चुनावी सौगात।
राजनीतिक विश्लेषण: क्या नकद ट्रांसफ़र चुनाव जिताता है?
डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर कौस्तुभ डेका मानते हैं कि—“डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफ़र (DBT) से मतदाता और सरकार के बीच सीधा भावनात्मक रिश्ता बनता है। यह बीजेपी की सबसे बड़ी चुनावी ताक़त बन चुकी है। लेकिन असम में पहचान, बेरोज़गारी, भूमि अधिकार और जातीय असंतोष जैसे मुद्दे भी उतने ही गहरे हैं।”वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह योजना महिला मतदाताओं को ‘साइलेंट वोट बैंक’ से ‘निर्णायक शक्ति’ में बदलने की कोशिश है।
शिक्षाविदों की राय: राहत बनाम स्थायित्व
गुवाहाटी विश्वविद्यालय की समाजशास्त्री प्रो. अनीता बरुआ कहती हैं—“नकद सहायता तत्काल राहत देती है, लेकिन इससे महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता स्थायी नहीं बनती। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार से जोड़ने वाली योजनाएँ अधिक टिकाऊ समाधान हैं।”
विपक्ष का तीखा हमला
कांग्रेस, एआईयूडीएफ और वाम दलों ने इसे चुनावी लालच बताया है।असम महिला कांग्रेस अध्यक्ष मीरा बोरठाकुर गोस्वामी का कहना है—“स्कूल बंद हो रहे हैं, बेरोज़गारी बढ़ रही है और महिलाओं को 8 हज़ार देकर उनका वोट खरीदा जा रहा है। अगर महिलाएं केवल पैसे के आधार पर वोट देंगी तो लोकतंत्र कमजोर होगा।
”मुस्लिम संगठनों की चिंता: ‘सबको बराबरी क्यों नहीं?
’मुस्लिम संगठनों ने योजना का विरोध नहीं किया, लेकिन चयनात्मक संवेदनशीलता पर सवाल उठाए हैं।ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (AAMSU) के एक पदाधिकारी ने कहा—“अरुणोदय योजना अच्छी है, लेकिन जिन मुस्लिम महिलाओं के घर बेदखली अभियानों में तोड़े गए, उनके लिए सरकार ने कोई विशेष पैकेज क्यों नहीं घोषित किया?
”कामरूप की एक महिला लाभार्थी सलमा बेगम (बदला हुआ नाम) कहती हैं—“पैसा मिलना अच्छा है, लेकिन जिनके पास घर ही नहीं रहा, उनके लिए यह मदद नाकाफी है।
”क़ानूनविदों का सवाल: आचार संहिता की सीमा?
संवैधानिक मामलों के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े मानते हैं—“अगर चुनाव अधिसूचना से पहले योजनाओं की घोषणा होती है, तो वह तकनीकी रूप से वैध है। लेकिन नैतिक सवाल बना रहता है कि क्या राज्य संसाधनों का इस्तेमाल सत्ता में बने रहने के लिए हो रहा है?
”हिंदू संगठनों का समर्थन
कुछ हिंदू संगठनों ने इस कदम का समर्थन करते हुए इसे ‘मातृशक्ति सम्मान योजना’ करार दिया है।एक संगठन के प्रवक्ता ने कहा—“बिहू जैसे सांस्कृतिक पर्व से योजना को जोड़ना असमिया अस्मिता और महिला सम्मान का प्रतीक है।”
बीजेपी और आरएसएस की प्रतिक्रिया
बीजेपी और आरएसएस दोनों ने इसे महिला सशक्तिकरण की दीर्घकालिक नीति बताया है।असम बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता कहते हैं—“हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में हर वर्ग—महिला, युवा, किसान—को योजनाओं का लाभ मिला है। यह रेवड़ी नहीं, विकास की नींव है।”आरएसएस से जुड़े विचारकों का मानना है कि—“महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ेगी तो समाज स्वतः सशक्त होगा। यह सामाजिक परिवर्तन का मार्ग है।
”सीएम चेहरा या मोदी फैक्टर?
जुबिन गर्ग की मौत से जुड़ी नाराज़गी के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या बीजेपी चुनाव हिमंत बिस्वा सरमा के चेहरे पर लड़ेगी या सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर।
वरिष्ठ पत्रकार नव कुमार ठाकुरिया के अनुसार—“इन योजनाओं से पार्टी से ज़्यादा व्यक्तिगत रूप से हिमंत को लाभ हो सकता है। बीजेपी पहले भी मुख्यमंत्री बदल चुकी है, इसलिए हिमंत अपने राजनीतिक कद को मज़बूत कर रहे हैं।
निष्कर्ष:
पैसा, पहचान और सत्ता की त्रिवेणी असम में 8,000 रुपये का यह ‘तोहफ़ा’ केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश, सांस्कृतिक प्रतीक और चुनावी प्रयोग—तीनों है।बीजेपी इसे सशक्तिकरण कह रही हैं विपक्ष इसे वोट-खरीद
शिक्षाविद इसे अस्थायी राहतऔर मतदाता इसे तत्काल सहाराअंततः फैसला असम की जनता करेगी—
क्या यह महिला सशक्तिकरण का असम मॉडल है,या फिर चुनाव से पहले सत्ता को सुरक्षित रखने की सुनियोजित चाल?
