बी के झा
NSK

उत्तर 24 परगना पश्चिम बंगाल/ न ई दिल्ली, 31 जनवरी
पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना ज़िले के आनंदपुर में स्थित वॉव मोमो गोदाम में लगी भीषण आग अब केवल एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं रह गई है। यह घटना राज्य की राजनीति, प्रशासनिक जवाबदेही और कथित सत्ता-संरक्षण के आरोपों के केंद्र में आ चुकी है। 25 लोगों की मौत और 27 लोगों के लापता होने की त्रासदी ने न केवल आम जनमानस को झकझोर दिया है, बल्कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के बीच टकराव को भी चरम पर पहुँचा दिया है।
अमित शाह का सीधा हमला: “यह आग नहीं, साज़िश है
”केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तर 24 परगना की जनसभा में इस घटना को “दुर्घटना नहीं, सुनियोजित अपराध” बताते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सीधा हमला बोला। शाह ने सवालों की झड़ी लगाते हुए कहा—“मोमो फैक्ट्री में पैसा किसका है?
मालिक कौन है?
किसके साथ विदेश यात्राएं हुईं?
अब तक गिरफ्तारी क्यों नहीं?
क्या वोट बैंक के कारण बंगाली नागरिकों की जान की कीमत कम हो गई है?”
शाह का यह बयान केवल प्रशासनिक विफलता का आरोप नहीं था, बल्कि यह संकेत भी था कि आग की लपटों के पीछे राजनीतिक संरक्षण की छाया हो सकती है।
कानूनविदों की राय: निष्पक्ष जांच ही सच्चाई का रास्ता
प्रख्यात संवैधानिक विशेषज्ञों और आपराधिक कानून के जानकारों का मानना है कि यदि इस मामले में अब तक गोदाम मालिक की गिरफ्तारी नहीं हुई है, तो यह प्रक्रियात्मक चूक और हितों के टकराव की ओर इशारा करता है।वरिष्ठ अधिवक्ता प्रो. (डॉ.) आर.के. सेन के अनुसार—“जब किसी औद्योगिक हादसे में इतने लोग मारे जाते हैं और प्राथमिक जिम्मेदार पर कार्रवाई नहीं होती, तो न्यायिक जांच अनिवार्य हो जाती है। केवल पुलिस जांच से जनता का विश्वास बहाल नहीं होगा।”
राजनीतिक विश्लेषक: बंगाल में नैरेटिव की जंगलराज
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आनंदपुर अग्निकांड भाजपा के लिए नैरेटिव बदलने का अवसर बनता जा रहा है। जहां टीएमसी इसे प्रशासनिक दुर्भाग्य बता रही है, वहीं भाजपा इसे “भ्रष्टाचार + संरक्षण + तुष्टिकरण” के त्रिकोण के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अभय दुबे कहते हैं—“बंगाल में भाजपा का ग्राफ केवल सीटों का नहीं, बल्कि ‘राज्य बनाम केंद्र’ और ‘न्याय बनाम संरक्षण’ की राजनीति का ग्राफ है। अमित शाह ने इसी भावनात्मक बिंदु को छुआ है।
”विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया: कांग्रेस और वाम का संतुलन
कांग्रेस और वाम दलों ने भी इस घटना पर ममता सरकार की आलोचना की है, हालांकि भाजपा की भाषा से दूरी बनाए रखी है। वामपंथी नेताओं का कहना है कि—“यह पूंजी और सत्ता की मिलीभगत का परिणाम है, जिसमें मजदूरों की जान सस्ती समझी गई।”कांग्रेस ने न्यायिक जांच की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि “राज्य सरकार को पारदर्शिता दिखानी होगी।”
हिंदू संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया
कई हिंदू संगठनों और सामाजिक मंचों ने इस घटना को “बंगाली हिंदू अस्मिता पर हमला” बताते हुए कहा है कि यदि पीड़ित किसी विशेष वर्ग से होते तो कार्रवाई की गति अलग होती।एक प्रमुख हिंदू संगठन के प्रवक्ता ने कहा—“जब निर्दोष हिंदू मजदूर मारे जाते हैं, तब सरकार चुप रहती है। यह दोहरा मापदंड अब स्वीकार्य नहीं।”
धर्मगुरुओं की चेतावनी: राजनीति से ऊपर मानवता
प्रमुख सनातन धर्मगुरुओं ने इस त्रासदी को राजनीतिक लाभ का साधन बनाने से बचने की सलाह दी, लेकिन साथ ही न्याय की मांग को भी धर्म का कर्तव्य बताया।काशी के एक आचार्य ने कहा—“राजा का धर्म है प्रजा की रक्षा। यदि दोषी बचाए गए, तो यह अधर्म है।”
मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रिया: दोषियों को सजा, न कि सामूहिक आरोप
मुस्लिम सामाजिक संगठनों ने भी पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि—“किसी भी अपराध को धर्म से जोड़ना गलत है। दोषी चाहे कोई भी हो, उसे सजा मिलनी चाहिए।”उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग का समर्थन किया।
बीजेपी का चुनावी गणित और शाह का आत्मविश्वास
अमित शाह ने अपने भाषण में बंगाल में भाजपा के बढ़ते वोट प्रतिशत का उल्लेख करते हुए दावा किया कि—2014: 2 सीट
2019: 41% वोट, 18 सीट
2021 विधानसभा: 38% वोट, 77 सीट
2024: 39% वोट
शाह ने भविष्यवाणी की कि आगामी चुनाव में भाजपा 50% से अधिक वोट के साथ सत्ता में आएगी।
निष्कर्ष:
आग बुझी नहीं हैआनंदपुर गोदाम की आग भले ही बुझ गई हो, लेकिन उससे उठता राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक धुआं अब भी पूरे बंगाल को घेरे हुए है। सवाल केवल यह नहीं है कि आग कैसे लगी, बल्कि यह भी है कि—
क्या दोषियों तक कानून पहुंचेगा, या राजनीति की राख में सच्चाई दबा दी जाएगी?
आने वाले महीने तय करेंगे कि यह घटना इतिहास में एक और फाइल बनकर रह जाती है, या बंगाल की राजनीति की दिशा बदलने वाला मोड़ साबित होती है।
