बी.के. झा
NSK


नई दिल्ली, 18 दिसंबर
नेशनल हेराल्ड मामले में मंगलवार, 16 दिसंबर को राउज एवेन्यू कोर्ट का फ़ैसला सुनते ही राजनीतिक गलियारों में शोर मच गया। कांग्रेस ने इसे “ऐतिहासिक जीत” करार दिया, तो बीजेपी ने तुरंत पलटवार करते हुए कहा—
“यह क्लीन चिट नहीं, केवल तकनीकी राहत है।”सवाल यही है—
क्या राहुल गांधी और सोनिया गांधी को वाकई अदालत से राहत मिल गई है, या यह सिर्फ़ एक क़ानूनी पड़ाव है?कोर्ट ने असल में क्या किया?सबसे पहले भ्रम दूर करना ज़रूरी है।राउज एवेन्यू कोर्ट ने यह नहीं कहा कि नेशनल हेराल्ड मामले में कोई घोटाला नहीं हुआ।कोर्ट ने सिर्फ़ इतना किया कि—
ईडी द्वारा दायर चार्जशीट (प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट) पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया।कारण था—क़ानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं होना।कोर्ट के मुताबिक,मनी लॉंड्रिंग (PMLA) के तहत कार्रवाई तभी हो सकती है जब पहले किसी प्रेडिकेट ऑफ़ेंस (मूल अपराध) में पुलिस की एफ़आईआर दर्ज होऔर उस एफ़आईआर की जांच में अपराध से आय (Proceeds of Crime) सामने आए
यहां समस्या यह थी कि—2013 में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत निजी शिकायत थीन तो पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज कीन ही सीबीआई ने 11 साल में कोई केस बनायातो कांग्रेस इसे जीत क्यों बता रही है?कांग्रेस का तर्क साफ़ है—अगर चार्जशीट पर ही कोर्ट संज्ञान नहीं लेती, तो मामला वहीं गिर जाता है।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा—
यह फ़ैसला साबित करता है कि राजनीतिक बदले की भावना से केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया।”कांग्रेस इसे एजेंसियों की “अति-उत्साहपूर्ण कार्रवाई”और विपक्ष को डराने की रणनीति की विफलता मान रही है।
बीजेपी क्यों कह रही है— ‘क्लीन चिट नहीं’?
बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया का जवाब भी तकनीकी रूप से मज़बूत है।
उनके अनुसार—कोर्ट ने मामले के मेरिट पर कुछ नहीं कहा। यह सिर्फ़ प्रक्रिया से जुड़ा फ़ैसला है। जांच जारी रह सकती है।”बीजेपी का कहना है कि—ईडी हाई कोर्ट में अपील कर सकती है हाल में दर्ज दिल्ली पुलिस की एफ़आईआर के आधार पर नई जांच हो सकती हैऔर असली सवाल— 2000 करोड़ की संपत्ति 50 लाख में कैसे ट्रांसफर हुई? —
अब भी अनुत्तरित हैं
राजनीतिक विश्लेषक: ‘
राहत है, लेकिन स्थायी नहीं’राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अरुण कुमार मानते हैं—यह कांग्रेस के लिए रणनीतिक राहत है, नैतिक प्रमाणपत्र नहीं। चुनावी राजनीति में इसे जीत की तरह बेचा जाएगा, लेकिन अदालतों में लड़ाई अभी लंबी है।”उनके मुताबिक,बीजेपी इसे मुद्दा बनाए रखेगी, क्योंकि मामला भावनात्मक और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा है।
”शिक्षाविदों की राय:
प्रक्रिया बनाम राजनीति संवैधानिक मामलों की विशेषज्ञ प्रो. नीलिमा वर्मा कहती हैं—यह फ़ैसला दिखाता है कि न्यायपालिका प्रक्रिया को सर्वोपरि मानती है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि आरोप झूठे हैं, जल्दबाज़ी होगी।”उनके अनुसार,भारत में अक्सर राजनीतिक मुक़दमे अदालतों से ज़्यादा टीवी डिबेट में लड़े जाते हैं।”
बीजेपी से जुड़े कानूनविदों का पक्ष
बीजेपी से जुड़े वरिष्ठ कानूनविद महावीर अग्रवाल का कहना है—अगर कोई घोटाला नहीं हुआ है, तो कांग्रेस को जांच से डरना क्यों चाहिए?
प्रक्रिया की कमी सुधारी जा सकती है, आरोप तो वहीं के वहीं हैं।”उनका मानना है कि यह फ़ैसला ईडी को नई रणनीति अपनाने का अवसर देगा।”
हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया
कुछ हिंदू संगठनों ने इसे‘राजनीतिक प्रभाव का उदाहरण’ बताया।एक संगठन के प्रवक्ता ने कहा—नेशनल हेराल्ड जवाहरलाल नेहरू की विरासत से जुड़ा है। सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्ति का इस्तेमाल निजी राजनीतिक हितों के लिए हुआ?”
हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि—अदालत का आदेश सर्वोपरि है, लेकिन नैतिक जवाबदेही भी होनी चाहिए।” निष्कर्ष क्या है?
राहुल गांधी और सोनिया गांधी को फिलहाल क़ानूनी राहत मिली है
लेकिन उन्हें क्लीन चिट नहीं मिली है यह फ़ैसला कहता है कि—जांच गलत तरीके से शुरू की गई थी,न कि यह कि जांच का विषय ही गलत है।
आने वाले समय में—ईडी की अपीलनई एफ़आईआरऔर हाई कोर्ट–सुप्रीम कोर्ट की भूमिका इस मामले की दिशा तय करेगी।
अंतिम सवाल क्या
यह मामला सच में भ्रष्टाचार का है,या फिर राजनीति में कानून का इस्तेमाल?इसका जवाब शायद अदालतें देंगी—लेकिन तब तक,नेशनल हेराल्ड भारत की राजनीति में बहस का सबसे धारदार औज़ार बना रहेगा।
ईडी की अपील नई एफ़आईआरऔर हाई कोर्ट–सुप्रीम कोर्ट की भूमिकाइस मामले की दिशा तय करेगीअंतिम सवालक्या यह मामला सच में भ्रष्टाचार का है,या फिर राजनीति में कानून का इस्तेमाल?इसका जवाब शायद अदालतें देंगी—
लेकिन तब तक,नेशनल हेराल्ड भारत की राजनीति में बहस का सबसे धारदार औज़ार बना रहेगा।
